अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी- 5
हमने ईरान के एक महान बुद्धिजीवी, अली बिन उस्मान हजवीरी के बारे में चर्चा की थी।
यह ऐसे विद्वान थे जिन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में अधिक ख्याति मिली और वे इरफ़ान तथा सूफ़ीवाद के क्षेत्र में ईरान तथा भारतीय उपमहाद्वीप दोनों स्थानों पर जाने गए। आज भी उनके मानने वालों की संख्या कम नहीं है। भारतीय उप महाद्वीप में इस ईरानी विद्धान को दातागंज बख़्श के नाम से जाना जाता है। उनका मज़ार लाहौर में है जहां पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। इस ईरानी विद्धान ने अपने जीवन का अन्तिम समय लाहौर में गुज़ारा और वहीं पर उनका स्वर्गवास हुआ।
यह बात हम आपको बता चुके हैं कि अली बिन उस्मान हजवीरी या दातागंज बख़्श का जन्म, चौथी हिजरी शमसी के अन्तिम वर्षों में या फिर पांचवी हिजरी शमसी के आरंभ में ग़ज़नी के हजवीरी क्षेत्र में हुआ था। हजवीरी ने आरंभिक शिक्षा अपनी मातृभूमि में प्राप्त की। वे अपने काल के प्रचलित ज्ञानों में दक्ष थे। हजवीरी को शिक्षा से विशेष लगाव था इसलिए शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने बहुत यात्राएं कीं। इन यात्राओं में हालांकि उनको बहुत कठिनाइयां उठानी पड़ीं किंतु उनकी यात्राओं का क्रम रुका नहीं। वे जिस स्थान की भी यात्रा पर जाते वहां के विद्धानों से शिक्षा ग्रहण किया करते थे और अपना अधिक समय वहां पर विद्वानों के बीच ही गुज़ारते थे। इस प्रकार से हजवीरी ने बहुत सी ऐसी बातें सीखीं जो उन्हें अपनी यात्राएं आरंभ करने से पहले मालूम नहीं थीं।
कहते हैं कि अली बिन उस्मान हजवीरी की यात्रा का अन्तिम पड़ाव लाहौर था। उस समय लाहौर, ईरान तथा भारत का सीमावर्ती नगर हुआ करता था। उन्होंने लाहौर में रहकर लेखन का बहुत काम किया। बताया जाता है कि अली बिन उस्मान हजवीरी ने लाहौर में अपने प्रवास के दौरान “कश्फुल महजूब” नामक पुस्तक लिखी या इसे पहले से लिखना आरंभ किया था किंतु लाहौर में इसे पूरा किया। लाहौर में हजवीरी ने बहुत जनसेवा की। लाहौर में उनके मानने वालों की संख्या आज भी बहुत अधिक है। कशफुल महजूब नामक पुस्तक की समीक्षा करने से पता चलता है कि मूल रूप से इसमें 5 अध्याय हैं जो वास्तव में दो केन्द्रीय बिंदुओं पर आधारित हैं। इनमें से एक है मनुष्य का ईश्वर से विशेष संबन्ध और दूसरा अपनी अन्तर्त्मा से मनुष्य की तुलना।
कशफुल महजूब नामक पुस्तक की एक अन्य विशेषता, इसमें एक शिक्षक के रूप में पाठकों को संबोधित करना है। इस किताब की भूमिका में हजवीरी, “अबू सईद हजवीरी” को संबोधित करते हुए लिखते हैं कि इस किताब को वास्तव में तुमको और पाठकों को कुछ सिखाने के लिए लिखा गया है। कश़्फुल महजूब नामक पुस्तक के अध्ययन से यह बात समझ में आती है कि हजवीरी का मुख्य लक्ष्य वास्तव में दूसरों को कुछ बताना है। उन्होंने बहुत सी बातों को सिद्ध करने के लिए पवित्र क़ुरआन की आयतें, पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीसें, कहवातें और तत्कालीन प्रचलित कथनों का सहारा लिया है। यह सब उन्होंने इसलिए किया है कि पाठक को बात समझने में कोई समस्या न आए।
कशफुल महजूब नामक पुस्तक का एक अन्य विषय, प्रश्न करके उत्तर देते हुए पाठकों को बातें समझाना है। लेखन की शैली में इसे आदर्श शैली माना जाता है। उदाहरण स्वरूप हजवीरी अपनी किताब कशफुल महजूब में कहीं-कहीं पर पाठक को समझाने के लिए पहले उससे प्रश्न करते हैं फिर बाद में स्वयं ही उस प्रश्न के संभावित उत्तरों को पेश करते हैं। अंत में उस विषय के बारे में वे अपना दृष्टिकोण पेश करते हैं। इस प्रकार हजवीरी बहुत ही सुन्दर शैली में अपनी बात को पाठक तक पहुंचाते हैं।
वे न केवल अपनी बात को सिद्ध करने के लिए तर्क पेश करते हैं बल्कि विद्धानों की बातों को सिद्ध करने के लिए कहावतों और मुहावरों का प्रयोग भी किया करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस शैली को दूसरे अन्य सूफ़ियों की किताबों में भी देखा जा सकता है। साहित्य का विश्लेषण करने वालों का मानना हे कि इस शैली का प्रयोग करके हजवीरी ने दूसरों को अधिक प्रभावित किया है। कुछ स्थानों पर तो हजवीरी ने अपनी किताब में ऐसी शैली का प्रयोग किया है जिसमें लगता है कि वे पाठक के साथ ही मौजूद हैं।
कश़्फुल महजूब नामक पुस्तक की एक विशेषता यह है कि हजवीरी, इसमें अपने विरोधियों या अन्य लोगों के कथनों और विचारों को बिना किसी बदलाव के पेश करते हैं। बाद में वे तार्किक ढंग से उनके तर्कों के उत्तर देते हैं। पुस्तक को पढ़ने से ऐसा लगता है कि कहीं-कहीं पर हजवीरी की बातों में विरोधाभास दिखाई दे रहा है किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं। जैसाकि हमने आपको पहले भी बताया कि मूल रूप से कश्फुल महजूब पुस्तक में 5 अध्याय हैं जो वास्तव में दो केन्द्रीय बिंदुओं पर आधारित हैं। मनुष्य का ईश्वर से विशेष संबन्ध और अपनी अन्तरात्मा से मनुष्य की तुलना। यह बातें आपको पूरी किताब में जगह-जगह पर देखने को मिल जाएंगी।
जैसाकि आप जानते हैं कि हजवीरी ने अपनी पुस्तक में बहुत से स्थानों पर पवित्र क़ुरआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथनों को पेश किया है। इससे पता चलता है कि इन दोनों क्षेत्रों में हजवीरी की जानकारी अच्छी थी। साथ ही कश्फुल महजूब को पढ़ते समय में उसमें प्रयोग की जाने वाली कहावतें, मुहावरे और शिक्षाप्रद कथाएं यह बताती है कि हजवीरी की साहित्यिक जानकारी भी बहुत अच्छी थी। अपनी किताब में उन्होंने महापुरूषों और विद्धानों के कथनों का भी हवाला दिया है।
हालांकि हजवीरी ने अपनी किताब में कुछ बातों को कई बार दोहराया भी है किंतु उनका दोहराया जाना इस अर्थ में नहीं है कि उनके पास ज्ञान की कमी है बल्कि उन्होंने पाठक को उचित ढंग से समझाने के लिए कुछ बातों को अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया है जो प्रशंसनीय काम है आलोचनीय नहीं। हजवीरी की किताब कश्फुल महजूब वास्तव में उन लोगों के लिए लिखी गई जो तसव्वुफ़ या सूफीवाद सीखना चाहते हैं। जानकारों का कहना है कि सूफीवाद सीखने के लिए कश्फुल महजूब एक अच्छी और उचित पुस्तक है।