ग़ज़ाली मशहदी- 1
फारसी साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि इसको कई चरणों में विभाजित किया गया है।
इन चरणों को अलग-अलग हिसाब से वर्गीकृत किया गया है। फ़ारसी साहित्य का एक चरण दसवीं शताब्दी हिजरी शमसी से आरंभ होता है। दसवीं हिजरी शमसी शताब्दी तक फ़ारसी साहित्य, भारत में फैल चुका था। इस दौरान फ़ारसी भाषा के सैकड़ों कवियों ने भारत की यात्रा की जिनमें कुछ ने ईरान से भारत पलायन किया था। इस बात के दृष्टिगत दसवीं हिजरी शमसी शताब्दी को फारसी के साहित्य में अलग स्थान प्राप्त है।
जिन 700 से अधिक फारसी भाषी साहित्यकारों ने भारत की यात्रा की उनमें से एक, “ग़ज़ाली मशहदी” भी थे। वे अपने काल के जानेमाने साहित्यकार थे। सफवी काल के शासक “शाह तहमास्ब” तक उनकी ख्याति पहुंच चुकी थी। ग़ज़ाली मशहदी पर धर्म के अपमान का आरोप लगाया गया था जिसके कारण उनके पास देश छोड़ने के अतरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं था। वे अपने साथ जो चीज़ ले गए वह धन-दौलत नहीं बल्कि उनके भीतर निहित शायरी थी।
दसवीं शताब्दी हिजरी शमसी के इस ईरानी कवि के बारे में स्पष्ट रूप से कई बातें ज्ञात नहीं है। इतिहास की किताबों में उनके बारे मे विशेष रूप में कुछ अधिक नहीं मिलता। “हदीयतुल आरेफ़ीन” नामक किताब में उनका नाम मुहम्मद और उनके पिता का नाम अब्दुल्लाह बताया गया है। एक अन्य किताब में उनका नाम “अली रेज़ाई मशहदी” बताया गया है। ग़ज़ाली मशहदी की जन्म तिथि के बारे में भी मतभेद पाए जाते हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि उनका जन्म 930 हिजरी शमसी को हुआ था जबकि कुछ अन्य शताब्दी उनका जन्म 936 हिजरी शमसी मानते हैं। इन मतभेदों के बावजूद इस बात पर सब एकमत हैं कि ग़ज़ाली मशहदी का जन्म मशहद नगर में हुआ था। कहते हैं कि इसका उल्लेख स्वयं ग़ज़ाली मशहदी ने अपने एक शेर में भी किया है।
ग़ज़ाली मशहदी ने अपनी आरंभिक शिक्षा मशहद में प्राप्त की थी। कहा जाता है कि उनके भीतर आरंभ से ही शेर कहने की क्षमता पाई जाती थी इसीलिए वे अपने युवाकाल में भी शायरी की दुनिया में मशहूर हो गए थे। उनकी ख्याति का एक कारण यह भी था कि अपने काल के एक जानेमाने कवि की उन्होंने खुलकर आलोचना की थी जिसके कारण वे अधिक मश्हूर हो गए। ग़ज़ाली मशहदी के जीवन का अध्धयन करने से पता चलता है कि उन्होंने अपने काल के प्रचलित ज्ञान को अच्छे ढंग से हासिल किया था। बताया जाता है कि उनका झुकाव सूफीवाद की ओर भी था। “रेयाज़ुल आरेफ़ीन” नामक पुस्तक में मिलता है कि ग़ज़ाली मशहदी ने अपने काल के ज्ञान हासिल करने के साथ ही सूफीवाद की भी शिक्षा ली थी। इस प्रकार वे एक सूफ़ी भी थे। “आज़र बेगदिली” भी अपनी किताब में इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हैं कि ग़ज़ाली मशहदी का झुकाव सूफीवाद की ओर बहुत अधिक था।
जब हम कवियों के बारे में अध्ययन करते हैं तो यह देखते हैं कि बहुत से कवियों ने अपने लिए ग़ज़ाली शब्द को चुना है। इस बारे में जो तर्क दिये गए हैं वे इस प्रकार हैं। ग़ज़ाली शब्द का उच्चारण दो प्रकार से है। एक ग़ज़ाली और दूसरे ग़ज़्ज़ाली। ग़ज़्ज़ाली का अर्थ होता है बांधने वाला। कुछ कवियों ने अपने लिए ग़ज़्ज़ाली शब्द का चयन किया है जबकि कुछ ने ग़ज़ाली शब्द का चयन किया है जिसका अर्थ होता है हिरन। वैसे अधिकतर लोगों ने ग़ज़ाली को ही अपने उपनाम के रूप में प्रयोग किया है। ग़ज़ाली मशहदी ने अपनी एक कविता में यह स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपने लिए ग़ज़ाली शब्द का ही प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है हिरन। ग़ज़ाली मशहदी के जीवन का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि वे शिया मुसलमान थे।
जिस काल में ग़ज़ाली मशहदी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे उसी दौरान उनकी शायरी की चर्चा आम हो चुकी थी। वे इतना मशहूर हो चुके थे कि उनका नाम राज दरबार तक पहुंचा। कुछ समय तक वे ईरान के क़ज़वीन नगर में तत्कालीन शासक शाह तहमास्ब के दरबार में रहे। वहां पर उन्होंने शाह तहमास्ब के नाम से एक मसनवी का आरंभ किया।
सन 958 हिजरी शमसी को शाह तहमास्ब ने ग़ज़ाली मशहदी को आदेश दिया कि वे शीराज़ जाकर “ख़ाजा अमीर कजजी मेहरदाद” के विरुद्ध कार्यवाही करें जिनसे शाह तहमास्ब बहुत नाराज़ था। जिस समय शाह तहमास्ब ने ग़ज़ाली मशहदी को शीराज़ जाने का आदेश दिया था उस समय उनकी आयु मात्र 22 की थी।
शाह तहमास्ब के आदेश के अनुसार वे शीराज़ गए और अपना काम करके वापस दरबार आ गए। शाह तहमास्ब के दरबार में वापस आने के बाद उन्होंने भारत जाने की ठान ली। ग़ज़ाली मशहदी ने भारत जाने की योजना क्यों बनाई इस बारे में कोई स्पष्ट कारण तो दिखाई नहीं देता किंतु उनके काल की परिस्थितियों की समीक्षा से ग़ज़ाली मशहदी के भारत पलायन करने के कुछ कारणों का अंदाज़ा होता है।
इतिहासकारों का कहना है कि शाह तहमास्ब के काल में बहुत से लोगों का भारत पलायन करने का मुख्य कारण उस काल के शासक का हिंसक व्यवहार था। कहते हैं कि सफ़वीकाल में शासकों की हिंसा अपने चरम पर थी। शाह इस्माईल प्रथम के पुत्र शाह तहमास्ब के काल में यह और अधिक हो चुकी थी। उसके काल में बहुत से दरबारी और उसके नौकर उसकी हिंसा का शिकार हुए। शाह तहमास्ब के शासनकाल में जिन दरबारियों को यातनाएं देकर मारा गया उनमें से एक, “जलालुद्दीन ख़ांदमीर” थे। वे शाह इस्माईली प्रथम के अंतिम मंत्री थे। किसी कारणवश शाह तहमास्ब उनसे नाराज़ हो गया जिसके बाद शाह के आदेश पर उन्हें ज़िंदा जला दिया गया। इसके अतिरिक्त सफ़वीकाल के एक वरिष्ठ धर्मगुरू और चिकित्सक “रुकनुद्दीन मसूद काज़रूनी” को भी शाह तहमास्ब के क्रोध का सामना करना पड़ा था। उनको भी शाह के आदेश पर जला दिया गया।
राज दरबार में रहते हुए ग़ज़ाली मशहदी यह सब देख रहे थे। इन बातों से वे बहुत दुखी थे। शाह के व्यवहार से वे सहमत नहीं थे बल्कि असंतुष्ट थे। उनका यह मानना था कि शाह का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति का अंजाम बहुत बुरा होगा चाहे वे हों या कोई दूसरा। जानकारों का कहना है कि ग़ज़ाली मशहदी के भारत पलायन का एक कारण यह भी हो सकता है।
एक अन्य कारण यह बताया जाता है कि सफ़वी शासनकाल में सूफ़ियों के साथ राज दरबार का व्यवहार बहुत हिंसक था। कहा जाता है कि सूफ़ियों के एक गुट के आन्दोलन से ही सफ़वी सरकार अस्तित्व में आई थी किंतु इसके बावजूद सफ़वी शासनकाल, सूफ़ियों के लिए बहुत कठिन था। बहुत से इतिहासकारों के अनुसार ग़ज़ाली मशहदी का झुकाव भी सूफ़ियों की ओर था, इसके दृष्टिगत उनके सिर पर भी ख़तरा मंडरा रहा था। कुछ जानकार ग़ज़ाली मशहदी के भारत जाने का कारण इसी बात को समझते हैं।
ग़ज़ाली मशहदी के भारत पलायन के बारे में “डाक्टर ज़बीहुल्लाह सफ़ा” लिखते हैं कि ग़ज़ाली अपने भीतर निहित शायरी और स्वतंत्र सोच को छिपा नहीं सकते थे। अपनी स्वतंत्र सोच के कारण उनपर धर्मविरोध का आरोप लगा। उस काल में इस आरोप की सज़ा मौत के अतिरिक्त कुछ और नहीं होती थी। इन बातों को देखते हुए ग़ज़ाली मशहदी ने भारत पलायन का इरादा किया था। जिस दौर में ग़ज़ाली मशहदी भारत पहुंचा उस काल मे वहां पर मुग़लों का राज था। यह वे शासक थे जिनके काल में भारत में फारसी खूब फली-फूली। उस समय भारत में फारसी को विशेष महत्व प्राप्त था।
जिस काल में ईरान में शाह तहमास्ब की सरकार थी उसी काल में भारत में अकबर का राज था। इस काल मे ईरान के बहुत से साहित्यकारों ने भारत की यात्रा की। इसका एक कारण शाह तहमास्ब की ओर से कवियों को महत्व न देना जबकि अकबर के दरबार में कवियों को विशेष सम्मान मिलना था। वैसे हुमांयु ने ईरान में एक वर्ष के अपने आवास में बहुत से ईरानी कवियों को भारत आने का निमंत्रण दिया था। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विभिन्न कारणों से ईरान के 700 से अधिक शायरों या साहित्यकारों ने भारत की यात्रा की जिनमें से बहुत वहीं के होकर रह गए।