Jan २९, २०१८ १३:२२ Asia/Kolkata

आतंकवाद एक ऐसा अपराध है जिसके प्रभाव व परिणाम किसी देश की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं रहते।

इस आधार पर आतंकवाद से मुकाबले को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्राप्त है और के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किया जाना चाहिये।

इस समय विश्व समुदाय इस नतीजे पर पहुंचा है कि जब तक आतंकवाद के समर्थन के आर्थिक स्रोतों को समाप्त नहीं किया जाता तब तक विभिन्न रूपों में आतंकवादी गतिविधियां जारी रहेंगी। विश्व समुदाय का मानना है कि जिस तरह भोजन से खून बनता है और उससे शरीर में रक्त का संचार होता है उसी तरह आर्थिक स्रोत आतंकवादी गतिविधियों के लिए रक्त का संचार करते हैं और यदि इन स्रोतों को बंद कर दिया जाये तो इससे आतंकवाद और आतंकवादियों को कुठाराघात लगेगा। इस आधार पर इस संबंध में कंवन्शेन पेश करने की आवश्यकता की बात की गई जिसपर विश्व के 190 देशों ने सहमति जताई परंतु सवाल यह है कि किस तरह आतंकवाद अब भी विश्व के लिए ख़तरा बना हुआ है।

आतंकवाद से मुकाबला कंवेन्शन के परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण विषय आतंकवाद की व्यापक और भेदभाव रहित परिभाषा का न होना है। स्पष्ट है कि जो देश इन कंवेन्शनों को पारित या उसपर हस्ताक्षर करते हैं उनके मध्य आतंकवाद के संबंध में एक स्पष्ट परिभाषा नहीं है।

आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों से मुकाबले के लिए अंतरराष्ट्रीय कंवेन्शन अलबत्ता एक दस्तावेज़ है और उसमें हर रूप में आतंकवाद की भर्त्सना की गयी है और इस कंवेन्शन को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में पारित किया गया है।

आतंकवाद से मुकाबले के बारे में इस्लामी गणतंत्र ईरान के कुछ सिद्धांत हैं और इस दिशा में वह सदैव अग्रसर व अग्रणी रहा है।

इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से ईरानी राष्ट्र को बारंबार आतंकवादी गुटों और इस्लामी क्रांति के विरोधी संगठनों के हमलों का सामना रहा है और स्वयं इस्लामी गणतंत्र ईरान आतंकवाद की भेंट चढ़ने वाला देश है। इस आधार पर ईरान की इस्लामी व्यवस्था, इस्लाम की उच्च शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर अंतरराष्ट्रीय कंवेन्शनों व समझौते के प्रति कटिबद्ध रही है और उसने समस्त रूपों में आतंकवाद की भर्त्सना की है और उसके प्रतीकों से मुकाबले के लिए अधिक से अधिक प्रयास किया है और उसका मानना है कि आतंकवाद से मुकाबले के लिए समस्त देशों के मध्य निकट व भेदभाव रहित सहकारिता होनी चाहिये परंतु महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि आतंकवाद से वास्तविक मुकाबले के लिए सबसे पहले आतंकवाद की सही परिभाषा होनी चाहिये।

हालिया दो दशकों के दौरान आतंकवाद के खिलाफ़ होने वाली कार्यवाहियां इस बात की सूचक हैं कि संयुक्त राष्ट्रसंघ विशेषकर सुरक्षा परिषद ने आतंकवाद के विरुद्ध जो कार्यवाहियां की हैं वे भेदभाव पर आधारित रही हैं और उसे चाहिये कि वह दोहरे मापदंड को छोड़ दे और आतंकवाद से मुकाबले के संबंध में पारदर्शी नीति अपनाये। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्रसंघ और सुरक्षा परिषद को चाहिये कि ऐसी नीति अपनायें जो विश्व में शांति व सुरक्षा स्थापित करने वाली हो और उसे आतंकवाद से मुकाबले की नीति का नाम दिया जा सके। दूसरे शब्दों में आतंकवाद के ख़िलाफ वास्तविक लड़ाई को उसके समस्त पहलुओं व क्षेत्रों में होना चाहिये और समस्त देशों को चाहिये कि वे एक संयुक्त उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ें परंतु खेद के साथ कहना पड़ता है कि आतंकवाद से मुकाबले के बहाने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में जो अप्रिय घटनाएं घट रही हैं वे संयुक्त राष्ट्रसंघ की कमज़ोर और दोहरी नीति का परिणाम हैं और आतंकवाद से मुकाबले के नारे के पीछे वास्तविक राजनीतिक उद्देश्य छिपा हुआ है।

हालिया कुछ वर्षों के दौरान और सीरिया एवं इराक में आतंकवादी गुट दाइश के अस्तित्व में आने के बाद जो हृदयविदारक घटनाएं हुई हैं और उससे पहले आतंकवादी संगठन अलकायदा के क्रिया कलापों के संबंध में जो दस्तावेज़ प्रकाशित हुए हैं वे इस बात के सूचक हैं आतंकवादियों का प्रशिक्षण विदेशों में होता है, वहीं से उन्हें आदेश और हथियार दिया जाता है और उसके बाद वे अपराध अंजाम देते हैं और अपराध के बाद वहीं शरण लेते हैं। इस संबंध में दो बुनियादी सवाल हैं। पहला सवाल यह है कि क्या आतंकवाद से मुकाबले के लिए अस्ली चुनौती अंतरराष्ट्रीय समझौतों का न होना है जो विश्व में आतंकवाद के फैलने का कारण बना है या इस संबंध में दूसरी चुनौतियां हैं जो आतंकवाद से मुकाबले के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कंवेन्शनों के लागू होने की दिशा में रुकावट बनी हुई हैं। इन सवालों के जवाब में कहना है कि इस संबंध में एक महत्वपूर्ण चुनौती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भिन्नाभिन्न व्यवहार है जो आतंकवाद से मुकाबले में गम्भीर रुकावट बना हुआ है।

तीन तीर वर्ष 1390 को तेहरान में आतंकवाद से मुकाबले के संबंध में एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेन्स हुई थी। उस कांफ्रेन्स में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने एक संदेश दिया था जिसमें आतंकवादी कार्यवाहियों और इसी प्रकार जायोनी शासन के समर्थन में वर्चस्ववादी शक्तियों के अतीत की ओर संकेत किया गया है। इसी प्रकार वर्चस्वादी शक्तियों ने संगठित आतंकवादियों का जो आर्थिक और प्रचारिक समर्थन किया है उसकी ओर वरिष्ठ नेता के संदेश में संकेत किया गया है। इसी प्रकार वरिष्ठ नेता के संदेश में कहा गया है कि इन सबके बावजूद वर्चस्ववादी शक्तियां आतंकवाद से मुकाबले का दावा भी करती हैं। उस संदेश में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता बल देकर कहते हैं कि एक बुनियादी काम आतंकवाद की स्पष्ट व सटीक परिभाषा है और इस्लामी गणतंत्र ईरान आतंकवाद जैसे शैतानी कार्य से मुकाबले को अपना दायित्व समझता है और पूरी शक्ति के साथ इसका मुकाबला जारी रखेगा। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने बल देकर कहा कि आतंकवाद कोई नई चीज़ और हालिया वर्षों की उपज नहीं है किन्तु महत्वपूर्ण चीज़ शैतानी शक्तियों का समीकरण है जिन्होंने अपने अवैध हितों को साधने के लिए आतंकवाद का प्रयोग एक हथकण्डे के रूप में किया है और उसे अपनी नीति व कार्यक्रम का भाग बना लिया है।  इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने बल देकर कहा कि हम इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर एक निर्दोष इंसान की हत्या को पूरी मानवता की हत्या समझते हैं। ईरानी राष्ट्र वह है जो पिछले तीन दशकों से आतंकवाद की बलि चढ़ता रहा है।  आतंकवाद से मुक़ाबले में वह अपना दायित्व समझता है।  अपने इस प्रयास को हम आगे भी जारी रखेंगे। वर्चस्ववादियों की दृष्टि से हर वह चीज़ आतंकवाद है जो उनके हितों के लिए ख़तरा है।  बड़े खेद की बात है कि आतंकवाद को समाप्त करने के लिए व्यापक स्तरपर कार्यवाहियां की जा रही हैं किंतु उसके बावजूद यह कार्यवाहियां अब भी जारी हैं जिन्होंने मानवता को ख़तरे में डाल रखा है।  इसी ने राष्ट्रों के बीच संबन्धों को ख़तरे में डाल दिया है।

वास्तव में ग्यारह सितंबर की घटना के बाद अमरीका का व्यवहार आक्रामकता, युद्धोन्माद और अरचनात्मक है जो बुद्धिमत्ता से दूर है।  इसकी जड़ें जार्ज डब्लू बुश जूनियर के सत्ताकाल से अस्तित्व में आई हैं जिन्हें ट्रम्प दोहरा रहे हैं।  अमरीका आतंकवाद से मुक़ाबले के बजाए क्षेत्र की आतंकवाद समर्थक सरकारों के साथ गठबंधन बनाकर विधवंसक कार्यवाहियां कर रहा है जो पूरे विश्व में आतंकवाद के फैलने का कारण बनी हैं।