Apr २३, २०१८ ११:४४ Asia/Kolkata

हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि मुहम्मद हुसैन नज़ीरी नैशापुरी का जन्म, दसवीं शताब्दी हिजरी के उत्तरार्ध में ईरान के नैशापुर नगर में हुआ था। 

उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा नैशापुर से ही शुरू की थी।  नज़ीरी नीशापुरी ने शायरी या कविता के क्षेत्र में अपने युवाकाल में ही ख्याति प्राप्त कर ली थी।  नज़ीरी नैशापुरी ने अपने जीवन का बहुत समय भारत में गुज़ारा।  अपनी ख्याति के उच्च शिखर पर पहुंचने के समय उन्होंने भारत जाकर जीवन गुज़ारने की सोची।  इसी उद्देश्य से वे भारत गए।  भारत में वे आगरा गए जहां पर वे जहांगीर के एक सरदार "अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना" को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रहे।  "अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना" नज़ीरी नैशापुरी से इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने नैशापुरी को अपने साथ रहने का प्रस्ताव दिया।  नज़ीरी ने ख़ानख़ाना का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।  इस प्रकार से "अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना" के निकट लोगों में गिने जाने लगे।

नज़ीरी ने भारत में रहकर बहुत धन-संपत्ति एकत्रित कर ली थी।  उनकी विशेष बात यह थी कि इस धन संपत्ति का प्रयोग नज़ीरी नैशापूरी ने ईरान से भारत पलायन करके आने वालों के लिए किया।  अपने पैसे से उन्होंने ईरान से आने वाले पलायनकर्ताओं की इतनी अधिक सहायता की थी कि उन्हें उस काल के ईरानी पलायनकर्ता अपना संरक्षक कहने लगे थे।  अपने जीवन के अंतिम समय तक नज़ीरी भारत में ही रहे।  सन 1021 हिजरी क़मरी में नज़ीरी का देहांत गुजरात में हुआ।  उनको वहीं पर दफ़्ना दिया गया।  कार्यक्रम में हमने मुहम्मद हुसैन नज़ीरी नैशापुरी की शायरी और उनकी शायरी की विशेषताओं का उल्लेख किया था।  उन्होंने कविता की विभिन्न शैलियों को अपनाते हुए इस क्षेत्र में ऐसा नाम कमाया जो आज भी बाक़ी है।

 

ग़ज़ल में प्रयोग किये जाने वाले शब्दों के सही वज़न और उच्चारण की ही भाँति रदीफ़ और क़ाफ़िये का बहुत महत्व होता है।

ग़ज़ल में काफ़िया बदलता रहता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। रदीफ़ का रूप अंत तक जैसे का तैसा रहता है।  रदीफ़ ऐसा शब्द अथवा ऐसा शब्द समूह है जो मतले के दोनों मिसरों के अंत में आता है और पूरी ग़ज़ल में एक सा रहता है।  रदीफ़ का शाब्दिक अर्थ होता है घोड़े पर पीछे बैठने वाला व्यक्ति या फिर पीछे की ओर रहनेवाली सेना किंतु ग़ज़ल में हर काफ़िए के बाद आने वाले शब्द या शब्दसमूह को रदीफ़ कहा जाता है।

नज़ीरी नैशापुरी की कविताओं की विशेषताओं में से एक विशेषता यह थी कि कविता कहते समय वे हर प्रकार की बंदिश से दूर रहते हुए बड़ी ही दक्षता से अपनी बात कहा करते थे।  ग़ज़ल में कभी-कभी एसा होता है कि उसके पहले शेर के पहले मिस्रे की रदीफ़ और उसका क़ाफ़िया ऐसा होता है जिसको पढ़कर पाठक को यह आभास होता है कि यह इसके आगे के शेर बहुत कमज़ोर से होंगे और आगे का कलाम अच्छा नहीं होगा।  एसे में सामान्यतः यह होता है कि शायर या कवि आरंभ के दो-तीन शेर तो अच्छे कह लेता है और उसके बाद के शेर बहुत ही ढीले-ढाले होते हैं।  बाद में एसी स्थिति बन जाती है कि शुरू वाले शेर और आख़िर वाले शेरों में कोई समान्ता ही नहीं दिखाई देती।  इसका मुख्य कारण होता है कठिन क़ाफ़िये का चयन।  जब कभी भी शेर में कठिन क़ाफ़िये का प्रयोग किया जाएगा इस प्रकार की मुश्किल ज़रूर पेश आएगी।  इस प्रकार की समस्या को फ़ारसी कविता में भी देखा जा सकता है।  फ़ारसी की शायरी में भी बहुत से कवियों को इस मुश्किल का सामना करना पड़ा है जिसको कुछ ने बहुत सुन्दरता से निभाया है जबकि कुछ इसी में फंसकर रह गए।  कुछ कवियों से इससे छुटकारा पाने के लिए अपने शेर को कुछ छोटा कर दिया।  कभी-कभी यह समस्या, शेर की विषयवस्तु में भी पाई जाती है।  इसका अर्थ यह है कि ग़ज़ल को सही ढंग से समझने वाला संबोधक यह समझता है कि शायर, अपनी बात को कहने के लिए उचित क़ाफ़िये का प्रयोग नहीं कर सका है।  इस प्रकार की मुश्किल अधिकतर फ़ारसी भाषा की "हिंदी शैली" में दिखाई देती है।

नज़ीरी नैशापुरी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे शेर में क़ाफ़िये या उसकी विशषवस्तु की चुनौती से बाहर आने में दक्ष थे।  नज़ीरी की कवताओं को पढ़कर कभी-कभी ऐसा लगता है कि जिस प्रकार से उन्होंने कविता आरंभ की है उसके देखते हुए वे कुछ शेरों के बाद अपनी कविता समाप्त कर देंगे किंतु वे बहुत ही अच्छे ढंग से अपनी कविता को आगे बढ़ाते हुए उसे अंत तक ले जाते हैं।  साहित्यिक आलोचकों का कहना है कि नज़ीरी नैशापुरी इस मामले में इतने दक्ष थे कि उन्हें इस क्षेत्र में गुरू कहा जाना चाहिए।  वे बड़ी ही दक्षता के साथ ग़ज़ल कहा करते थे जिसमें किसी भी हिसाब से कमी निकालना संभव नहीं था।

नज़ीरी नैशापुरी की एक अन्य विशेषता यह थी कि उनकी शायरी बहुत ही व्यापक थी।  उनके बाद की कई शताब्दियों तक यह विशेषता, फ़ारसी शायरी में पाई गई।  साहित्य जगत में हाफ़िज़ शीराज़ी के उदयकाल से पहले तक फ़ारसी कविता, बहुत ही व्यापक थी और उस काल के अधिकांश शायरों को व्यापक कवि कहा जाता था।  यह वे कवि थे जिन्होंने लगभग सभी विषयों पर शेर कहे हैं।  इन कवियों में रूदकी, सेनाई और सअदी का नाम लिया जा सकता है।  फ़ारसी कविता पर शोध करने वालों का कहना है कि हाफ़िज़ का उदय, व्यापक विषयों पर शेर कहने वाले कवियों का अंतकाल है।  हाफ़िज़ ने अपना अधिकतर ध्यान ग़ज़लों की तरफ दिया और उनके बाद के कवियों ने भी इसी शैली का अनुसरण किया।  शायरों की ओर से केवल ग़जल पर ध्यान दिये जाने का नुक़सान यह हुआ कि कविता में पाई जाने वाली व्यापक्ता समाप्त होने लगी।  हाफ़िज़ के बाद जामी एसे कवि थे जिन्होंने केवल ग़ज़ल में नहीं बल्कि कविता के अन्य प्रारूपों का भी प्रयोग किया किंतु वे इसमें अधिक सफल नहीं रहे।

नज़ीरी नैशापूरी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने शायरी में पाई जाने वाली व्यापकता को बाक़ी रखा।  उनको फ़ारसी शायरी का चमकता हुआ सितारा कहा जाता है।  नज़ीरी नैशापुरी ने जिस निपुर्णता के साथ ग़ज़लें कही हैं उसी दक्षता के साथ उन्होंने क़सीदे भी कहे हैं।  इस प्रकार से कहा जा सकता है कि नज़ीरी नैशापुरी ऐसे कवि थे जिन्होंने कविता के सभी प्रारूपों की ओर ध्यान दिया है और किसी एक प्रारूप तक सीमित नहीं रहे हैं।