ग़ज़ाली मशहदी- 3
ग़ज़ाली मश्हदी दसवीं हिजरी क़मरी के मशहूर शायरों में हैं।
वह उन 700 शायरों में शामिल हैं जो तत्कालीन ईरानी सफ़वी शासन में शायरी को अहमियत न दिए जाने के कारण भारत चले गए थे और ज़िन्दगी के आख़िरी क्षण तक भारत में रहे। ग़ज़ाली मश्हदी के दौर में ईरान में सफ़वी शासक तह्मास्ब का शासन काल था। ग़ज़ाली मश्हदी भी भारत में ईरानी शायरों व कलाकारों को अत्यधिक अहमियत दिए जाने के कारण भारत पलायन कर गए। उनके जीवन के बारे में लिखित रूप में बहुत ज़्यादा बातें नहीं मिलतीं। सिर्फ़ इतना कहा जा सकता कि वह 930 से 936 के हिजरी क़मरी बीच मश्हद में पैदा हुए। उनका बचपन मश्हद में गुज़रा और वहीं उन्होंने शिक्षा हासिल की। उन्होंने जवानी में ही शायरी शुरु कर दी थी और शायरी के साथ साथ सूफ़ीवाद की ओर भी उनमें रुझान पैदा हुआ। वह कुछ समय तक राजा तह्मास्ब के दरबार में शायर रहे और कुछ समय बाद जवानी में ही सफ़वी शासन काल की स्थिति के मद्देनज़र भारत चले गए और जीवन के अंत तक भारत में रहे। ग़ज़ाली मश्हदी 27 रजब 980 हिजरी क़मरी में अचानक इस दुनिया से चल बसे। उन्हें मुग़ल बादशाह अकबर के आदेश पर सर्गन्ज में दफ़्न किया गया जहां अनेक राजाओं व गणमान लोगों की क़ब्रें हैं।
ग़ज़ाली मश्हदी की अनेक रचनाएं मौजूद हैं जिनमें से कुछ अहम रचनाओं के बारे में पिछली कड़ी में उल्लेख किया। उनकी रचनाओं की बहुतायत के मद्देनज़र उन्हें बड़े शायरों में गिना जाता है। उनके शेरों से उनकी क्षमता का पता चलता है। उनके शेरों की ज़बान वाक्पटुता से भरी हुयी है। उनकी इस विशेषता के बारे में डाक्टर सफ़ा कहते हैं, “”...
उनकी ग़ज़लों में वही कोमलता है जैसा ग़ज़ल पढ़ने वाला अपेक्षा रखता है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि ग़ज़ाली ऐसे शायर हैं कि उनके जैसा शायर पूरी दसवीं शताब्दी में बहुत कम नज़र आएगा, ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दियों की तो बात ही अलग है। उनकी शायरी हाफ़िज़ की तरह कई आयामी है। ग़ज़ाली के दीवान में सुधार करने वाले क़ुर्बानपूर आरानी का कहना है, “उन्होंने हाफ़िज़ के सामाजिक व्यंग्य से प्रभावित होकर सन्यासियों और सूफ़ियों पर सांकेतिक रूप में व्यंग्य किया है।”
इसलिए यह कह सकते हैं कि ग़ज़ाली मश्हदी की शायरी की एक बड़ी विशेषता सामाजिक व्यंग्य है।
बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि अगर फ़ारसी साहित्य के उन शेरों को सामाजिक दृष्टि से देखा जाए कि जिनमें सामाजिक व्यंग्य है तो ईरानी इतिहास के अस्त व्यस्त दौर को बेतहत ढंग से समझा जा सकता है। शायरों व लेखकों की रचनाओं में व्यंग्यात्मक विचारों को पढ़ कर समाज के विभिन्न आयामों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। सफ़वी शासन के हालात और उस दौर की सामाजिक स्थिति ने शायरों व विद्वानों को आलोचना करने पर मजबूर किया और इस तरह सामाजिक व्यंग्य वजूद में आया। व्यंग्य की शब्दकोष में अनेक परिभाषाएं हैं। आम तौर पर व्यंग्य करने वाले इस कला के ज़रिए कमियों और नाकामियों को प्रतिबिंबित करते हैं। व्यंग्य में दिखावा, पाखंड, अज्ञानता, मूर्खता और इंसान की ग़लतियों पर निशाना साधा जाता है। व्यंग्य करने वाला शायर या लेखक लोगों या समाज में प्रचलित रीति रिवाजों व मामलों का मज़ाक़ उड़ाकर उनकी आलोचना करता है। व्यंग्य करने वाले का लक्ष्य समाज में व्याप्त बुरायी में सुधार करना होता है।
ग़ज़ाली मश्हदी की शायरी में व्यंग्य मूल तत्व की हैसियत रखता है। वह दिखावा व पाखंड के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए व्यंग्य का सहारा लेते हैं। वह हाफ़िज़ की तरह पाखंड के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए व्यंग्य को हथियार के रूप में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि पाखंड से ज्ञान, व्यवहार, विशेषता, कला, व्यक्ति और समाज तबाही की ओर जाता है। ग़ज़ाली मश्हदी की सारी ग़ज़लों में बहत कम ऐसी ग़ज़लें मिलेंगी जिसमें एक शेर भी संयासियों, सूफ़ियों, पीरों और मुहतसिबों अर्थात अपने दौर में लोगों को बुरायी से रोकने के लिए नियुक्त किए गए दरोग़ाओं पर व्यंग्य न हो।
हालांकि ग़ज़ाली मश्हदी ग़ज़ल में अपने पूर्ववर्तियों का अनुसरण करते हैं और उन्हें बाबा फ़ुग़ानी से प्रभावित बताया जाता है लेकिन सामाजिक व्यंग्य में वह हाफ़िज़ से प्रभावित दिखायी देते हैं। जिस तरह हाफ़िज़ अपनी बात को बयान करने में व्यंग्य को बहुत उपयोगी पाते हैं उसी तरह ग़ज़ाली मश्हदी ने भी इससे लाभ उठाने की कोशिश की है। ग़ज़ाली के दौर की अस्त व्यस्त व दिखावे से दूषित स्थिति हाफ़िज़ के दौर से बहुत अलग नहीं लगती। क्योंकि भारत में जिन जगहों पर ग़ज़ाली ने ज़िन्दगी गुज़ारी वहां हुकूमत कर रहे शासनों के दरबार और ईरान में कुछ सफ़वी शासकों के दरबार में पाखंडी संयासी, उपदेशक और सूफ़ी मौजूद थे। ये पाखंडी सन्यासी आम लोगों को धोखा देने के लिए अपने विदित रूप को मर्परायण व पवित्र दिखाते जबकि भीतर से भ्रष्टाचार में डूबे होते थे। इस तरह के माहौल का सीधे प्रभाव समाज के संबंध में शायरों के विचारों व शेरों और सामाजिक संबंध पर पड़ा है। जिन जिन लोगों पर ग़ज़ाली मश्हदी ने व्यंग्य किया है उनमें किसी का नाम नहीं लिया है और न ही उन लोगों के संबंध में घटिया शब्द इस्तेमाल किए। इस दृष्टि से ग़ज़ाली के व्यंग्य की हाफ़िज़ के व्यंग्य से तुलना की जा सकती है।
ग़ज़ाली मश्हदी के दीवान में जिन हस्तियों पर व्यंग्य है वह सन्यासी, पीर, उपदेशक, सूफ़ी, विद्वान और मुहतसिब अर्थात दूसरों को बुरायी से रोकने के लिए नियुक्त दरोग़ा है। उस दौर में ये लोग प्रशासनिक संस्था में बहुत अहमियत रखते थे। इन्हीं लोगों के हाथ में राजनैतिक व सामाजिक शक्ति होती थी।
ग़ज़ाली इन लोगों के विचार, व्यवहार और क्रियाकलापों की आलोचना करते थे क्योंकि इन लोगों का कभी कभी एक दूसरे से व्यापक संपर्क होता था। ग़ज़ाली मश्हदी के शेर उस समाज की आलोचना करते हैं जिसमें दावों और कर्म के बीच लंबी खायी है और दिखावा व पाखंड ने इस्लामी व नैतिक मूल्यों का स्थान ले लिया है। दूसरे शब्दों में ग़ज़ाली मश्हदी के दौर के समाजे में धर्म पाखंडियों के हाथ का खिलौना बन गया था। ग़ज़ाली के व्यंग्य का एक लक्ष्य धर्म के मूल स्वरूप को उस नक़ली धर्म से अलग दिखाना था कि जिस नक़ली धर्म को लागू करने पर पाखंडी संयासी और सूफ़ी बल देते थे।