Jan ०७, २०१८ १२:०१ Asia/Kolkata

अमरीकी कांग्रेस ने 23 अक्तूबर वर्ष 1995 को अपने दूतावास को तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने का प्रस्ताव पास किया।

तब से लेकर अमरीका की विभिन्न सरकारों ने कांग्रेस के इस प्रस्ताव को लागू नहीं किया किन्तु अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने जिन्होंने अपने चुनावी प्रचार के दौरान वादा किया था, इस प्रस्ताव को लागू करने का आदेश जारी कर दिया। अमरीकी राष्ट्रपति ने क्षेत्र और दुनिया के भारी विरोध के बावजूद बैतुल मुक़द्दस को इस्राईल की राजधानी के रूप में स्वीकार कर लिया। वाइट हाऊस इस प्रस्ताव के क्रियान्वयन को हर छह महीने में एक बार टाल सकता है और ट्रम्प ने भी इससे पहले अपने भाषण में इस आदेश की समयसीमा बढ़ाने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद अमरीका ने बैतुल मुक़द्दस को इस्राईल की राजधानी के रूप में स्वीकार करके अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तावों का उल्लंघन किया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव के आधार पर बैतुल मुक़द्दस अतिग्रहित फ़िलिस्तीन की धरती का भाग है। सुरक्षा परिषद ने दिसंबर 2016 को को एक प्रस्ताव पारित किया और बल दिया कि बैतुल मुक़द्दस सहित चार जून वर्ष 1967 से पहले ही सीमाओं में किसी भी प्रकार की तबदीली को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा मगर यह कि वार्ताकार पक्ष इस बात पर सहमत हों।

इस विषय पर अमरीका के व्यवहार पर नज़र डालने से यह सच्चाई सामने आती है कि ज़ायोनी शासन के सबसे बड़े समर्थक के रूप में अमरीका, इस्राईल की सुरक्षा और उसे मज़बूत करने के प्रयास में रहा है इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने देशों के राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे में प्रभाव डालने के लिए लाभ उठाया है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने इससे पहले विश्व अहलेबैत परिषद के सदस्यों तथा इस्लामी रेडियो और टेलीवीजन संघ के प्रमुखों से मुलाक़ात में अमरीकियों की भूमिका को तीन भाग में बयान किया है। क्षेत्रीय देशो के बीच मतभेद पैदा करने की नीति, इस्लामी देशों में राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव तथा मुसलमानों के बीच मतभेद के बीज बोने की नीति, यह अमरीकियों की मुख्य नीतियां हैं।

वर्तमान समय में अमरीका यह प्रक्रिया जारी रखते हुए बैतुल मुक़द्दस को ज़ायोनी शासन की राजधानी घोषित करके क्षेत्र में नया विवाद खड़ा करना चाहता है। इस मामले को खड़ा करने के पीछे कुछ बातें हैं। क्षेत्रीय मामलों में नर्मी दिखाना या मामले के साथ हो लेना, अतिग्रहणकारियों के साथ षड्यंत्र तथा झूठे वादों पर विश्वास करना, वे विषय हैं जिनके कारण फ़िलिस्तीन समस्या के मुक़ाबले में अमरीका, इस्राईल और सऊदी अधिकारी दुसाहसी हो गये हैं।

निसंदेह पिछले पचास से अधिक वर्ष से मध्यूपर्व का सबसे महत्वपूर्ण संकट फ़िलिस्तीन का विषय और ज़ायोनी शासन द्वारा बैतुल मुक़द्दस के अतिग्रहण के पीछे लक्ष्य रहा है। इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने क्षेत्र में अमरीका और इस्राईल की प्रवृत्ति और इनके लक्ष्यों को पहचानते हुए पवित्र रमज़ान के अंतिम जुमे को विश्व क़ुद्स दिवस के रूप में मनाने का दुनिया के मुसलमानों से अह्वान किया ताकि दुनिया भर के मुसलमान फ़िलिस्तीनियों के प्रति अधिक से अधिक सहृदयता व्यक्त कर सकें।

विश्व क़ुद्स दिवस ने फ़िलिस्तीन के अतिग्रहण के विषय को दुनिया भर के मुसलमानों के सामने पहली पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। इमाम ख़ुमैनी अपने एक बयान में कहते हैं कि विश्व क़ुद्स दिवस केवल फ़िलिस्तीनियों का दिन नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जिसमें दुनिया की बड़ी शक्तियों को यह समझाना चाहिए किवे इस्लामी देशों में आगे नहीं बढ़ सकते। विश्व क़ुद्स दिवस के दिन दुनिया की समस्त बड़ी शक्तियों को यह चेतावनी दी जानी चाहिए कि इस्लामी अब तुम्हारे वर्चस्व में नहीं रहेगे और विश्व क़ुद्स दिवस, इस्लाम के जीवन का दिन है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता भी ईदे मिलादुन्नबी के अवसर पर इस्लामी एकता कांफ़्रेंस के मेहमानों, इस्लामी देशों के राजदूतों, देश के अधिकारियों और तीनों पालिकाओं के प्रमुखों से मुलाक़ात में अमरीका, ज़ायोनी शासन,  रूढ़ीवादी और विश्व शक्तियों पर निर्भर लोगों को आज के दुनिया का फ़िरऔन बताते हैं। इस्लामी जगत में युद्ध और मतभेद फैलाने के लिए उनके प्रयासों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि कुछ अमरीकी राजनेता जाने व अनजाने में कह बैठे कि पश्चिमी एशिया क्षेत्र में युद्ध और झड़पें हों ताकि ज़ायोन शासन शांति से रह सके, इस्लामी जगत का लहुलुहान शरीर, विकास की क्षमता न रख पाए।

वरिष्ठ नेता कहते हैं कि आज फ़िलिस्तीन का विषय, इस्लामी जगत के राजनैतिक मामलों में सर्वोपरि है और सभी पर यह ज़िम्मेदारी है कि फ़िलिस्तीन की स्वतंत्रता और फ़िलिस्तीनी राष्ट्र की मुक्ति के लिए प्रयास और संघर्ष करें। वरिष्ठ नेता बैतुल मुक़द्दस को ज़ायोनी शासन की राजधानी घोषित करने के बारे में मुसलमानों के दुश्मनों के दावे को उनकी अक्षमता और कमज़ोरी का चिन्ह मानते हैं और कहते हैं कि निसंदेह इस्लामी जगत इन षड्यंत्रों के मुक़ाबले में डट जाएगा, इस काम से ज़ायोनियों को सबसे अधिक नुक़सान उठाना पड़ेगा और प्रिय फ़िलिस्तीन निसंदेह आख़िरकार स्वतंत्र होगा।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने इससे पहले भी क्षेत्र में अमरीका और ज़ायोनिज़्म के गुप्त लक्ष्यों को बयान करते हुए तथा फ़िलिस्तीन के मुद्दों को एक ओर लगाने की प्रक्रिया से मुक़ाबले की आवश्यता पर बल दिया था। उन्होंने तीन साल पहले इस्लामी जगत की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को गिनवाते हुए कहा था कि सबसे महत्वपूर्ण काम फ़िलिस्तीन मुद्दा है। उन्होंने कहा कि फ़िलिस्तीन, बैतुल मुक़द्दस और मस्जिदुल अक़सा के मुद्दे को भुलाया नहीं जाना चाहिए, वह यही तो चाहते हैं, वह इस्लामी जगत को फ़िलिस्तीन के मुद्दे से निश्चेत कर देना चाहते हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पूरे इस्लामी जगत को बैतुल मुक़द्दस और मस्जिदुल अक़सा के विरुद्ध षड्यंत्रों के सामने डट जाना चाहिए, सबसे मुख्य मुद्दा, ज़ायोनी शासन का मुद्दा है। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बैतुल मुक़द्दस का मुद्दा है। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मुसलमानों के पहले क़िब्ले मस्जिदुल अक़सा का है, यह मुख्य मुद्दे हैं।

संगीत

क्षेत्रीय परिवर्तन और ज़ायोनी – तकफ़ीरी दाइशी विचार घारा के पीछे तत्वों से पता चलता है कि मध्यपूर्व एक संवेदनशील दोराहे पर खड़ा है। इस संवेदनशील चरण में क्षेत्र के भविष्य निर्धारण में इस्लामी जगत की जागरूकता बहुत आवश्यक और महत्वपूर्ण है। यद्यपि प्रतिरोध और इस्लामी जागरूकता के मोर्चे ने रणक्षेत्र में मुसलमानों के दुश्मनों की विभाजनकारी और षड्यंत्रकारी योजनाओं को विफल बना दिया किन्तु इस षड्यंत्र को कम नहीं आंकना चाहिए।

इस सबंध में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की जल्दबाज़ी से पता चलता है कि विश्व ज़ायोनिज़्म मध्यपूर्व के भविष्य और फ़िलिस्तीन तथा बैतुल मुक़द्दस की धरती की इस्लामी पहचान को बदलने के लिए विशेष रूप से ध्यान दे रहा है क्योंकि फ़िलिस्तीन, मध्यपूर्व में मुसलमानों को पहचान प्रदान करने के एक तत्व में परिवर्तित हो चुका है और यही कारण रहै कि बैतुल मुक़द्दस राजनैतिक और धार्मिक आयाम से हटकर मुसलमानों की पहचान और प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है।

अमरीकियों को पता है कि मध्यपूर्व पर वर्चस्व जारी रखने तथा इस्राईल के अस्तित्व को बाक़ी रखने के लिए मध्यपूर्व के नये रोडमैप को मज़बूत किया जाना बहुत ज़रूरी है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वह हर कार्यवाही करने को तैयार हैं।

शिकागो विश्व विद्यालय के प्रोफ़ेसर जान मेरशायमर ने 11 दिसंम्बर को तेहरान विश्व विद्यालय में अमरीका की वर्तमान सरकार और उसकी हालिया कार्यवाही के बारे में कहते हैं कि बैतुल मुक़द्दस को इस्राईल की रजाधानी के रूप में स्वीकार करने का अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का फ़ैसला, अमरीका के भीतर मौजूद कट्टरपंथियों के दबाव में लिया गया था और यह मूल भूत ग़लती थी।  अंतर्राष्ट्रीय संपर्क मामलों के इस प्रोफ़ेसर ने कहा कि अमरीकी दूतावास को तेल अवीव से बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने का ट्रम्प का फ़ैसला, अमरीका की विदेश नीति की सबसे बड़ी ग़लती थी और यही कारण है कि अमरीकी सरकार सहयोग की दृष्टि से अविश्वसनीय है।

इस समय क्षेत्र को शाब्दिक निंदा से बढ़कर किसी व्यवहारिक कार्यवाही की आवश्यकता है ताकि इन षड्यंत्रों के आयामों को बयान करके तथा इस्लामी सहयोग संगठन और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की बैठकें करके यह बताया जाए कि बैतुल मुक़द्दस के बारे में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का फ़ैसला,  दुनिया के सारे मुसलमानों के अधिकारों पर हमला है।