मोहम्मद हुसैन नज़ीरी नीशापुरी- 3
पिछले कार्यक्रम को जारी रखते हुए नज़ीरी नीशापूरी के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जो फ़ारसी शायरी में अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने अपने दौर और उसके बाद के दौर की शायरी पर गहरी छाप छोड़ी है।
नज़ीरी को दसवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के दूसरे अर्ध और ग्यारहवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के पहले अर्ध के सबसे लोकप्रिय शायरों में गिना जाता है। उनके बहुत से शेरों को लोग दैनिक ज़बान में कहावत की तरह इस्तेमाल करते थे।
आपको याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने आपको यह बताया कि नज़ीरी नीशापूरी दसवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के अर्ध में नीशापूर में पैदा हुए और इसी शहर में उन्होंने आरंभिक शिक्षा हासिल की। वह अभी बहुत जवान थे कि उनकी शायरी के चर्चे ख़ुरासान की सीमाओं से बाहर होने लगे। वह जवानी के आरंभ में अपनी शायरी की क्षमता को आज़माने के लिए काशान गए और शेर शायरी की सभाओं में भाग लिया और बहुत मशहूर हुए। उसके बाद वह इराक़ गए और वहां मुशायरों में भाग लेकर बहुत नाम कमाया। अंततः वह एक शांत व सुखी जीवन की तलाश में भारत के आगरा शहर गए और वहां अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना को प्रभावित करने में सफल हुए जो मुग़ल बादशाह जहांगीर के दरबारियों में थे। ख़ान ख़ानां ने नज़ीरी को नौकरी पर रख लिया और उन्होंने भी उनके निमंत्रण को स्वीकार किया। नज़ीरी ने इस नौकरी से बहुत धन कमाया जिसे उन्होंने भारत पलायन करने वाले ईरानियों और ख़ास तौर पर ईरानी शायरों व कलाकारों की मदद में ख़र्च किया। नज़ीरी नीशापूरी का 1021 हिजरी क़मरी में गुजरात में मौत हुयी और वहीं उन्हें दफ़्न किया गया।
नज़ीरी नीशापूरी ने अपनी शायरी में सफ़वी दौर की शायरी के सभी पहलुओं और फ़ारसी शायरी की विगत की परंपराओं को शामिल किया और इस तरह वह विशेष शैली में शायरी करने में सफल हुए। उनके बाद बहुत से शायर उनकी शैली से प्रभावित हुए। उनका प्रभाव इतना ज़्यादा था कि बहुत से साहित्यिक आलोचकों का मानना है कि नज़ीरी नीशापूरी की ग़ज़ल का अंदाज़ न सिर्फ़ उनके दौर के शायरों बल्कि उनके बाद के शायरों में भी बहुत ज़्यादा दिखायी देता है। अपने दौर और अपने बाद के दौर में नज़ीरी का स्थान इतना ऊंचा है कि ग्यारहवीं शताब्दी क़मरी में सफ़वी दौर के ग़ज़ल के सबसे बड़े शायर साएब तबरीज़ी ने नज़ीरी को न सिर्फ़ अपने से बड़ा बल्कि सफ़वी दौर के दूसरे शायरों से बड़ा माना है।
नज़ीरी के शेरों की समीक्षा करने से उनके शेरों में बहुत सी ऐसी विशेषताएं नज़र आती हैं जो उन्हें समकालीन शायरों के साथ साथ बाद के दौर के शायरों से श्रेष्ठ बनाती है। नज़ीरी नीशापूरी की शायरी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ज़बान की शुद्धता है। यह वह विशेषता है कि जिसके बारे में बहुत से समीक्षकों का कहना है कि हाफ़िज़ शीराज़ी के बाद ख़त्म हो गयी थी। इस शैली को बाबा फ़ुग़ानी ने जीवित किया और चूंकि ज़बान में शुद्धता ख़त्म हो गयी इसलिए बहुत समय तक इस तरह के शेर को फ़ुग़ानी शेर कहते थे। सफ़वी दौर के उम्मीदी तेहरानी सहित कुछ दूसरे शायरों ने भी शुद्धता को प्रचलित करने की कोशिश की। इसी वजह से उस दौर के समीक्षक उम्मीदी तेहरानी को प्राचीन शैली में शायरी करने वाला शायर कहते थे। यह विचार इसलिए पाया जाता था क्योंकि फ़ारसी शायरी में ज़बान की शुद्धता को नवीं शताब्दी और उसके बाद की शताब्दियों में नज़रअंदाज़ कर दिया गया था और इस विशेषता को प्राचीन दौर की शायरी की विशेषता कहा जाता था। आख़िरकार नज़ीरी नीशापूरी ने अपनी शायरी को ज़बान की शुद्धता पर केन्द्रित किया। उन्होंने इस दृष्टि से इतनी अच्छी शायरी की कि उनके शायरी को प्राचीन दौर की शायरी नहीं कहा गया क्योंकि उनके शेरों में शायरी के सभी तत्व मौजूद थे। जैसे नए विचार के साथ साथ शायरी की परंपराओं का पालन।
नज़ीरी की शायरी की एक अन्य विशेषता प्रचलित ज़बान का इस्तेमाल है। सफ़वी दौर में आम बोल चाल की ज़बान का बहुत चलन था लेकिन इस चलन में इतनी अति आ गयी थी कि ज़बान में अश्लीलता तक आ गयी थी जिससे ज़बान की शुद्धता ख़त्म हो गयी थी। लेकिन नज़ीरी ने आम बोल चाल की ज़बान के साथ साथ उसकी शुद्धता को बाक़ी रखा। उनका यह स्वस्थ दृष्टिकोण उनकी ग़ज़लों और दोहों की ज़बान में प्रवाह और जोश का कारण बना। नज़ीरी की शायरी में प्रवाह और जोश इस हद तक था कि कुछ साहित्यकारों का मानना है कि यह विशेषता सअदी की ग़ज़लों में भी इस हद तक दिखायी नहीं देती जबकि सादी अपनी इसी विशेषता के लिए जाने जाते हैं।
मशहूर भारतीय साहित्यकार अल्लामा शिबली नोमानी ने अपनी किताब शेअरुल अजम में एक अध्याय को मोहावरे से विशेष किया जिसमें उन्होंने सअदी शीराज़ी, अमीर ख़ुसरो देहलवी और नज़ीरी नीशापूरी जैसे शायरों को सबसे ऊपर स्थान दिया है। मोहावरे की ज़बान आम बोल चाल की ज़बान होती है जो शेर में प्रवाह व अपनायित लाती है। अल्लामा शिबली नोमानी का मानना है कि इस गुट के शायरों के शेरों में बहुत ज़्यादा अपनायित पायी जाती है उसका कारण मोहावरे की ज़बान है। अमीर ख़ुसरो देहलवी चूंकि भारतीय थे, उन्होंने अपनी शायरी में ऐसे मोहावरे इस्तेमाल किए हैं जो फ़ारसी भाषा में प्रचलित नहीं बल्कि वह फ़ारसी भाषा की भारतीय शैली की शायरी में प्रचलित हैं। लेकिन सअदी और नज़ीरी नीशापूरी के शेरों में ऐसे शब्दों व शब्दावलियों का इस्तेमाल मिलता है जो ईरानियों के बीच आम बोलचाल में इस्तेमाल होती हैं। यही वजह है कि इन शायरों के बहुत से शेर सभी वर्गों के बीच मसल व मुहावरे के रूप में उपयोग होते हैं।
शिबली नोमानी ने अपनी मशहूर किताब शेअरुल अजम में एक शब्दावली का इस्तेमाल किया है जिसे ‘जोशे सुख़न’ कहा है जिसका अर्थ है जोश को पढ़ने से पाठक के भीतर जोश व उत्साह की भावना प्रवाहित होती है। शिबली नोमानी की समीक्षा के अनुसार, कुछ शेरों को पढ़ने से लगता है कि उसमें बुद्धि व विवेक को इस्तेमाल में लाया गया है जैसे हाफ़िज़ के शेर या उनसे पहले ख़ाक़ानी और अनवरी के शेर। इस तरह के शेर पढ़ने से लगता है कि इन्हें कहने में पूरी तरह बुद्धि को मद्देनज़र रखा गया है या ये बुद्धि व भावना का संगम हैं। लेकिन कुछ शेर ऐसे होते हैं जिन्हें कहने में बुद्धि का प्रयोग होता है उनमें बुद्धि नहीं बल्कि भावना नज़र आती है और वह पाठक में एक तरह का जोश व उत्साह भर देती है। जैसे कि इस तरह की भावना शम्स की ग़ज़लों या सअदी की ग़ज़लों में नज़र आती है। नज़ीरी के शेर भी इसी जोशे सुख़न की मिसाल हैं अर्थात जिन्हें पढ़ कर पाठक जोश व उत्साह से भर जाता है। ख़ास तौर पर नज़ीरी की ग़ज़लें इसकी मिसाल हैं।
मकतबे वुक़ू नामक पंथ के शायर दिल की हालत को बयान करने के लिए आम तौर पर वास्तविक क्षणों को अपनी शायरी में क़ैद करने की कोशिश करते हैं। लेकिन ज़्यादातर यह देखने में आता है कि शायर जब दिल की हालत बयान करता है तो उसकी ज़बान में जोश नहीं होता बल्कि उनकी ज़बान दिखावटी लगती है इसलिए दिल पर असर नहीं करती। इस तरह की हालत के वर्णन के लिए एक ओर शायर जोश भरने वाली भावनाओं को पेश करने की कोशिश करता है लेकिन दूसरी ओर उसका बयान करने का अंदाज़ ऐसा होता है कि उससे जोश पैदा नहीं होता अर्थात उसकी ज़बान उसका साथ नहीं देती। ऐसे शायर या तो इस हालत के वर्णन के लिए दिमाग़ से काम लेते हैं या वे ऊपरी ज़बान से इस तरह की हालत को बयान करते हैं दिल की गहराइयों से नहीं। कभी ज़बान में शुद्धता के अभाव के कारण उनके शेर में उत्साह पैदा नहीं होता। सफ़वी दौर की शायरी के दूसरे अर्ध अर्थात हिन्दी शैली की शायरी में चूंकि शायरी की विषयवस्तु काल्पनिक है और उसमें विदित बातों पर काफ़ी ध्यान नहीं दिया जाता था इसलिए उसमें जोश व उत्साह नहीं पाया जाता और अगर फ़ारसी शायरी की हिन्दी शैली में कहीं जोश व उत्साह से भरा शेर नज़र आता है तो वह दूसरी ओर शायरी के नियम व सिद्धांत के ख़िलाफ़ है। इस बीच सिर्फ़ नज़ीरी अकेले ऐसे शायर हैं जिन्होंने पूरी सफलता के साथ मन की हालत को बहुत ही प्रवाहित व उत्साह भरने वाली भाषण में बयान किया है।