क्षेत्र के हालात के संबंध में ईरान की सार्थक प्रतिक्रिया
पश्चिम एशिया क्षेत्र उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में है जिसकी ओर बहुत से अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों का ध्यान लगा हुआ है।
यह संवेदनशील क्षेत्र विशेष रूप से पिछले कुछ दशकों के दौरान अशांति और राजनैतिक उथल-पुथल का केन्द्र रहा है। इस बदलाव का चाहते या न चाहते हुए ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ा और भविष्य में भी पड़ेगा। यह बदलाव ईरान के राष्ट्रीय हित व सुरक्षा के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं और रक्षा व सुरक्षा के क्षेत्र में ईरान के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में ईरान के फ़ार्स खाड़ी क्षेत्र में स्थित कुछ पड़ोसी अरब देश अमरीका पर निर्भर होने की वजह से ईरान के सशक्त होने से ख़ुद के कमज़ोर होने का आभास करते हैं और वे चाहते हैं कि ईरान के मुक़ाबले में उनकी स्थिति संतुलित हो जाए इसलिए वे क्षेत्र में अमरीका और नेटो की मौजूदगी को और बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
पश्चिम एशिया क्षेत्र में ऊर्जा के विशाल भंडार के साथ इस क्षेत्र की भूराजनैतिक व भूरणनैतिक स्थिति के कारण पश्चिमी एशिया में विदेशियों की हस्तक्षेपूर्ण नीतियां जारी हैं। इस प्रक्रिया में क्षेत्र से बाहर के खिलाड़ियों में अमरीका सबसे बड़ा खिलाड़ी है जो क्षेत्र के राजनैतिक बदलाव में सबसे ज़्यादा बढ़ चढ़ कर भाग ले रहा है।
अमरीका ने पश्चिम एशिया में पैठ बनाने के लिए, इस क्षेत्र में आतंकवाद को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र के देशों में राजनैतिक व सैन्य हस्तक्षेप की रणनीति अपनायी है। कुकुर मुत्ते की तरह आतंकवादी गुटों का उभरना और उनकी विध्वंसक गतिविधियों में वृद्धि, आधे पश्चिम एशिया की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।
11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमरीका ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष के बहाने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और दो साल बाद 2003 में इराक़ का भी इसी बहाने अतिग्रहण कर लिया। हालांकि अलक़ाएदा और दाइश के जन्म लेने और उनके उभरने से लेकर पतन तक अमरीका, ब्रिटेन और उनके क्षेत्रीय घटकों का रोल इतना ज़्यादा रहा है जिसका इंकार नहीं किया जा सकता। इन गुटों को वुजूद देने, उनकी ट्रेनिंग और उन्हें हथियारों से लैस करने में अमरीका की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नीति को स्पष्ट करने वाले बहुत से सुबूत मौजूद हैं।
इस संकटमय प्रक्रिया के जारी क्रम में जून 2004 में अमरीका ने दुनिया के आठ बड़े औद्योगिक देशों के संगठन जी-एट की बैठक में एक योजना पेश की जिसका शीर्षक था, "वृहत्तर मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीक़ा पहल"
इस हस्तक्षेपपूर्ण नीति के पीछे अमरीका का लक्ष्य पश्चिम एशिया को बांटना था जो क्षेत्र में दुश्मनों की वर्चस्ववादी नीतियों के विस्तार और अशांति व स्थिरता पैदा होने का कारण बनती। जैसा कि अमरीका और इस्राईल ने सूडान के बंटवारे के हालिया मामले में और इराक़ के कुर्दिस्तान क्षेत्र की हालिया घटनाओं में कुर्दिस्तान के पृथकतावादी धड़ों के समर्थन कर एलान कर क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ाने की कोशिश की लेकिन इस मामले में मुह की खानी पड़ी।
इन सभी मामलों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का लचर रवैया भी इन प्रक्रियाओं के गंभीर होने और परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के ख़तरे में पड़ने का कारण बना। इस लचर रवैये से एक ओर अतिक्रमणकारी को उकसावा मिला तो दूसरी ओर पीड़ितों में निराशा पैदा हुयी और उनकी ओर से हिंसक कार्यवाही हुयी। मिसाल के तौर पर अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ड डब्लयू बुश का संयुक्त राष्ट्र संघ की संरचना की अनदेखी करते हुए 2003 में सामूहिक विनाश के हथियारों से मुक़ाबले के बहाने इराक़ पर हमला, क्षेत्र में अशांति बढ़ने का कारण बना।
इसी तरह अमरीका और उसके घटकों का 2001 में आतंकवाद और अलक़ाएदा से संघर्ष के बहाने अफग़ानिस्तान पर हमले से क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति व सुरक्षा में किसी तरह की मदद नहीं मिली बल्कि आतंकवाद, अशांति, हिंसा और मादक पदार्थों का उत्पादन यथावत जारी है।
सच बात तो यह है कि क्षेत्र में विदेशियों की मौजूदगी से ख़तरे बढ़ते जा रहे हैं। जैसा कि इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने जून 2017 में इस्लामी गणतंत्र के अधिकारियों और तीनों पालिकाओं के प्रमुखों से मुलाक़ात में इस बात का उल्लेख करते हुए कि साम्राज्यवादी शक्तियां विभिन्न शैलियों अपनी इच्छाएं थोपना चाहती हैं, कहा कि इन शैलियों में से एक यह है कि साम्राज्यवादियों के हितों की पूर्ति के लिए "अंतर्राष्ट्रीय मानदंड" शीर्षक के तहत बातें पेश की जाती हैं ताकि इस मार्ग से अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले स्वाधीन देशों पर मानदंडों के उल्लंघन का इल्ज़ाम लगाएं।
क्षेत्र में मौजूद ख़तरों और उसके ईरान की आंतरिक सुरक्षा पर प्रभाव के संबंध में इस्लामी गणतंत्र ईरान ने इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता की सूझबूझ व दूरदर्शिता तथा इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में ख़ास तौर पर इस्लामी क्रान्ति संरक्षक बल सिपाहे पासदारान के अधिकारियों की होशियारी से निवारक कार्यवाही शुरु की। इस परिप्रेक्ष्य में ईरान ने इराक़ सरकार के समन्वय से इराक़ सरकार की सैन्य सलाहकार के तौर पर मदद की और सीरिया में दाइश की पैठ को रोकने के लिए विशेष कार्यक्रम लागू और इस काम में सीरियाई सेना और इस देश के स्वंयसेवी बल तथा रूस की मदद ली।
इस कार्यक्रम ने यह दर्शा दिया कि सुरक्षा व स्थिरता लाने के लिए वास्तविक संघर्ष का रास्ता अमरीका, नेटो और झूठे गठजोड़ के नाम पर सैन्य चढ़ाई नहीं है। जैसा कि वरिष्ठ नेता ने सीरिया में दाइश के विनाश के बाद अपने बयान में कहा, "कुछ पड़ोसी देशों में यह विश्वास नहीं था कि वे दाइश को ख़त्म कर सकते हैं लेकिन जब उन्होंने व्यवहारिक रूप से मैदान में क़दम रखा, सफलताएं पायीं तो इस्लामी क्रान्ति के इस संदेश "हम कर सकते हैं" पर विश्वास किया।"
ये सभी घटनाएं इन मैदानों में मौजूदगी और क्षेत्र में शांति व सुरक्षा को अस्थिर करने वाले तत्वों से निपटने के लिए ईरान के संकल्प व योगदान को दर्शाती हैं। इसलिए यह कहना ग़लत न होगा कि स्थिरता के लिए ईरान की कोशिश न सिर्फ़ ईरान, इराक़, सीरिया और रूस बल्कि क्षेत्रीय राष्ट्रों और उन सभी के लिए बड़ी सेवा है जिन्होंने अशांति का कड़वा घूंट पिया है।
सही मौक़े पर उठाये गये इस क़दम से क्षेत्र की बाहर की शक्तियों में ख़ास तौर पर अमरीका और उसके सऊदी अरब सहित कुछ क्षेत्रीय घटकों की साज़िश नाकाम हो गयी कि जिसका लक्ष्य क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करना था।
इस वक़्त न सिर्फ़ यह कि अमरीका का राजनैतिक व सैन्य समीकरण बेकार हो गया है जो उसने इराक़ और सीरिया में दाइश के क़ब्ज़े की पूर्वधारणा और उसके ज़रिए नए पश्चिम एशिया के वजूद में आने के लिए बनाए थे और इस तरह पश्चिम एशिया के बंटवारे की साज़िश नाकाम हो गयी जो इस्राईल के लिए बहुत अहम समझी जा रही थी। अगर यह ख़तरा जारी रहता तो दाइश कैंसर के फोड़े की तरह तेज़ी से फैलता यहां तक कि क्षेत्र के बंटवारे की साज़िश व्यवहारिक हो जाती।
इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने क्षेत्र में दाइश के पतन के संबंध में आईआरजीसी की क़ुद्स ब्रिगेड के कमान्डर जनरल क़ासिम सुलैमानी के ख़त के जवाब में जिस बिन्दु की ओर इशारा किया है उससे इस सच्चाई का पता चलता है।
वरिष्ठ नेता ने बल दिया, "दाइश के वर्चस्व के ख़त्म होने से अमरीका की मौजूदा और पूर्व सरकारों तथा क्षेत्र में उसकी पिट्ठू सरकारों के मुंह पर तमांचा पड़ा जिन्होंने इस गुट को वजूद दिया और उसका हर तरह से साथ दिया ताकि पश्चिम एशिया क्षेत्र पर अपना मन्हूस क़ब्ज़ा बढ़ाएं और अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन को उस पर थोप दें।"
क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारदर्शी दृष्टिकोण के साथ क्षेत्र में शांति व स्थिरता क़ायम करने की इस्लामी गणतंत्र ईरान की नीति की वजह से चीन और योरोपीय संघ जैसी क्षेत्र की बाहर की शक्तियां नए माहौल के पश्चिम एशिया में सार्थक प्रतिक्रिया जता रही हैं। यहां तक कि अमरीकी पत्रिका नेश्नल इंट्रेस्ट ने ईरान के संबंध में वॉशिंग्टन की दुश्मनी पर आधारित नीति की आलोचना करते हुए लिखा कि क्षेत्र की स्थिरता के लिए तेहरान की भागीदारी ज़रूरी है।