ग़ज़ाली मशहदी- 2
ग़ेज़ाली मशहदी दसवीं शताब्दी हिजरी के प्रसिद्ध शायर थे।
वह शाह तहमास्ब सफ़वी के दरबारी शायर थे। उन्होंने ईरान के प्रसिद्ध शायरों और कलाकारों के एक समूह के साथ भारत की यात्रा की क्योंकि भारत में ईरानी कला और शायरी को बहुत अधिक महत्व प्राप्त था। उनकी जीवनी के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं मिलता। केवल यह कहा जा सकता है कि 930 से 936 के वर्षों के बीच उनका जन्म पवित्र नगर मशहद में हुआ था। उन्होंने अपनी जन्म स्थली में आरंभिक ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने जवानी के काल में शायरी आरंभ की। वह शेर व शायरी के साथ साथ सूफ़ीवाद की ओर भी रुझान रखते थे। वह अपनी प्रसिद्ध शायरी के कारण कुछ वर्षों तक शाह तहमास्ब के दरबारी शायर भी थे और उसके कुछ समय बाद अभी वह जवान ही थे कि सफ़वी काल के माहौल के कारण उन्हें भारत पलायन करना पड़ा। जब ग़ेज़ाल मशहदी भारत पहुंचे तो भारत पर मुग़ल बादशाहों का राज था।
मुग़ल राजाओं का काल, पूर्वी और पश्चिमी इतिहासकारों के कथनानुसार भारत में फ़ारसी सहित्य और संस्कृति के प्रचलन तथा ईरानी शायरों के पलायन का काल था। पलायन का एक मुख्य कारण सफ़वी काल की दयनीय दरबारी स्थिति और दूसरी ओर राजा महाराजाओं की ओर से शायरों पर अधिक ध्यान न दिया जाना है। यह भी कहा जाता है कि सफ़वी राजा फ़ारसी भाषा और साहित्य पर विशेष ध्यान नहीं देते थे। उदाहरण स्वरूप हुमायूं विशेषकर जब वह एक वर्ष तक ईरान में रहा, तो उसने ईरानी शायरों और लेखकों से कहा कि वह भारत पलायन करें । इस बात के दृष्टिगत फ़ारसी साहित्य और कला पर मुग़ल बादशाह विशेष ध्यान देते हैं इसीलिए अकबर के काल में फ़ारसी सहित्य और ईरानी कला अपने चरम पर पहुंच गयी थी।
जब ग़ेज़ाली मशहदी ने भारत की ओर पलायन किया उस समय भारत पर मुग़ल राजाओं की सरकार थी। यह लोग ज़हीरुद्दीन बाबर के वंशज थे। बाबर उन राजाओं में से एक थे जिन्होंने फ़ारसी भाषा और साहित्य के पालन पोषण और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और वह ईरानी सभ्यता और संस्कृति से बहुत अधिक प्रेम करते थे।
बाबर का पूरा नाम ज़हीरुद्दीन था। वह तैमूर लंग के पुत्र जलालुद्दीन मीरानशाह के वंशज थे और उन्होंने भारत पर राज किया और उनके बाद उनके पुत्र नासिरुद्दीन हुमायूं और उसके बाद उनके पुत्र अकबर ने भारत पर राज किया।
जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर १५४२ से १६०५ तक भारत पर राज किया वह तैमूरी वंशावली के मुग़ल वंश के तीसरे शासक थे। अकबर को अकबरे आज़म, शहंशाहे अकबर, महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है। सम्राट अकबर मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर के पौत्र और नसीरुद्दीन हुमायूं एवं हमीदा बानो के पुत्र था। बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से संबंधित था अर्थात उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान के थे और मातृपक्ष का संबंध चंगेज़ खां से था। अकबर के शासन के अंत तक १६०५ में मुगल साम्राज्य में उत्तरी और मध्य भारत के अधिकांश भाग सम्मिलित थे और उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। बादशाहों में अकबर ही एक ऐसे बादशाह थे, जिसे हिन्दू मुस्लिम दोनों वर्गों का बराबर प्यार और सम्मान मिला।
बताया जाता है कि जब भारत में अकबर का राज था तो ईरान में शाह तहमास्ब सफ़वी का शासन काल था, यही वह काल था जब सफ़वियों के क्षेत्र में उपद्रव शुरु हुआ था और वर्ष 996 में शाह अब्बास प्रथम के सत्ता में आने तक यह उपद्रवह का क्रम जारी रहा। यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मुग़ल सम्राट फ़ारसी भाषा और साहित्य पर विशेष ध्यान देते थे और प्रसिद्ध शायर ग़ेज़ाल मशहदी के भारत पलायनक करने से यह अपने चरम पर पहुंच गया।
ग़ेज़ाली मशहदी अपनी जवाने में ही प्रसिद्ध फ़ारसी शायर हो गये थे और वह शाह तहमास्ब के दरबारी शायर भी हो गये थे। प्रसिद्ध लेखक अहमद गुलचीन मआनी अपनी पुस्तक कारवाने हिंद में लिखते हैं कि कहा जाता है कि चूंकि वह ख़ुरासान से इराक़ और फिर फ़ार्स गये और वहीं से उनमें भारत जाने की रुचि पैदा हो गयी और उन्होंने समुद्री मार्ग से भारत की यात्रा की। कहते हैं कि ग़ेज़ाली आरंभ में दकन अर्थात वर्तमान हैदराबाद गये किन्तु वहां भी उनके मन की मुराद पूरी नहीं हुई यहां तक कि ख़ान ज़मान के नाम से प्रसिद्ध अली क़ुली ख़ान ने जो अकबर शाह और जौनपूर के गवर्नर के निकटवर्तियों में थे, ग़ेज़ाली के जौहर को पहचाना। कहा जाता है कि उस समय की बात है जब ख़ान अकबर बादशाह के हाथों पराजित हुए और मारे गये तो मौलाना ग़ेज़ाली को अकबर की सेना ने बंदी बना लिया और उसी समय शहंशाह अकबर की नज़र उन पर पड़ी और उसके बाद वह मुग़ल दरबार के शायर हो गये। ग़ेज़ाली मशहदी को दरबार से मलिकुश्शोरा का दर्जा मिला और उन्होंने अपनी उम्र के अंतिम छह साल महान शहंशाह के दरबार में बिताए।
वह पहले शायर थे जो मुग़ल दरबार में मलिकुश्शोरा के दर्जे तक पहुंचे और वह अकबर के आठ प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। 27 रजब 980 को अहमदाबाद के गुजरात में अचानक उनका देहान्त हो गया। अकबर के आदेश पर उन्हें शाही क़ब्रिस्तान सरगंज में दफ़्न कर दिया गया।
ग़ेज़ाली मशहदी के कई गद्य और पद्य संकलन मौजूद हैं। उनकी पुस्तकों के बड़ा होने की वजह से उन्हें परिश्रमी शायरों की श्रेणी में क़रार दिया जा सकता है। ग़ेज़ाली मश्हदी का काव्य संकल्न ब्रिटिश संग्राहलय में मौजूद है। उनकी पुस्तकों में वह भूमिका शामिल है जो उन्होंने अपनी रचना पर लिखी। उनकी यह सारी भूमिकाएं और पुस्तकें ब्रिटिश संग्राहलय में सुरक्षित हैं।
उनकी एक अन्य पुस्तक है जो गद्य के रूप में है और अब तक बाक़ी है। डाक्टर ज़बीह उल्लाह सफ़ा असरारुल मकतूम नामक उनकी पुस्तक को सूफ़ीवाद की मसनवी बताया गया है जो परिज्ञान के समुद्र में डूब कर लिखी गयी है। उन्होंने सूफ़ीवाद में रशहातुल हयात और नैतिकता के विषय पर मिरअतलु कायनात नामक पुस्तक लिखी है।
श्री ग़ेज़ाली की अधिकतर रचनाएं गद्य के रूप में हैं। दीवाने आसरुश्शबाब भी ब्रिटिश संग्राहलय में सुरक्षित है जिसमें दो प्रस्तावना हैं और उनका शेरी नामक शहरी ग़ेज़ाली का भी उल्लेख है। इस दीवान में कुछ शेर व क़सीदे हैं जो अन्य ईरानी शायरों की भांति, ईश्वर की सराहना और उसके दूत हज़रत मुहम्मद की प्रशंसा से विशेष हैं। इस दीवान में 555 ग़ज़लें हैं जो वर्णमाला के अनुसार है। इसमें साक़ी नामा, मसनवी, रोबाई और कई अलग अलग शेर लिखे हुए हैं।
इस पुस्तक को शायर ने वर्ष 966 हिजरी में 30 वर्ष की आयु में समाप्त किया था और चूंकि इसमें वर्णित ग़ज़लों को उन्होंने युवाकाल में लिखा है इसीलिए उसका नाम आसरुश्शबाब रखा है। इस दीवान में शायरों की परंपरा के अनुसार शाह तहमास्ब, ख़ान ज़मान और अन्य राजाओं की तारीफ़ में शेर हैं। दीवाने गंजे अकबरी में बादशाह अकबर की प्रशंसा में भी शेर हैं। नक़्शे बदीअ, मशहदे अनवार, क़ुदरते आसार व मिरआतुस्सफ़ा, उनकी मसनवी हैं। आइनये ख़याल में ग़ज़ले, रोबाईयां और क़तआत शामिल हैं।