Dec ०९, २०१७ ११:२२ Asia/Kolkata

हमने आपको बताया था कि ईरान ने परमाणु वार्ता के दौरान अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम पर बल देते हुए प्रतिबंधों को हटाए जाने की बात कही थी।

इस्लामी गणतंत्र ईरान का कहना था कि प्रतिबंधों को न हटाए जाने की स्थिति में वह किसी शर्त को नहीं मानेगा।  तेहरान के लिए यह बात इतनी महत्व रखती है कि पश्चिमी देशों के साथ वार्ता के दौरान कई बार यह अधूरी हालत में ही समाप्त हो गई।

वार्ता प्रक्रिया के दौरान ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों के संबन्ध में कुछ सीमितताओं को स्वीकार करते हुए व्यापक निगरानी के प्रति सहमति जताई थी।  ईरान की इस शर्त के मुक़ाबले में पश्चिम ने वचन दिया था कि वह तेहरान के विरुद्ध लगे परमाणु प्रतिबंधों को समाप्त कर देगा या फिर उन्हें विलंबित कर देगा।  इस सहमति तक पहुंचने के लिए वियना में 14 जून 2015 को 109 पन्नो पर आधारित समझौता पेश किया गया।  इसको व्यापक परमाणु समझौता या जेसीपीओए का नाम दिया गया।

ईरान ने जो वचन दिये थे वे इस प्रकार थेः सेंट्रीफ़्यूज़ की संख्या को कम करना, संवर्धित यूरेनियम की मात्रा को कम करना, रेडियोएक्टिव पदार्थ के भण्डार को कम करना, फोर्दो प्रतिष्ठान को शोध केन्द्र में बदलना और स्वेच्छा से यूरेनियम के उत्पादन को कम करने के उद्देश्य से अराक के भारी पानी के रिएक्टर में परिवर्तन करना आदि।  इसके मुक़ाबले में गुट पांच धन एक ने यह बात स्वीकार की थी कि ईरान के विरुद्ध लगे प्रतिबंध हटा लिए जाएंगे।

समग्र परमाणु समझौते को लागू करने के लिए पहला क़दम, वियना में समझौता होने के छठे दिन उठाया गया।  संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद ने 20 जूलाई सन 2015 को एक एतिहासिक बैठक आयोजित की जिसमें ईरान की परमाणु गतिविधियों के बारे मे इस परिषद के पिछले छह प्रस्तावों को सर्वसम्मति से निरस्त कर दिया गया।  संयुक्त राष्ट्रसंघ के 70 वर्षीय इतिहास में यह अपने प्रकार की अभूतपूर्व घटना थी जिसमें इस परिषद की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को निरस्त किया गया था।  इसी के साथ राष्ट्रसंघ के चार्टर के सातवें अनुच्छेद से ईरान के निकल जाने को विश्व के लिए बहुत बड़ी सफलता बताया गया जो संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्यों को सैन्य कार्यवाही करने की अनुमति देता है।  इसके अतिरिक्त सुरक्षा परिषद के माध्यम से ईरान के तेल, पेट्रोलियम, परिवहन, बीमा और बैंकिंग के क्षेत्र में लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को प्रस्ताव क्रमांक 2231 के आधार पर हटाया जाना भी एक बड़ी उपलब्धि है।

इसके साथ ईरान के विरुद्ध अमरीका तथा यूरोप की ओर से लगाए गए परमाणु प्रतिबंध, पूर्ण रूप से नहीं हटे।  इसीलिए "स्वीकृति दिवस" पर कुछ और भी क़दम उठाए गए।  जेसीपीओए के अनुसार स्वीकृति दिवस उस दिन को कहा जाता है जिस दिन ईरान ने परमाणु मामले के संदर्भ में अपने वचन पूरे करेगा और ईरान की ओर से पूरक प्रोटोकोल को लागू करने की घोषणा आईएईए द्वारा की जाएगी।  यह घोषणा 18 अक्तूबर को की गई।  इसी के साथ अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वाशिग्टन की ओर लगाई गई पाबंदियों को हटाने की बात कही।  इसी बीच यूरोपीय संघ ने भी ईरान के विरुद्ध परमाणु प्रतिबंधों को हटाने का आदेश जारी किया।  इस पूरे घटनाक्रम के कारण समग्र परमाणु समझौते या जेसीपीओए के लागू करने की भूमिका प्रशस्त हुई।

17 जनवरी सन 2016 को अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी आईएईए की ओर से ईरान द्वारा स्वेच्छा से पूरक प्रोटोकोल को लागू करने की पुष्टि के साथ, ईरान और गुट पांच धन एक के वार्ताकारों ने एक बयान जारी किया।  इस बयान के बाद अमरीकी सरकार ने एलान किया कि देश के राष्ट्रपति या प्रशासन की ओर से ईरान के ख़िलाफ़ जो प्रतिबंध लगाए गए थे वे सब निरस्त किये जा रहे हैं।  इस प्रकार परमाणु गतिविधियों के बहाने अमरीका और यूरोप ने जो प्रतिबंध लगाए थे वे लगभग 8 वर्षों के बाद हटा लिए गए।

इसी के साथ जेसीपीओए के संदर्भ में ईरान पर लगे ग़ैर परमाणु प्रतिबंधों को हटाए जाने के बारे में भी चर्चा हुई।  उदाहरण के लिए यह एलान किया गया कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर लगे प्रतिबंध 8 वर्षों के बाद और अन्य सैन्य गतिविधियों पर लगे प्रतिबंधों को 5 वर्षों के बाद हटा लिया जाएगा।  परमाणु वार्ता के दौरान यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि किसी सहमति तक पहुंचने की स्थिति में आतंकवाद का समर्थन और मानवाधिकारों के हनन के बहाने ईरान के विरुद्ध जो प्रतिबंध लगाए गए थे उनको नहीं हटाया जाएगा।

परमाणु वार्ता के अन्तर्गत इस बारे में चर्चा हुई थी कि अगर कोई देश जेसीपीओए के उल्लंघन का दावा करे किंतु उसका दावा, मतभेद परिषद के निकट स्वीकार्य न हो तो एक प्रक्रिया के अन्तर्गत हटाए गए प्रतिबंधों को वापस लाया जा सकता है।  दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों ने अपने लिए इस अधिकार को सुरक्षित कर लिया कि इस परिषद की ओर से ईरान के विरुद्ध लगे प्रतिबंधों के हटने की स्थिति में वे उसे पुनः वापस ला सकते हैं।  इसके मुक़ाबले में इस्लामी गणतंत्र ईरान ने जेसीपीओए के विषयवस्तु में इस बात को बढवाया कि अगर उसके विरुद्ध प्रतिबंध लगाए जाते हैं तो वह फिर जेसीपीओए से पहले वाली स्थिति में पुनः वापस आ जाएगा।  इस प्रकार वार्ताकार पक्षों के बीच एक प्रकार का संतुलन बना ताकि जेसीपीओए को क्षति पहुंचाने के प्रयास को रोका जा सके।

ईरान तथा गुट पांच धन एक के बीच होने वाली वार्ता में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भाग लिया था।  उनके सत्ताकाल में ईरान के विरुद्ध ग़ैर परमाणु प्रतिबंधों को बढ़ाने के प्रयास किये गए।  इससे पहले रिपब्लिकन्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस ने जेसीपीओए के लागू किये जाने के मार्ग में बाधाएं डाली गईं।  उदाहरण स्वरूप रिपब्लिकन्स ने ओबामा सरकार से मांग की थी कि जेसीपीओए को पारित करने के लिए वे इसे सीनेट के हवाले करें जिसका विरोध डेमोक्रेट्स ने किया।  अंततः रिपब्लिकन्स अपनी मांग को मनवाने में सफल नहीं हो सके।  रिपब्लिकन्स ने कूटनैतिक संस्कारों को अनेदखा करते हुए वाइट हाउस से विचार-विमर्श किये बिना कांग्रेस की संयुक्त बैठक में इस्राईल के प्रधानमंत्री को निमंत्रित किया ताकि वे बैठक में ओबामा को जेसीपीओए को लागू करने से रोक सकें।

अपने इस प्रयास में भी विफल होने के बाद रिपब्लिकन्स ने कांग्रेस को एक प्रस्ताव पेश किया जिसके आधार पर अमरीकी राष्ट्रपति इस बात के लिए बाध्य है कि वह हर 90 दिनों में अपनी रिपोर्ट पेश करें कि ईरान, जेसीपीओए के प्रति कितना कटिबद्ध रहा है।  इस प्रस्ताव के अनुसार अमरीकी राष्ट्रपति यदि किसी भी तर्क के आधार पर यह साबित करे कि ईरान, जेसीपीओए के प्रति कटिबद्ध नहीं रहा है तो इसको कांग्रेस भेजा जाएगा जिसके बाद अमरीका में क़ानून बनाने वाले 60 दिनों के भीतर प्रतिबंधों को वापस लौटा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त अमरीकी कांग्रेस ने जेसीपीओए को विफल बनाने के लिए एक क़ानून बनाया जिसके आधार पर कई देशों के व्यापारियों के ईरान में प्रवेश पर रोक लग गई।  जब ईरान ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया दिखाई तो बराक ओबामा ने अपने विशेषाधिकार से इसे रोक दिया।  इसके बावजूद ईरान पर लगे प्रतिबंध की समय सीमा सन 2016 में समाप्त हो गई, कांग्रेस ने इसे पारित किया और ओबामा ने इसपर हस्ताक्षर किये।  यह कार्यवाही एसी स्थिति में की गई कि जब जेसीपीओए के आधार पर अमरीकी सरकार ने वचन दिया था कि वह ईरान के विरुद्ध कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगी या इस बारे में कोई प्रस्ताव पारित नहीं करेगी।  अमरीकी सरकार की इस कार्यवाही से पता चलता है कि वाइट हाउस अब भी विभिन्न बहानों से ईरान के विरुद्ध नए प्रतिबंध लगाए।  उल्लेखनीय है कि ईरान तथा गुट पांच धन एक के बीच होने वाली परमाणु वार्ता में लगभग डेढ वर्षों तक पश्चिमी देशों की ओर से प्रतिबंधों को हटाने के बारे में वार्ता चलती रही।  ईरानी पक्ष का कहना था कि ईरान पर परमाणु मामले में लगे प्रतिबंधों को हटाए बिना किसी भी प्रकार का कोई समझौता नहीं हो सकता और एसी स्थिति में ईरान किसी भी वचन को पूरा नहीं करेगा।  इसके बावजूद अमरीका और पश्चिम, ईरान से पूरी तरह से प्रतिबंधों को हटाने में लगातार आनाकानी करते रहे हैं।