अबुल हसन अली बिन उस्मान हजवीरी- 6
ईरान के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी व आत्मज्ञाती अली बिन उस्मान हजवीरी का शुमार भारत और ईरान के उन प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों में होता है जिन्होंने परिज्ञान और सूफ़ीवाद के क्षेत्र में बहुत अधिक नाम कमाया है।
इससे पहले हमने आपको बताया था कि हजवीरी का जन्म चौथी शताब्दी के अंत में या पांचवीं शताब्दी के आरंभ में ग़ज़ना के हजवीर मोहल्ले में हुआ था। उन्होंने आरंभ में अपने समय के प्रचलित ज्ञानों को हासिल किया और इसमें वह दक्ष भी हो गये थे। हजवीरी ने पवित्र क़ुरआन, हदीस, धर्म शास्त्र और वादशास्त्र की शिक्षा अपने पैतृक स्थल से प्राप्त की और उसके बाद अधिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने लंबी यात्राएं की जिसके दौरान उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों से ज्ञान प्राप्त किए। हजवीरी की यात्रा का अंतिम पड़ाव लाहौर था। इस शहर में उनको कश्फ़ुल महजूब नामक पुस्तक लिखने का अवसर मिला या इस दौरान उन्होंने इस किताब को पूरा किया। हजवीरी ने लाहौर में बहुत अधिक सेवाएं अंजाम दीं और हज़ारों मुरीद बना लिए। कश्फ़ुल महजूब नामक पुस्तक की समीक्षा से पता चलता है कि यह पुस्तक पांच खंडों पर आधारित है जिसमें विभिन्न भाग और आयाम हैं। इस किताब के दो मुख्य आधार हैं। इनमें से एक ईश्वर के साथ मनुष्य के विशेष संबंध और दूसरा इंसान का अपनी इच्छाओं से मुक़ाबला। किताब के दूसरे भाग एक दूसरे से अलग होने के बावजूद आपस में जुड़े हुए हैं। आइये इस महत्वपूर्ण पुस्तक के कुछ महत्वपूर्ण तत्व पर चर्चा करते हैं।
महत्वपूर्ण पुस्तक कश्फ़ुल महजूब में पांच मुख्य खंड हैं जिनमें से हर एक छोटे छोटे भागों में विभाजित है। यही कारण है कि इनके हर भाग के अलग अलग होने के बावजूद यह आपस में जुड़ी हुई हैं। लेखक की दृष्टि में कश्फ़ुल महजूब नामक पुस्तक की भूमिका ढांचे के लेहाज़ से बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि किताब की बहुत सी विशेषताओं को किताब के ढांचे में तलाश किया जा सकता है। इसमें भूमिका, आठ अध्याय और समापन है। यह भूमिका ईश्वर की प्रशंसा तथा पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरुद और सलाम के साथ आरंभ होती है। इन चार लाइन की प्रशंसा को बहुत ही सुव्यवस्थित शब्दों से अरबी भाषा में लिखा गया है जिसमें परिज्ञान के मोती पिरोए गये हैं। इसमें पेश किए गये शेर के शुरआती शेर से ही पाठक को पुस्तक में वर्णित बातों का पता चल जाता है।
ईश्वर की इस छोटी सी प्रशंसा के बाद लेखक अपना परिचय देते हैं और किताब के लेखन की ओर संकेत करते हैं। इस भाग को भी लेखक ने बहुत ही छोटे में और बहुत ही सुन्दर ढंग से, बड़े आसान शब्दों में पेश किया है। समस्त अध्याय की भूमिकाएं, इस भाग सहित समस्त भागों का व्याखान करती हैं और श्री हजवीरी ने अपनी बात को पूरा करने के लिए या उस पर तर्क पेश करने के लिए पवित्र क़ुरआन की आयतों, हदीसों, महापुरुषों के कथनों और कहानियों का सहारा लिया है। उन्होंने पुस्तक के आरंभ में ही दर्शनशास्त्र और परिज्ञान की चर्चा आरंभ कर दी। उन्होंने पुस्तक को इस अंदाज़ में लिखा है कि पहले विषय को संक्षेप में पेश किया और उसके बाद वह उसके समस्त पहलुओं पर एक एक करके विस्तार से चर्चा करते हैं। इस प्रकार से इस किताब के समस्त भाग आपस में एक दूसरे से अच्छी तरह जुड़े हुए दिखाई देते हैं। दूसरे शब्दों में यूं कहा जा सकता है कि बातों को बयान करने में हजवीरी की शैली यह है कि वह सबसे पहले एक बात को पेश करते हैं और फिर उसके बाद उसके हर पहलू पर विस्तार से चर्चा करते हैं और उसको अपने हिसाब से फैलाते थे और उसके बाद उस आंशिक विषय को कई भागों में विभाजित करके हर एक पर विस्तार से चर्चा करते थे।
अबू सईद हजवीरी के सवालों को जो कश्फ़ुल महजूब की भूमिका में वर्णित हैं, इस किताब के समस्त अध्यायों से अलग और उसका सार कहा जा सकता है। वास्तव में यदि देखा जाए कि पूरी किताब इन्हीं प्रश्नों के उत्तर और उनके विवरण के इर्द गिर्द घूमती है। यह प्रश्न, पुस्तक की आरंभिक भूमिका की भांति, एक बात को विस्तार से पेश करती है और किताब के दूसरे अध्याय या खंडों में उसको पूरी तरह बयान किया गया है। किताब में इसी प्रकार सूफ़ीमत के महापुरुषों का विस्तार से परिचय दिया गया है और उनके बारे में हर छोटी बड़ी बातें लिखी हैं।
अर्थ की दृष्टि से संपर्क, इस किताब की भूमिका में भी और भूमिका के बाद के भागों को जोड़ने का महत्वपूर्ण कारक है। यही कारण है कि भूमिका से लेकर किताब के अंत तक पाठक कभी भी विषय से अलग नहीं होता। इसी प्रकार किताब में जगह जगह पर यह शब्द भी वर्णित हैं कि " जैसा कि मैंने कहा" या "इससे तात्पर्य यह है" इत्यादि भी पाठक को पूरी तरह प्रस्तावना से पुस्तक के अंतिम भाग तक जोड़े रखती है। इस किताब में इसी प्रकार सत्य, दास, किताब, मैं और तुम इत्यादि भी पाठक को स्वयं जोड़े रखती है और इससे पता चलता है कि सारी किताब एक दूसरे से जुड़ी हुई है और इनको आपस में जोड़ने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कश्फ़ुल महजूब किताब की भूमिका के बाद हमको विभिन्न चीज़ें दिखाई पड़ती हैं। जैसे निर्धनता का अध्याय, ज्ञान सिद्ध करने का अध्याय, सूफ़ीवाद का अध्याय और दूसरी बातें दिखाई पड़ती हैं। रोचक बात यह है कि इस खंड के अध्याय एक दूसरे से काफ़ी मिलते जुलते हैं। किताब के इस भाग में वर्णित हर एक अध्याय, एक अध्याय को छोड़कर, शुरु से अंत तक कई भागों में विभाजित होते हैं।
हजवीरी हर अध्याय के अंत में उस अध्याय का निचोड़ और सार पेश करते हैं। इनमें भी पहले वाले अध्याय और बाद में आने वाले अध्याय के विषय को दृष्टि में रखकर बातें बयान की गयी हैं ताकि किताब एक दूसरे भाग से जुड़ी रहे। कश्फ़ुल महजूब नामक पुस्तक में ज्ञान, निर्धनता, सूफ़ीवाद इत्यादि जैसे सूफ़ीवाद के मुख्य विषयों को पेश किया गया है क्योंकि इन विषयों को सूफ़ीवादी अधिक महत्व देते हैं। किताब को एक लय पर बाक़ी रखने में इन विषयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और यही चीज़ इस किताब को दूसरी किताबों से अलग भी करती है।
इसी प्रकार कश्फ़ुल महजूब नामक पुस्तक में सूफ़ीवाद और धर्म की प्रसिद्ध हस्तियों के परिचय के लिए कई अध्याय विशेष किए गये हैं। इनमें से हर अध्याय में कुछ प्रसिद्ध हस्तियों की जीवनी और उनका पूरा परिचय पेश किया गया है जबकि हर प्रसिद्ध हस्ती का पूर ब्योरा देने के बाद उनका एक कथन भी पेश करते हैं, उसके बाद उनसे जुड़ी किसी घटना या कहानी को पाठकों के समक्ष पेश करते हैं तथा उनके परिज्ञानी दृष्टिकोण को बयान किया जाता था। हजवीरी ने जहां पर आवश्यक समझा है वहां पर उस भाग को विस्तृत कर दिया है और उसके बारे में पूरी तरह खुलकर बयान किया है और अपनी बातों को सिद्ध करने के लिए उन्होंने पवित्र क़ुरआन की आयतों, हदीसों और कहानियों का भी हवाला दिया है।