Jan २९, २०१८ १३:०५ Asia/Kolkata

11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अमरीका ने आतंकवाद से मुक़ाबले के बहाने जिन बातों को कार्यसूचि में रखा उनसे बहुत से अन्तर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन होता है। 

अमरीका ने आतंकवाद से मुक़ाबले के बजाए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से एक हथकण्डे के रूप में आतंकवादी गुटों का समर्थन आरंभ कर दिया।  हालांकि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए किंतु अमरीका के आतंकवाद विरोधी अभियान में एसा कुछ नहीं है।  अमरीका के आतंकवाद विरोधी अभियान के बारे में बहुत से जानकारों का कहना है कि इसका वह उद्देश्य नहीं है जिसे इसके शीर्षक के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है।

यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पश्चिम के आतंकवाद विरोधी अभियान में एसे बहुत से विरोधाभास पाए जाते हैं जिनसे उनके दोहरे मानदंड स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं।  1990 के दशक के आरंभ से हम संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद और विश्व समुदाय में नीतियों में परिवर्तनों के साक्षी हैं।  इन दोनों ने यह नतीजा निकाला है कि जबतक आतंकवाद का समर्थन करने वालों के आर्थिक स्रोतों को समाप्त नहीं किया जाता सकता उस समय तक आतंकवाद का सफाया नहीं किया जा सकता।  यह गुट आगे भी विभिन्न प्रकार से अपनी गतिविधियों को जारी रखेंगे।

स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के राजनीति विभाग के प्रोफेसर ग्रैहम ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि संयुक्त राज्य अमरीका और उसके घटक, पूरे विश्व में आतंकवाद के मुख्य समर्थक हैं।  अमरीका ने लैटिन अमरीका, इराक़ और सीरिया में मौत के दस्ते बना रखे हैं।  प्रोफेसर ग्रैहम लिखते हैं कि वर्तमान समय में आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष, अमरीका का एक मात्र नारा है वास्तविकता नहीं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का ढांचा कुछ इस प्रकार का है जिसके अन्तर्गत न केवल व्यक्ति बल्कि संस्थाएं और सरकारें भी आतंकवादी कार्यवाहियां कर सकती हैं जिसका सीधा सा उदाहरण आतंकवादी गुटों को दी जाने वाली सहायता है।  कन्वेंशनों ने सरकारों को इसके लिए बाध्य किया है कि आतंकवाद के संबन्ध में वे कंपनियों और संस्थाओं को भी आरोपी बनाएं।  सन 2000 में इस धारा को अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशन में शामिल किया गया।  इस प्रकार सन 2000 में आतंकवाद की सहायता करने वालों के दमन के उद्देश्य से इसे पारित किया गया।

ग्यारह सितंबर 2001 की घटना के बाद आतंकवाद के बारे में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार में बदलाव आया।  11 सितंबर 2001 की घटना के बाद 28 सितंबर 2001 को सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव क्रमांक 1373 पारित हुआ।  इस प्रस्ताव के साथ ही आतंकवाद के बारे में नए अन्तर्राष्ट्रीय क़ानून बनाने की भूमिका प्रशस्त हुई।

संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद ने पहला क़दम उठाते हुए प्रस्ताव क्रमांक 2178 के परिप्रेक्ष्य में सरकारों से मांग की थी कि वे उन लोगों पर कड़ी नज़र रखें जो स्वेच्छा से आतंकवादी गुटों में शामिल होने के प्रयास करते हैं।  यहां सबसे महत्वपूर्ण विषय, आतंकवादी गुटों को एक स्थान से दूसरे स्थानों तक स्थानांतरित करना है।

वास्तविकता यह है कि सऊदी अरब की ओर से विश्व स्तर पर सलफ़ी और वहाबी विचारधारा के प्रशिक्षण और प्रचार के कारण आतंकवादियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाने को भी अपराध समझा जाए।  यही कारण है कि 11 सितंबर की घटना के बाद अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशनों में विभिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत अपराधों को दर्ज किया गया।  इस प्रकार के शीर्षकों को यूरोपीय कन्वेंशनों में बहुलता से देखा जा सकता है जिनमें से एक, 15 मई 2005 का आतंकवाद से मुक़ाबले का यूरोपीय कन्वेंशन और उसका पूरक प्रोटोकोल है।  इस कन्वेंशन में तीन नई बातों को अपराध की श्रेणी में जोड़ा गया।  आतंकवादी कार्यवाहियों के लिए आम लोगों को उकसाना, आतंकवादी कार्यवाहियों के लिए लोगों की भर्ती और आतंकवादी कार्यवाहियों का प्रशिक्षण देना।  बाद में इस कन्वेंशन में आतंकवादी कार्यवाही की पहचान के अन्तर्गत कुछ और विषयों को शामिल किया गया जैसे आतंकवादियों की सहायता रोकना और बीजिंग का 2010 कन्वेंशन आदि।

सन 2015 में भी इस कन्वेंशन में कुछ एमेन्डमेंट किये गए थे जिनके अन्तर्गत पांच प्रकार की गतिविधियों को अपराध श्रेणी में रखा गया।  आतंकी गतिविधियों के उद्देश्य से किसी गुट में शामिल होना, साथ ही आतंकी गतिविधि के उद्देश्य से विदेश यात्रा पर जाना।  आतंकी गतिविधि के लिए संपत्ति या संभावनाओं को विशेष करना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया।  इसी प्रकार आतंकवादी कार्यवाही के लिए किसी देश की भूमि का प्रयोग भी अपराधी काम माना गया।  इतना सब होने के बावजूद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अब भी आतंकवादी कार्यवाहियों को रोकना कोई सरल काम नहीं है।  आतंकवाद से संघर्ष के बारे में बनाए गए क़ानून अधिकांश या तो एक पक्षीय हैं और या फिर क्षेत्रीय स्तर के हैं जिसके कारण उनकी अन्तर्राष्ट्रीय उपयोगिता न के बराबर है।

वास्तविकता यह है कि आतंकवाद से संघर्ष का दावा करने वाले, आतंकवाद के विरुद्ध तथाकथित संघर्ष की आड़ में दूसरों पर आतंकवाद के समर्थन का आरोप लगाने के प्रयास करते रहते हैं और स्वयं को आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का ध्वजवाहक दर्शाते हैं।  हालांकि उनकी कार्यवाहियां, विश्व समुदाय की अपेक्षा के विपरीत हैं जो आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के कन्वेंशन का खुला उल्लंघन हैं।  यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि दाइश और इस जैसी भ्रष्ट विचारधाराओं को पश्चिम ने पैदा किया है। बहुत से विश्वसनीय टीकाकारों का कहना है कि इस प्रकार के अतिवादी गुटों को पैदा करने से पश्चिम का उद्देश्य, इस्लामी जगत में मतभेद फैलाने के साथ ही इस्लामी देशों में अपने प्रभाव को अधिक से अधिक बढ़ाना है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि दाइश जैसे गुटों को प्रयोग करके पश्चिम, मध्यपूर्व में अपनी नीतियों को लागू करना चाहता है।

क्षेत्रीय राष्ट्र विगत की कटु घटनाओं को कभी भी नहीं भुला सकते।  क्षेत्रीय राष्ट्र विशेषकर फ़िलिस्तीन की अत्याचार ग्रस्त जनता को यह बात अच्छी तरह से याद है कि अवैध ज़ायोनी शासन अपने जन्म के आरंभ से किस प्रकार से फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध अत्याचार करता आया है जो अब भी जारी है।  यह अवैध शासन, फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध खुलकर आतंकवादी कार्यवाहियां कर रहा है।  खेद की बात यह है कि फ़िलिस्तीन और लेबनान के प्रतिरोधकर्ताओं के विरुद्ध आतंकी कार्यवाहियों पर अवैध शासन, गर्व का प्रदर्शन करता है।  अमरीका और इस्राईल ने फ़िलिस्तीन तथा लेबनान के इस्लामी प्रतिरोधकर्ता गुटों को आतंकवादी दलों की सूचि में रख दिया है।  यह एसी स्थिति में है कि यह गुट अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं।

यह बहुत ग़लत बात है कि किसी धर्म, राष्ट्र, संस्कृति या राष्ट्रीयता को आतंकवाद से जोड़ा जाए।  वे लोग या गुट जो स्वतंत्रता और अपनी मातृभूमि के लिए संघर्ष करते हैं उनको आतंकवाद की सूचि में शामिल नहीं किया जा सकता।  एसे बहुत से उदाहरण मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि इस प्रकार का ग़लत काम किया गया है।