Jan २३, २०१८ ०९:४१ Asia/Kolkata

हमने बताया कि मोहम्मद हुसैन नज़ीरी नीशापुरी, दसवीं शताब्दी हिजरी के उत्तरार्ध में ईरान के नीशापुर नगर में पैदा हुए और इसी शहर में उन्होंने आरंभिक ज्ञान प्राप्त किया।

अभी वे युवा हुए ही थे कि उनकी शायरी का डंका ख़ुरासान से बाहर भी बजने लगा। वे युवाकाल में अपनी शायरी की क्षमता को परखने के लिए काशान और फिर इराक़ गए और इन क्षेत्रों के शायरों के साथ शायरी करने लगे जिससे उनकी ख्याति बढ़ने लगी। इसके बाद नज़ीरी नीशापुरी ने एक अच्छे व शांत जीवन के लिए भारत की यात्रा की। वे आगरा पहुंचे और जहांगीर के सरदारों में से एक अब्दुर्रहीम ख़ाने ख़ानां का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। ख़ाने ख़ानां ने नज़ीरी नीशापुरी को अपने साथ रहने का प्रस्ताव दिया। वे इसी अवसर की प्रतीक्षा में थे अतः उन्होंने सहर्ष यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया और ख़ाने ख़ानां के निकटवर्ती लोगों में शामिल हो गए। अब्दुर्रहीम ख़ाने ख़ानां का दरबार, जो दकन के शासक और स्वयं भी शायर थे और तुर्की व फ़ारसी भाषा में शेर कहते थे, बहुत से शायरों व कलाकारों का शरण स्थल था।

नज़ीरी नीशापुरी ने साहित्य प्रेमी इस शासक के दरबार में उच्च स्थान प्राप्त किया और ख़ाने ख़ानां तथा सम्राट जहांगीर के गुणगान में शेर कह कर अकूत संपत्ति प्राप्त की। उन्होंने अपनी धन संपत्ति को एकत्रित नहीं किया बल्कि अपना एक अलग दरबार बनाया जिसके माध्यम से उन्होंने ईरान से आने वाले कलाकारों, कवियों और साहित्यकारों की मदद की। पलायनकर्ता ईरानियों की उन्होंने इस प्रकार मदद की कि उन्हें भारत में ईरानियों का माई-बाप कहा जाता था और शायद नज़ीरी की काव्य शैली के आश्चर्यजनक ढंग से फैलने का एक कारण, कवियों से उनका यही प्रेम था। कवि जिस तरह से जहांगीर और ख़ाने ख़ानां समेत उसके सरदारों का गुणगान करते थे उसी तरह नज़ीरी का भी गुणगान करते थे और उनसे इनाम हासिल किया करते थे और चूंकि ख़ाने ख़ानां स्वयं भी शायर थे इस लिए वे अपनी कविताओं को इस तरह लिखते थे कि ख़ाने ख़ानां को पसंद आए। कुछ साहित्यकारों का कहना है कि यही चीज़ नज़ीरी की काव्य शैली के प्रसार का कारण बनी है। नज़ीरी नीशापुरी काफ़ी समय तक भारत में रहने और जहांगीर व ख़ाने ख़ानां के समर्थन के छाया में काफ़ी धन दौलत कमाने के बाद वर्ष 1021 हिजरी क़मरी में गुजरात में इस दुनिया से गुज़र गए और इसी शहर में उन्हें दफ़्न किया गया। उनकी मौत के बारे में लिखा गया है कि मानो उनके मरने से फ़ारसी में शेर कहने वाले अनाथ हो गए।

 

नज़ीरी नीशापुरी को अपनी एक अलग और विशिष्ट शैली का शायर कहा जाना चाहिए। वे एक संपूर्ण शायर थे क्योंकि उन्होंने शायरी के सभी क्षेत्रों में हाथ आज़माया था और बड़े अच्छे शेर कहे थे। वे जिस काल में थे उसकी कुछ विशेषताएं थीं। सबसे प्रमुख बात यह थी कि उस काल में नई बात कहने को फ़ारसी शायरी की मुख्य विशेषता माना जाता था। यह विशेषता फ़ारसी में हमेशा रही है केवल सफ़वी शासन श्रंखला के अंत के बाद से कुछ समय तक यह विशेषता फ़ारसी काव्य में कम दिखाई देती है। अलबत्ता नज़ीरी के काल में यह कुछ अधिक उभर कर सामने आई। नवीं शताब्दी हिजरी से फ़ारसी में नवीनतावाद, अतिशयोक्ति की हद तक दिखाई देने लगा और दसवीं व ग्यारहवीं शताब्दी में इतना आगे बढ़ गया कि फ़ारसी शायरी का सबसे प्रमुख भाग समझा जाने लगा।

नवीनतावाद में अतिशयोक्ति और पद्य के अन्य आधारों की अनदेखी ने हिंदी शैली के एक भाग को अस्तित्व प्रदान किया जिसके चलते शेर और शायर अपने स्वाभाविक सीमा से अधिक सुनने और पढ़ने वालों से आगे बढ़ गए जिसका परिणाम यह निकला कि शायर का संबंध अपने सुनने और पढ़ने वालों से कट गया और यहीं से फ़ारसी शायरी की हिंदी शैली का पतन शुरू हुआ।

नज़ीरी नीशापुरी ने भी नवीनतावाद को अपनाया लेकिन इस अंतर के साथ कि उन्होंने नवीनतावाद को शायरी का लक्ष्य नहीं बनाया बल्कि अपनी शायरी को बेहतर बनाने का माध्यम बनाया और साथ ही पिछली परंपराओं को भी अपनी शायरी में बाक़ी रखने की कोशिश की। नज़ीरी का नवीनतावाद इस प्रकार का था कि कभी भी उनके और उनके संबोधकों के बीच फ़ास्ला पैदा नहीं हुआ। पिछली परंपराओं को बाक़ी रखने के कारण वे एक ऐसे शायर बन गए थे जो शायरी के मज़बूत आधारों को सुरक्षित रखने के साथ ही साथ अपने शेरों में प्रगतिवादी भी थे और नवीनतावाद का भी ध्यान रखते थे। यह विशेषता अतिशयोक्तिपूर्ण नवीनतावाद के काल में भुला दी गई थी।

 

नज़ीरी नीशापुरी को कुछ आयामों से बाबा फ़ुग़ानी शीराज़ी का रूप कहा जा सकता है। इस दृष्टि से कि उनके शेरों में एक प्रकार का विरोधाभास पाया जाता था जिसका एक भाग वुक़ूई शैली से जुड़ा हुआ था और दूसरा भाग हिंदी शैली से जुड़ा हुआ था। इसी विशेषता के चलते उनकी शायरी का प्रभाव उनके समकालीन शायरों पर भी पड़ा और आने वाली शताब्दियों के कवियों पर भी। यहां तक कि ईरान में हिंदी शैली का पतन हो जाने के बाद भी कवियों ने वुक़ूई शैली में कहे गए उनके शेरों को अपनाया।

वुक़ूई शैली, फ़ारसी शायरी की उस शैली को कहा जाता है जो ईरान में नवीं शताब्दी हिजरी के अंत से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक प्रचलित थी। यह शैली इराक़ी और हिंदी शैली के बीच के काल में उत्पन्न हुई। वुक़ूई शायरी की विशेषता उसकी सादगी, काव्यात्मक जटिलताओं और अतिशयोक्ति से दूरी, आम भाषा का प्रयोग और प्रेमी व प्रेयसी के बीच घटने वाली बातों को सीधे शब्दों में बयान करना है। बारहवीं शताब्दी के प्रतिष्ठित लोगों के जीवन की अहम घटनाओं को लिखने वाले अब्दुर्रज़्ज़ाक दम्बली लिखते हैं कि मुश्ताक़ इस्फ़हानी जैसे शायरों ने जब हिंदी शैली को समाप्त करना चाहा तो उन्होंने नज़ीरी नीशापुरी की शैली अपनाई। इस आधार पर उन लोगों की दृष्टि में नज़ीरी नीशापुरी, वुक़ूई शैली के शायर समझे जाते थे। वर्तमान काल के आलोचकों का कहना है कि यह संपूर्ण तथ्य नहीं है बल्कि आधी सच्चाई है और दूसरी आधी सच्चाई यह है कि नज़ीरी की शायरी की धरोहर में बाबा फ़ुगानी की शायरी की तरह विरोधाभास है जिसका एक सिरा वुक़ूई शैली से मिलता है और दूसरा हिंदी शैली से।

नज़ीरी नीशापुरी की शायरी में सफ़वी काल और मुग़ल काल की शायरी की सभी सकारात्मक विशेषताएं तो थी हीं, साथ ही उनकी अपनी कुछ व्यक्तिगत विशेषताएं भी थीं जिनकी सहायता से वे अपनी एक विशेष शैली रखने वाले शायर बन गए थे। इसी तरह उन्होंने सफ़वी काल से पहले की शायरी की विशेषताओं को भी सुरक्षित रखा था जिन्हें सफ़वी काल में धीरे धीरे भुलाया जा रहा था और शायर, नवीनतावाद में जितना आगे बढ़ते जा रहे थे उतना ही वे इन विशेषताओं से दूर होते जा रहे थे। यह बात हिंदी शैली में सबसे अधिक दिखाई दे रही थी।

नज़ीरी नीशापुरी ने वुक़ुई शैली में कहे गए अपने शेरों में अत्यंत सरल और अपनाइयत भरी भाषा का इस्तेमाल किया है। उनकी ग़ज़लों के शेर गुनगुनाने से सबसे पहले जिस बात का आभास होता है वह उनकी आश्चर्यजनक रूप से सरल और धाराप्रवाह भाषा है। उनके शेर कहने की शैली भी बहुत सरल है और शब्दालंकार कभी भी उनके शरों पर सवार नहीं हो पाते बल्कि बड़े ही स्वाभाविक रूप से ज़रूरत के हिसाब से शेर में उपस्थित होते हैं।

नज़ीरी नीशापुरी, अपने शेर के दूसरे भाग में एक अलग ही चेहरे में दिखाई देते हैं और यह अंतर इस सीमा तक है कि उनके इन्हीं शेरों की वजह से उन्हें हिंदी शैली का शायर समझा गया है जबकि टीकाकारों और साहित्यिक आलोचकों का कहना है कि उनके शेरों का यह भाग पूरी तरह से हिंदी शैली का नहीं है बल्कि एक नई शैली में है जिसे अगर विस्तार दिया जाए तो उसके परिणाम में वह हिंदी शैली का कहा जा सकता है। नज़ीरी नीशापुरी ने अपनी शायरी के इस भाग में वास्तविक क्षणों को बयान करने के बजाए बड़ी कोमल भावनाओं और सूक्ष्म विचारों को पेश किया है जो मनुष्य के भावनात्मक जीवन में सामने आ सकते हैं। अलबत्ता उनकी शायरी के इस चेहरे को हिंदी शैली नहीं कहा जा सकता क्योंकि नज़ीरी ने इस मैदान में हिंदी शैली के शायरों के विपरीत केवल विचार पेश करने के उद्देश्य से शेर नहीं कहें हैं बल्कि उन्होंने वास्तव में नए नए विचार पेश किए हैं और साथ ही भाषा और बयान करने की शैली को भी सुरक्षित रखा है।