अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी- 4
अली बिन उसमान हजवीरी वह महान विद्वान हैं जिन्होंने ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप में बड़ा नाम कमाया। सूफ़ीवाद के क्षेत्र में ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप दोनों ही जगहों पर उनके श्रद्धालुओं की संख्या बहुत अधिक है।
उनका मज़ार लाहौर में है जो दाता दरबार के नाम से मशहूर है। इस मज़ार पर हमेशा श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।
हमने अली बिन उसमान हजवीरी के जीवन की समीक्षा की। हमने बताया कि हजवीरी का जन्म चौथी शताब्दी हिजरी के अंतिम अथवा पांचवी शताब्दी हिजरी के आरंभिक वर्षों में ग़ज़्नी के हजवीर मुहल्ले में हुआ। उन्होंने अपने ज़माने के प्रमुख शिक्षा व संस्कृति केन्द्रों में शिक्षा ग्रहण की और सभी विषयों और ज्ञानों से परिचित हुए। हजवीरी को क़ुरआन, हदीस, दर्शनशास्त्र तथा अन्य विषयों का पूर्ण ज्ञान था। उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने जीवन का बहुत बडा भाग यात्राओं में बिताया और महागुरुओं से शिक्षा प्राप्त की। हजवीरी का आख़िरी पड़ाव लाहौर शहर था। यह उस समय भारतीय उपमहाद्वीप और ख़ुरासान की संयुक्त सीमा के क़रीब स्थित शहर माना जाता था। इस शहर में उन्हें लेखन और पठन का अच्छा मौक़ा मिल गया जिसका उपयोग करते हुए उन्होंने कश्फ़ुल महजूब नामक पुस्तक लिखी या पूरी की। हजवीरी ने लाहौर में बड़ी सेवा की और लोग उनके दीवाने हो गए। हिंदू इतिहासकारों ने भी हजवीरी की सेवाओं को सराहा है और बहुत से लोगों का कहना है कि उन्होंने अपने चरित्र से इस्लाम के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई। कश्फ़ुल महजूब किताब से पता चलता है कि हजवीरी ने और भी 9 पुस्तकें लिखी हैं लेकिन अब इन पुस्तकों का कोई अता पता नहीं है।
कश्फ़ुल महजूब सूफ़ीवादी विचारधारा की पुस्तक है और इसका संबंध आरंभिक फ़ार्सी गद्य काल से है। इस पुस्तक का महत्व यह है कि इससे सूफ़ीवाद तथा उससे संबंधित विषयों के बारे में बड़ी मूल्यवान जानकारी मिलती है। पुस्तक के अलग अलग भाग का अलग अलग अंदाज़ है और संबंधित विषय पर निर्भर करता है। इस पुस्तक में वैसे तो अनेक विषयों को समेटा गया है लेकिन इसका संपूर्ण ढांचा बड़ा व्यवस्थित है।
हजवीरी की किताब कश्फ़ुल महजूब पांचवीं शताब्दी हिजरी का बड़ी महत्वपूर्ण पुस्तक है यह सूफ़ीवाद के विषय में पहली फ़ारसी किताबों में है। इस किताब की कई आयामों से समीक्षा की जा सकती है। एक पहलू तो इस पुस्तक का अदभुत ढांचा और विशेष शैली है। हजवीरी ने इस किताब में बड़ी बुदनियादी विषयों को बड़े ही रोचक अंदाज़ में उठाया है।
किसी भी साहित्यिक पुस्तक को पढ़ने के बाद यह बिंदु साफ़ नज़र आता है कि लेखक मतव्य और विषयवस्तु को दूसरों तक स्थानान्तरित करने के लिए भाषा और उसकी क्षमताओं को व्यापक रूप में प्रयोग करना चाहता है। यही बात कश्फ़ुल महजूब में भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। हजवीरी की किताब में भी अनेक विषय शामिल किए गए हैं लेकिन जो चीज़ सबसे बुनियादी रूप से पेश की गई है वह ईश्वर से बंदों का रिश्ता तथा इच्छाओं से इंसान का टकराव है। इस पुस्तक के सभी प्रमुख और आंशिक विषय इसी लक्ष्य के तहत लिखे गए हैं। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि इस किताब के अलग अलग भाग अपनी जगह पर स्वतंत्र विषय पेश करते हैं लेकिन इसके बावजूद उनके बीच एक कोमल रिश्ता भी है। इसी कोमल रिश्ते को दृष्टिगत रखा जाए तो विभिन्न विषयों की व्यापकता और उनके आपसी संबंध को समझा जा सकता है तथा उसकी सही समीक्षा की जा सकती है।
किसी भी पुस्तक के ढांचे की समीक्षा से पहले ज़रूरी है कि उसके असली भागों को निर्धारित किया जाए। हजवीरी की पुस्तक के भी अलग अलग भाग हैं जिन्हें डाक्टर ग़ुलाम रज़ा ज़ेयाई ने पांच हिस्सों में विभाजित किया है। पहला भाग प्रस्तावना पर आधारित है दूसरे भाग में सूफ़ीवाद में प्रयोग होने वाले विशेष शब्दों के बारे में बताया गया है। तीसरे भाग में महान सूफ़ियों और महापुरुषों का परिचय कराया गया है। चौथे भाग में सूफ़ीवाद के अलग मतों और विचारों पर रोशनी डाली गई है। पांचवें भाग में हजवीरी ने बहुत से तथ्यों से पर्दा हटाया है।
यह पांचों भाग एक दूसरे से अलग भी हैं लेकिन एक दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। यह भाग पूरे ढांचे का अभिन्न अंग है। आध्यात्मिकता इन भागों को आपस में बड़े सलीक़े से जोड़ती है। इस किताब के किसी भी भाग के कुछ अंश को लेकर पढ़ा जाए तो वह अपने आप में संपूर्ण बात बन जाता है।
किताब की प्रस्तावना विशेष रूप से अबू सईद हजवीरी के सवाल और लेखक की टिप्पणीं सभी भागों के मूल ध्रुव की तरह उन्हें एक दूसरे से जोड़ती हैं। हजवीरी ने प्रस्तावना में अबू सईद हजवीरी के सवालों की ओर संकेत किया है जिन्होंने यह पूछाः बयान करो मेरे लिए सूफ़ीवाद की प्राप्ति का मार्ग क्या है, उसके विभिन्न दर्जों की क्या स्थिति है? इसके मत और लेख क्या हैं? मेरे लिए बयान करो कि ईश्वर के प्रेम की क्या स्थिति है? दिलों पर यह प्रेम कैसे ज़ाहिर होता है? बुद्धि क्यों ईश्वर की वास्तविकता को समझने में अक्षम है?
हजवीरी ने यह सवाल उठाने के बाद अपने काल के लोगों की आलोचना की है जो सूफ़ीवाद की हक़ीक़त को नहीं समझते थे। उन्होंने शिकायत की है और साथ ही यह वादा भी किया है कि इन सवालों पर महापुरुषों के कथनों और महत्वपूर्ण घटनाओं के आधार पर अपने जवाब इस तरह पेश करेंगे कि उन्हें सब लोग समझ सकें। किताब कश्फ़ुल महजूब में अबू सईद हजवीरी के सवालों के बाद जो बातें बयान की गई हैं वह इन्हीं प्रश्नों का उत्तर हैं और इनका हर भाग दूसरे भाग से आध्यात्मिक रूप से जुड़ा हुआ है। इसी आयाम ने सभी भागों को एक ही लड़ी में गूंध दिया है और उन्हें विचित्र रूप से संगठित बना दिया है। शुरू, आख़िर या बीच में कभी कभी एसे बिंदु लाए गए हैं जो इन भागों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। हजवीरी इस तरह पाठकों को जो किसी विशेष बिंदु को पढ़ रहा है इस भाग से पहले और बाद वाले भागों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। जगह जगह पर दिए गए यही रेफ़रेन्स, इस किताब के भागों को आपस में संगठित करते हैं।
कश्फ़ुल महजूब की एक विशेषता यह है कि पूरी किताब में यही लगता है कि लेखक उपस्थित हैं और बड़े स्पष्ट रूप से वह पाठक से बात कर रहे हैं। मैं उली बिन उसमान अलजल्लाबी हूं जो यह कह रहा हूं, इस प्रकार के वाक्य बार बार दोहराए गए हैं जो हजवीरी की विशेष लेखन शैली को दर्शाते हैं। किताब के कुछ भागों में जैसे प्रस्तावना के अलग अलग भागों में विशेष रूप से उन भागों में जिनमें सूफ़वादी मतों और हस्तियों की चर्चा की गई है लेखक की उपस्थिति अधिक स्पष्ट और प्रबल दिखाई देती है। प्रस्तावना में भी लेखक की उपस्थिति बहुत स्पष्ट है। शुरू से आख़िर तक पूरी किताब लेखक के विचार और आस्थाओं के इर्द गिर्द घूमती है। यह विषय पूरी किताब में साथ झलकता है। बहुत से भागों में हजवीरी ने अपनी यादों को बयन करके अपनी उपस्थिति बढ़ा दी है। किताब के विभिन्न भागों में अलग अलग अंदाज़ से हजवीरी की उपस्थिति इस किताब की विशेषता है।
इस किताब की एक और विशेष बात शूरू करने और समाप्त करने और बीच की कड़ियों को बयान करने का विशेष अंदाज़ है। हजवीरी का विशेष अंदाज़ यह है कि वह पहले किसी बिंदु को संक्षेप में बयान कर देते हैं फिर उसका विवरण पेश करते हैं।