फार्स की खाड़ी में अमेरिकी हस्तक्षेप
अमेरिका की सैन्य उपस्थिति वर्षों से क्षेत्र में जारी है।
वास्तव में वर्ष 1971 में ब्रिटेन के फार्स की खाड़ी से निकल जाने के बाद अमेरिका ने सदैव इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को मज़बूत किया और इस क्षेत्र को विशेष महत्व दिया यहां तक कि उसने अपनी नौसेना की पांचवी सैनिक छावनी बहरैन में बना दी।
फ़ार्स की खाड़ी में तेल और गैस के अत्याधिक स्रोत होने के कारण वह अतीत से महत्वपूर्ण रहा है। यह क्षेत्र अब छद्मयुद्ध और हथियारों की होड़ का केन्द्र बन गया है। इस प्रक्रिया में क्षेत्र में ईरान की भूमिका को रोकना अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकता है।
क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों में ईरान की जो रचनात्मक भूमिका है उससे ईरान को रोकने के लिए इस समय अमेरिका, सऊदी अरब और इस्राईल मिलकर प्रयास कर रहे हैं।
अमेरिकी रक्षामंत्री जेम्स मैटिस ने 19 जनवरी को जारी वर्ष की स्ट्रैटेजी की घोषणा की। उन्होंने अपने भाषण के एक भाग में 6 बार ईरान का नाम लिया और तेहरान के खिलाफ निराधार आरोप मढ़े। उन्होंने ईरान पर आतंकवाद के समर्थन का निराधार आरोप मढ़ा और ईरान की प्रक्षेपास्त्रिक क्षमता को ख़तरा बताया। इसी प्रकार जेम्ज़ मैटिस ने कहा है कि पेन्टागोन ईरान को नियंत्रित करने का प्रयास जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि पेन्टागोन इस कार्य को क्षेत्रीय देशों का गठबंधन बनाकर अंजाम देना चाहता है।
अलबत्ता अमेरिका ने वर्षों पहले से ईरान को नियंत्रित करने के लिए बहुपक्षीय नीति अपना रखी है और उसकी इस नीति में मुख्य रूप से तीन चीज़ों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। पहली चीज़ ईरान की इस्लामी क्रांति की छवि को बिगाड़ कर पेश करना और यह बताना व दर्शाना है कि ईरान क्षेत्र की स्थिरता के लिए ख़तरा है। मध्यपूर्व के संबंध में यह अमेरिका की अस्ली नीति है और अब भी वह यथावत जारी है।
दूसरी चीज़ ईरान का राजनीतिक और आर्थिक परिवेष्टन है। इस परिवेष्टन का मुख्य लक्ष्य ईरान को वैज्ञानिक और ग़ैर वैज्ञानिक प्रगति से रोकना है और यह वह चीज़ है जो अमेरिका की कार्यसूची में शामिल है।
ईरान को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका की तीसरी चाल ईरान के आस- पास और उससे संबंधित क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न करना और इसी प्रकार उसकी प्रतिरक्षा क्षमता को सीमित करना है। इस समय अमेरिका ने ईरान की प्रक्षेपास्त्रिक क्षमता, इस्लामी क्रांति के संरक्षक बल सिपाहे पासदारान और ईरान की प्रतिरोधक शक्ति पर ध्यान केन्द्रित कर रखा है। इस प्रक्रिया का जारी रहना इस बात का सूचक है कि शांति व सुरक्षा स्थापित करने के बहाने अमेरिका की स्ट्रैटेजी, क्षेत्र में तनाव और उस संकट को बनाये रखना है जिसे उसने स्वयं उत्पन्न किया है।
क्षेत्र में प्राचीन समय से अमेरिका का एक लक्ष्य सैनिक उपस्थिति में वृद्धि करना, फूट व मतभेद डालने वाली नीति और भड़काऊ कार्यवाहियों का जारी रखना रहा है। यह वह नीतियां हैं जिसका अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए विदेशी सदैव प्रयोग करते रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में 11 सितंबर की घटना ने नियो कंज़रवेटिव धड़े के हाथ अच्छा बहाना व अवसर दे दिया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति का समीकरण बदल सकें। 11 सितंबर की घटना से नियो कन्ज़र वेटिव धड़े के हाथ बेहतरीन अवसर हाथ आ गया ताकि अमेरिका क्षेत्र में शक्ति के आधार पर थानेदार की भूमिका निभा सके। इस आधार पर अमेरिका ने सैनिक शक्ति के प्रयोग को अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने के एक हथकंडे के रूप में प्रयोग करना आरंभ कर दिया है हालांकि इस संबंध में उसे विश्व समुदाय और सुरक्षा परिषद का समर्थन भी प्राप्त नहीं है।
वर्ष 2001 में आतंकवाद से मुकाबले के बहाने अमेरिका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान पर हमले और उस देश में अमेरिकी सैनिकों के तैनात किये जाने के बाद क्षेत्र में वाशिंग्टन की नीति ने अतिवादी रूप धारण कर लिया।
अमेरिका शांति व सुरक्षा स्थापित करने के संबंध में जो दावे करता है वह ज़्यादातर एक राजनीतिक कटाक्ष प्रतीत होते हैं। रोचक बात है कि अमेरिका विश्व में अशांति का स्रोत है और 11 सितंबर की घटना के बाद आतंकवाद और सामूहिक विनाश के हथियारों से मुकाबले के बहाने सबसे पहले उसने अफ़ग़ानिस्तान और उसके पश्चात इराक पर हमला करके इन देशों का अतिग्रहण कर लिया। इस हमले का परिणाम इन देशों में शांति व सुरक्षा स्थापित होने के बजाये अलकायेदा अस्तित्व में आ गया और अलकायदा के अंदर से खूंखार आतंकवादी गुट दाइश अस्तित्व में आया और यह 10 वर्षों तक इराक में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति का एक परिणाम रहा है।
अब अमेरिकी इतिहास के अनोखे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प शांति व सुरक्षा स्थापित करने के बहाने कई विषयों पर ध्यान केन्द्रित किये हुए हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण मध्यपूर्व है। क्योंकि ट्रम्प ने अमेरिका की सुरक्षा के लिए ख़तरे का बहाना बनाकर पश्चिम एशिया को लक्ष्य बना रखा है। इस संबंध में आतंकवाद, सामूहिक विनाश के हथियार और वाशिंग्टन विरोधी सरकारों को अमेरिका की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया जाता है। बहुत से अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के अनुसार अमेरिका की विदेश नीति विशेषकर मध्यपूर्व और फार्स की खाड़ी में ईरान से टकराव पर केन्द्रित है।
तेहरान विश्व विद्यालय में राजनीतिक विभाग के प्रोफेसर डाक्टर मोहम्मद जमशीदी इस संबंध में कहते हैं” विद्रोह या खुल्लम- खुल्ला अत्याचार जैसे क्षेत्र के कुछ परिवर्तनों के कारण अमेरिकी व्यवहार के प्रति ईरानियों में विशेष प्रकार का विचार उत्पन्न हो गया है। इस प्रकार अमेरिकियों पर विश्वास न करना एक स्वाभाविक बात है। दुश्मनी से हटकर क्षेत्र में ईरान की भूमिका के संबंध में अमेरिकियों को भ्रांति में नहीं रहना चाहिये। क्षेत्र में ईरान के जो प्रयास हैं वे क्षेत्र पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए नहीं हैं बल्कि ईरान क्षेत्र में शांति व सुरक्षा स्थापित कराने के प्रयास में हैं। ईरान क्षेत्र में डेमोक्रेसी का समर्थक रहा है और वह अच्छी तरह जानता है कि सीरिया, यमन, बहरैन,इराक या फिलिस्तीन जहां भी डेमोक्रेसी होगी उससे ईरान के राष्ट्रीय हितों की भी आपूर्ति होगी। इस आधार पर ईरान शांति व सुरक्षा और क्षेत्र में प्रजातंत्र स्थापित कराने के लिए प्रयासरत रहा है परंतु अमेरिका निराधार दावे करके यह दर्शाने की चेष्टा में है कि ईरान क्षेत्र के दूसरे खिलाड़ियों के लिए ख़तरा है।
10 दिसंबर 2017 को तेहरान में एक सेमिनार हुआ था जिसका शीर्षक था “पश्चिम एशिया अमेरिका और ईरान की दृष्टि से” उस सेमिनार में शिकागो विश्व विद्यालय के प्रोफेसर जान मरशाइमर ने 11 सितंबर की घटना के बाद वर्ष 2002 से 2017 के बीच के वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति की ओर संकेत किया और कहा “मध्यपूर्व में सरकारों को बदलना अमेरिकी नीति का एक लक्ष्य हो गया है और उसे व्यवहारिक बनाने के लिए अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया और मिस्र में प्रयास भी किये गये।“
शिकागो विश्व विद्यालय के प्रोफेसर जान मरशाइमर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति के बारे में भी कहते हैं” ट्रम्प के पास कोई अनुभव नहीं था और एक वर्ष से कम का समय हो रहा है जब से उन्होंने सत्ता की बाग़डोर संभाल रखी है। वह बहुत उतावलेपन में निर्णय लेते हैं और महत्वपूर्ण मामलों के बारे में अपने दृष्टिकोणों को बदल लेते हैं।“
यह उस स्थिति में है जब सऊदी अरब और फार्स की खाड़ी क्षेत्र की कुछ दमनकारी सरकारें अब भी अतीत की गलतियों को दोहराने के साथ अपनी सरकारों को बाकी रहने के लिए अमेरिकी समर्थन को ज़रूरी समझ रही हैं।
जुलाई 2015 में ईरान और गुट पांच धन एक के मध्य परमाणु समझौता हो जाने के बाद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने सीएनएन के साथ साक्षात्कार में कहा था कि अमेरिका ने अतीत में ईरान के संबंध में गलतियां की हैं उनमें से एक ईरान- इराक युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा सद्दाम का समर्थन है।“
रोचक बात यह है कि अमेरिका ने इन गलतियों को अपने लक्ष्यों तक पहुंचने का पुल बना लिया है और अब अमेरिका के रक्षामंत्री सीरिया में आतंकवादी गुट दाइश से मुकाबले की बात कर रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि वह दाइश से मुकाबला नहीं करना चाहते हैं बल्कि फार्स की खाड़ी के अरब देशों की सहकारिता से ईरान विरोधी मार्चा बनाने के प्रयास में हैं।