Jan २२, २०१८ १३:५५ Asia/Kolkata

ग़ेज़ाली मशहदी शाह तहमास्ब सफ़वी काल के प्रसिद्ध शायर थे जिन्होंने भारत में ईरानी शायरों और कलाकारों की रेलपेल के काल में भारत की यात्रा की।

शाह तहमास्ब सफ़वी के काल में बहुत से ईरानी कलाकारों और शायरों ने भारत का रुख़ किया था। उनकी जीवनी के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं मिलता। केवल यह कहा जा सकता है कि 930 से 936 के वर्षों के बीच उनका जन्म पवित्र नगर मशहद में हुआ था। उन्होंने अपनी जन्म स्थली में आरंभिक ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने जवानी के काल में शायरी आरंभ की। वह शेर व शायरी के साथ साथ सूफ़ीवाद की ओर भी रुझान रखते थे। वह पहले शायर थे जो मुग़ल दरबार में मलिकुश्शोरा के दर्जे तक पहुंचे और वह अकबर के आठ प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। 27 रजब 980 को अहमदाबाद के गुजरात में अचानक उनका देहान्त हो गया। अकबर के आदेश पर उन्हें शाही क़ब्रिस्तान सरगंज में दफ़्न कर दिया गया।

ग़ेज़ाली मशहदी बहुत सक्षम और यत्न शायर थे और उनकी इस क्षमता और प्रयास को उनकी किताबों, रचनाओं और जिस मैदान में उन्होंने क़लम उठाया भलि भांति देखा जा सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार ग़ेज़ाली मशहदी हाफ़िज़ के सामाजिक कटाक्ष से बहुत प्रभावित थे और यही कारण था कि उनके शेरों की एक बड़ी विशेषता, सामाजिक कटाक्ष था। अपने विचारों में ग़ेज़ाली द्वारा कटाक्ष के प्रयोग का लक्ष्य, समाज में फैली हुई बुराईयों को दूर करना और समाज सुधार करना रहा है।

 

ग़ेज़ाली मशहदी के दीवान में विभिन्न लोगों की आलोचनाएं की गयी हैं जिनमें ईश्वरीय भय रखने वाले, शैख़, परामर्शदाता, सूफ़ी, बुद्धिजीवी और दूसरों डराने तथा बुराई से दूर करने वाले शामिल हैं। साहित्य के आलोचकों ने इन लोगों को समाज का एक वर्ग बताया है और इन्हें एक गुट की संज्ञा  दी है न कि एक व्यक्ति की। इन्हीं में से एक ज़ाहिद अर्थात ईश्वरीय भय रखने वाला है जो ईरान के सामाजिक इतिहास के दौरान बहुत ही संवेदनशील और प्रभावी हस्ती का मालिक होता है। यह गुट, ईरान में कटाक्ष करने वालों की कटाक्ष और आलोचकों की आलोचनाओं से सुरक्षित रहा है। ग़ेज़ाली ने भी हाफ़िज़ का अनुसरण करते हुए ज़ाहिद को समाज के अन्य भ्रष्ट लोगों और दिखावा करने करने वालो से अधिक निशाना बनाया क्योंकि ज़ाहिद को पवित्र और साफ़ सुधरा होना चाहिए। उसकी सबसे वास्तविक ज़िम्मेदारी और जिसके बारे में वह स्वयं भी दावा करता है वह संसार को छोड़ना और उपासना करते हुए परलोक पर ध्यान देना है। लोगों को उनसे यही अपेक्षा होती है किन्तु फ़ारसी शेरों में जो ज़ाहिद के नाम पर जो छवि पेश की जाती है वह इनसे पूर्ण रूप से भिन्न होती है। ग़ेज़ाली ने इन लोगों को सुधारने के उद्देश्य से उनके विरुद्ध क्रांति की ठान ली और कभी उन्होंने खुलकर और कभी इशारों में उनपर जमकर कटाक्ष किया। उन्होंने गली कूचों में जग हंसाई कराई।

 

ज़ाहिद, वास्तविक प्रेम से लाभान्वित नहीं होते और यही कारण था कि ग़ेज़ाली का मानना था कि यही वजह है कि ईश्वर ने उसके मार्गदर्शन का मार्ग प्रशस्त नहीं किया। वह ज़ाहिदों की अनुशंसा करते हुए कहते हैं कि प्रेमियों के जमावड़े में झूठा दावा छोड़ दे और इधर उधर न फैलाए क्योंकि प्रेमी उस चरण पर पहुंच गये हैं कि वह ज़ाहिदों के सांसरिक स्थान से भी अवगत हैं और ज़ाहिदों के झूठ और उनके परिज्ञानी स्थानों की वास्तविकता को भी समझ चुके हैं।

ग़ेज़ाली के अनुसार, ज़ाहिद आत्ममुग्ध है और वह दूसरों की केवल बुराई ही देखता है। ग़ेज़ाली ने भी इस्लाम धर्म के महापुरुषों का अनुसरण करते हुए घमंड और आत्मगुग्धता को सत्य के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट और सबसे बड़ी समस्या समझते हैं क्योंकि आंतरिक इच्छाओं से संघर्ष करने वाले और तरीक़त का मार्ग तय करने वाले स्वयं के सुधार के प्रयास में हैं किन्तु ज़ाहिदों का घमंड, अंततः पथभ्रष्टता के कुएं में गिरा देगा।

ग़ेज़ाली ने जिन लोगों पर विशेष रूप से ध्यान दिया है उनमें से एक मोहतसिब है। मोहतसि की ज़िम्मेदारी है कि वह उन चीज़ों से बंदों को रोके जिसको इस्लाम धर्म ने मना किया है, शराब पीने वालों को सज़ाएं देना इत्यादि यह सब मोहतसिब का काम है किन्तु वह स्वयं शराब पीता है और जब वह अपने दिखावे से तंग आ जाता है तब वह शराब तलाश करने लगता है।

ग़ेज़ाली मशहदी, मोहतसिब के जीवन और उसके कार्यों के बीच पाए जाने वाले विरोधाभासों की ओर संकेत करते हैं किन्तु वह क्या है और उसका व्यवहार कैसा है? उसको वह कटाक्ष के रूप में पेश करते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस शैली को बयान करने के पीछे ग़ेज़ाली का लक्ष्य, सामाजिक विरोधाभासों को पेश करना है। उनका क़लम और उनका कटाक्ष, विरोधाभासी तत्वों से अस्तित्व में आता है।

ग़ेज़ाली अपने कुछ शेरों में , परामर्शदाताओं की बुराईयों और कमियों को स्वयं से जोड़ते हैं किन्तु चालाक, समझदार और बात समझने वाले लोग उनका उद्देश्य अच्छी तरह समझ जाते थे और शायरों के अंतिम लक्ष्य को जो भ्रष्ट और दिखावेबाज़ थे, समझ जाते हैं।

ग़ेज़ाली ने कटाक्ष के माध्यम से अपने विचार पेश करके मुर्दा समाज में नई रूहा फूंकने का प्रयास किया। ग़ेज़ाली ने इसी प्रकार समाज के अन्य वर्गों की भी आलोचना की है जिनमें से एक वह हाजी हैं जो केवल उसका बाहरी रूप ही देखते हैं। समाज के विभिन्न वर्ग के लोग हज और इस अध्यात्मिक यात्रा के तर्क को सही तरह से समझ नहीं सके हैं और यही कारण है कि पिछली कई शताब्दियों से कितनी अधिक परेशानी सहन करके लोग हज पर जाते हैं किन्तु उनके भीतर किसी भी प्रकार का परिवर्तन देखने को नहीं मिलता। वे जिनके शेर सामाजिक कमियों को पेश करते हैं और कटाक्ष की मीठास रखते हैं नासिर ख़ुसरू और हाफ़िज़ जैसे शायरों ने वास्तविकता को पेश किया। ग़ेज़ाली मशहदी ने भी काबे का अपना लक्ष्य केवल प्रेमी का गलियारा बताया जिसके महत्व को हाजियों को समझना चाहिए।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ग़ेज़ाली के कटाक्ष, नैतिक, संतुलित और योग्य हैं। उन्होंने अपने किसी भी कटाक्ष में स्तर से गिर कर बात नहीं की और किसी पर कींचड़ नहीं उछाली है।