Jan २३, २०१८ ०९:२५ Asia/Kolkata

मोहम्मद हुसैन नज़ीरी नीशापुरी फ़ार्सी काव्य के इतिहास के एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने इस काव्य को शैली प्रदान की।

उन्होंने अपने समय के और उसके बाद के घटनाक्रमों को प्रभावित किया। नज़ीरी दसवीं एवं ग्याहरवीं सदी के एक ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताओं ने आम लोगों के दिल को छुआ, उन्होंने अपने अधिकांश शेर आम बोल चाल में ही कहे हैं।

 

फ़ार्सी काव्य के इतिहास में ऐसे अनेक नाम हैं, जिनका महत्व लगभग एक समान है। हज़ारों कवियों और विद्वानों ने जन्म लिया और उन्होंने अपनी रचनाओं के रंग बखेरे और चले गए, हालांकि इन हज़ारों नामों में से कुछ नाम लोगों को याद रह जाते हैं। समय बीतने के साथ साथ इनमें से कुछ नाम अधिक लोकप्रियता होते जाते हैं, जबकि कुछ का रंग फीका पड़ता जाता है। हालांकि उनकी रचनाओं का मूल्य किसी भी तरह से उन कवियों की रचनाओं से कम नहीं होता है, जिनकी लोकप्रियता बढ़ती जाती है। जिस देश में समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता का अभाव होता है और वहां विद्वानों की संख्या कम होती है, तो वहां के सभी लोग उन विद्वानों से परिचित होते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

ईरान जैसे विशाल देश में, जिसकी संस्कृति हज़ारों साल पुरानी है और जहां अबू रिहान बेरूनी, इब्ने सीना, ख़्वारज़्मी, सआदी, मौलवी, राज़ी, फ़ाराबी, हाफ़िज़ और ख़य्याम जैसे हज़ारों कवि एवं विद्वान गुज़रे हों, वहां प्राकृतिक रूप से कुछ विद्वानों के नाम का रंग फीका पड़ जाता है। विशेषज्ञों ने नज़ीरी नीशापुरी को फ़ार्सी काव्य का पैग़म्बर कहा है और उन्हें फ़ार्सी ग़ज़ल के हरे फ़ीरोज़े का नाम दिया है। वह ऐसे व्यक्ति थे जिसने फ़ार्सी काव्य और विशेष रूप से अपने समकालीन एवं उसके बाद की ग़ज़ल को अत्यधिक प्रभावित किया और उसे बदल दिया। उनकी नस्ल से या उनके बाद की नस्ल से जो नाम उनसे जुड़े वह भी यादों में बाक़ी रह गए, कुछ लोग ऐसे थे जो उन पर वरीयता नहीं रखते थे, जैसे कि सायब तबरेज़ी ने स्पष्ट रूप से उनके स्थान को स्वयं से और अन्य साथियों से विशिष्ट माना है।

मोहम्मद हुसैन नज़ीरी नीशापुरी दसवीं शताब्दी के मध्य में नीशापुर में पैदा हुए। उन्होंने इसी शहर में साहित्य की तालीम हासिल की। उनके परिवार का मूल व्यवसाय व्यापार था। उन्होंने बहुत ही कम उम्र से शेर कहना शुरू कर दिया था, कहा जाता है कि जवानी तक पहुंचते पहुंचते पूरा ख़ुरासान उन्हें एक कवि के रूप में पहचानता था। उन्होंने अपनी जवानी की शुरूआत में काशान की यात्रा की। उस समय काशान, इस्फ़हान और क़ज़वीन वुक़ूअ शैली के कवियों के तीन केन्द्र थे। काशान में नज़ीरी ने शायरी की महफ़िलों में भाग लिया और जवानी की अवस्था में इस शैली के महारथियों को प्रभावित किया, विशेष रूप से वह ग़ज़ल जो नज़ीरी के बाद, उसका जवाब देना शायरी की परम्परा सी बन गई, लेकिन उनकी तरह से कोई भी उतनी उच्च कोटि की शायरी नहीं कर पाया।

नज़ीरी युवा अवस्था में इराक़ गए और वहां के कवियों के साथ उन्होंने शेरों का आदान प्रदान किया, इस तरह उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। वह शोहरत से दूर एक ऐसे स्थान की खोज में थे, जहां अपनी कला को परवान चढ़ाने के साथ शांति से जीवन बिता सकें। उस समय उन्हें अब्दुर्रहीम बीरम ख़ाने ख़ानां का निमंत्रण मिला और वह भारत की यात्रा पर चल दिए।

नवीं हिजरी शताब्दी में ईरान के पूरब में हेरात में तैमूरी शासकों और ईरान के पश्चिम में स्थित तबरेज़ में आक़ क़ुवैनलू शासकों ने शायरी, संगीत, वास्तुकला और अन्य कलाओं में रिनैसंस उत्पन्न कर दिया था। आक़ क़ुवैनलू शासकों की परम्परा सफ़वी शासकों को स्थानांतरित हो गई और हेरात के तैमूरी शासकों की रिनैसंस हेरात दरबार के कमज़ोर पड़ने के बाद भारत में तैमूरी शासकों तक पहुंच गई, जो भारत में महान मुग़लों के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस परिवार ने भारत में ईरानी कला एवं साहित्य की ऐसी ज्योति जगाई जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। भारत के मुग़ल शासकों ने फ़ार्सी के समस्त साहित्यकारों, कवियों, कलाकारों और वास्तुकारों को भारी ख़र्च करके भारत में एकत्रित किया, यहां तक कि न केवल मुग़ल शासकों के दरबार में बल्कि भारत के प्रांतीय दरबार में भी, जो सफ़वी शासकों के दरबार की बराबरी करते थे, ईरानी कलाकार एकत्रित हो गए। हर कवि एवं कलाकार अपने शेर या कला के बदले भारत जाकर काल्पनिक धन जुटाना चाहता था। यही सोच नज़ीरी के दिमाग़ में भी घर कर गई और वह काशान से भारत चले गए।

आगरा शहर, जहां ताज महल स्थित है, उस समय भारत की राजधानी था और ख़ाने ख़ानां केन्द्रीय शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए अपनी सेना के साथ गुजरात से आगरा गए थे। नज़ीरी भारत पहुंचकर अब्दुर्रहीम ख़ान अर्थात ख़ाने खानां के दरबारियों में शामिल हो गए। वहां उन्हें साहित्य के प्रेमी ख़ान के सामने शेर पढ़ने का पहली बार अवसर प्राप्त हुआ। युवा कवि नज़ीरी के लिए यह एक बहुत महत्वपूर्ण अवसर था। नज़ीरी को वह मार्ग प्राप्त हो गया, जिससे उनका भविष्य निर्धारित होने वाला था। इस युवा कवि ने ख़ाने ख़ानां की प्रशंसा में एक क़सीदा लिखा। यह घटना 992 हिजरी से संबंधित है। नज़रीरी के इस क़सीदे को ख़ाने ख़ानां ने पसंद किया और उन्हें अपने दरबारियों में शामिल कर लिया। युवा कवि को इसी मौक़े की तलाश थी।

मिर्ज़ा अब्दुर्रहीम ख़ाने ख़ानां बिन बीराम ख़ान एक योद्धा, साहित्यकार, एवं दयालु व्यक्ति थे और वे ईरानी कवियों एवं कलाकारों को बहुत महत्व देते थे और उनका प्रोत्साहन करते थे। वे एक बहादुर योद्धा थे और अकबरे आज़म के सेनापति थे, विभिन्न युद्धों में उन्होंने अपनी बहादुरी और साहस के जौहर दिखाए थे। गुजरात युद्ध के बारे में है कि उन्होंने 5 हज़ार सैनिकों के साथ दुश्मन के 50 हज़ार सैनिकों को पराजित कर दिया। दक्खिन के शासक के रूप में ख़ाने ख़ानां का दरबार साहित्य एवं काव्य का केन्द्र था। नज़ीरी नीशापुरी, उर्फ़ी शीराज़ी और नौयी ख़बूशानी जैसे बड़े कवि उनके दरबारियों में शामिल थे। ख़ाने ख़ानां के जीवन के अंत तक कवि एवं साहित्यकार उनकी इस विशिष्टता से लाभान्वित होते रहे। भारतीय साहित्यकार एवं दक्ष विद्वान अल्लामा शिब्ली नोमानी के अनुसार, भारत में फ़ार्सी साहित्य के विकास में ख़ाने ख़ानां की अहम भूमिका थी और उन्हीं के कारण भारत में फ़ार्सी शायरी का उज्जवल दौर शुरू हुआ। वे लिखते हैं कि ख़ाने ख़ानां के समर्थन से साहित्य का विकास शुरू हुआ। वे ख़ुद भी एक अनुभवि एवं परिपक्व शायर थे और तुर्की एवं फ़ार्सी में शेर कहते थे और एक बड़ी संख्या में कवि एवं साहित्यकार उनके दरबार में अहम पदों पर आसीन थे।   

          उन्शापुरी दसवीं शताब्दी के मध्य में निका हरा फ़ीरोज़ा ान गुज़रे हों, वहां प्राकृतिक  ों को याद रह जाते हैं।