Apr २३, २०१८ ११:५७ Asia/Kolkata

तक़ीयुद्दीन औहदी बलयानी का मशहूर बलयानी परिवार से सबंध है।

यह वह परिवार है जिसके सभी सदस्य आत्मज्ञानी थे। इस परिवार के कुछ सदस्य हाफ़िज़ शीराज़ी और सअदी शीराज़ी के दौर में थे और बहुत ही मशहूर लोग थे। शैख़ अब्दुल्लाह बलयानी सअदी शीराज़ी के दौर में शीराज़ में रहते थे और शहर की बड़ी हस्तियों में उनकी गिनती होती थी। जामी ने अपनी किताब नफ़ख़ातुल इन्स में शैख़ अब्दुल्लाह बलयानी के सअदी शीराज़ी से संबंध का उल्लेख किया है। औहदी का कुल कई पीढ़ियों के फ़ासले से अबू अली दक़्क़ाक़ी नीशापूरी से मिलता है जो चौथी व पांचवी हिजरी क़मरी के बहुत बड़े सूफ़ी संत थे। यही वजह है कि तक़ीयुद्दीन औहदी बलयानी के नाम के आगे दक़्क़ाक़ी भी लिखा जाता है। यह परिवार फ़ार्स प्रांत के बलयान इलाक़े का रहने वाला था और इसी इलाक़े से इस परिवार के सदस्यों ने दूसरे शहरों व देशों का रुख़ किया। औहदी के पिता मुईनुद्दीन बहुत बड़े धर्मगुरु थे। वह फ़ार्स से इस्फ़हान चले गए थे और वहीं उन्होंने शादी की। इस्फ़हान में 3 मोहर्रम सन 973 हिजरी क़मरी में तक़ीयुद्दीन औहदी इस दुनिया में आए।

तक़ीयुद्दीन औहदी बलयानी अभी बच्चे थे कि बाप का साया सिर से उठने से अनाथ हो गए। उनका बचपन व नौजवानी इस्फ़हान में बीता और वहीं उन्होंने आरंभिक शिक्षा हासिल की और 9 साल की उम्र से शायरी शुरु कर दी थी। उनके बचपन में राजा तहमास्ब ने दारुल ईताम नामक एक अनाथालय क़ायम किया था जहां अनाथ बच्चों का पालन पोषण होता था और वहीं अनाथ बच्चे शिक्षा हासिल करते थे। औहदी ने कुछ समय इसी अनाथालय में बिताया जहां उन्होंने शैख़ुल इस्लाम अली मिन्शार जैसे बड़े शिक्षकों से शिक्षा हासिल की। उन दिनों औहदी का समय जैसा कि उन्होंने अपनी किताब अरफ़ातुल आशेक़ीन में कहा है, शिक्षा हासिल करने में बीता। उन्होंने अपने समय में प्रचलित शिक्षाओं में अरबी व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित और क़ुरआन की शिक्षाएं 12 साल की उम्र तक हासिल की। उसके बाद उन्होंने दर्शनशास्त्र और नैतिकशास्त्र की शिक्षा हासिल की। उन्होंने बचपन में शायरी शुरु कर दी थी लेकिन मां के विरोध के कारण उन्होंने शायरी छोड़ दी और जब तक उनकी मां ज़िन्दा थी उन्होंने शेर नहीं कहे। लेकिन कुछ समय बाद उनकी मां भी इस संसार से चल बसीं।                 

 

तक़ीयुद्दीन औहदी मां के देहान्त के बाद यज़्द चले गए और एक साल तक इस शहर में अपने रिश्तेदारों के पास रहे। उसी ज़माने में राजा तह्मास्ब प्रथम का देहान्त हुआ जिसके बाद ईरान कई साल लगातार अराजकता का शिकार रहा। उस समय औहदी इस्फ़हान लौट गए और 16 साल की उम्र तक वहीं रहकर शिक्षा पूरी की। उके बाद वह शीराज़ गए और वहां चार साल गुज़ारे। इन चार वर्षों में उन्होंने धर्मगुरु मीर क़ारी गीलानी से शिक्षा हासिल की। मीर क़ारी गीलानी के कोई बेटा नहीं था। उन्होंने औहदी को संतान व दामाद के रूप में क़ुबूल किया। इस बीच तक़ीयुद्दीन औहदी आत्मज्ञान व सूफ़ीवाद की ओर उन्मुख हुए। जवान तक़ीयुद्दीन ने जो ज्ञान की विभिन्न प्रचलित शाखाओं में काफ़ी सफलता हासिल कर चुके थे, सफ़र का इरादा किया। वह बीस साल के थे कि इस्फ़हान लौट आए और सफ़वी शासक सुल्तान मोहम्मद ख़ुदा बंदे की सेना में भर्ती हो गए जिसकी छावनी उस समय इस्फ़हान में थी। कुछ समय बाद जब शासक शाह अब्बास प्रथम के हाथ में शासन आया तो वह सेना छोड़ कर क़ज़वीन चले गए। औहदी सैन्य अधिकारियों के साथ काशान और क़ुम के मार्ग से शाही सेना में शामिल हुए।

औहदी ने वहां एक साल बिताया और शासक शाह अब्बास के दरबार में शायरों के साथ शास्त्रार्थ व मोशायरों में गुज़ारा। उसके बाद वह शीराज़ लौट आए और वहां पांच साल और गुज़ारे। इस दौरान शीराज़ में मुशायरों व महफ़िलों में शामिल होते थे। वह मुशायरों में अन्य शायरों की तुलना में कम उम्र के होते हुए भी अपने शेरों से श्रोताओं की तारीफ़ बटोरते थे। उनके शेर इतने उच्च स्तरीय होते थे कि शायरों का एक गुट इस बात को मानने के लिए तय्यार नहीं होता था कि उन्होंने इतने अच्छे शेर कहे हैं यहीं वजह है कि शायरों का यह गुट आए दिन उनका इम्तेहान लेता था। वह हर इम्तेहान में सफल हुए। औहदी से जिस तरह की शायरी के लिए कहा जाता वह वैसी ही शायरी करके दिखाते।

वर्ष 1000 हिजरी क़मरी में शासक शाह अब्बास उज़्बकों के ख़िलाफ़ जंग जीतने के बाद इस्फ़हान आ गए थे, औहदी भी इस्फ़हान आ गए और जीत का जश्न मनाने के लिए आयोजित सभा में शामिल हुए। उन्होंने इस सभा में एक चौपायी पढ़ी जिसे शाह अब्बास ने बहुत पसंद की। औहदी कुछ समय बाद शाही सेना के साथ क़ज़वीन गए और फिर कुछ समय बाद इस्फ़हान लौट आए। इस बीच शाह अब्बास उन्हें इतना सम्मान देने लगा कि शाह अब्बास के दरबारी लोग उन्हें शाह पसंद अर्थात राजा की पसन्दीदा हस्ती कहने लगे।             

तक़ीयुद्दीन औहदी ने इन वर्षों में विभिन्न शहरों का सफ़र किया और वर्ष 1005 में वह पवित्र स्थलों का दर्शन करने के लिए इराक़ गए और चार साल उन्होंने कर्बला, नजफ़, बग़दाद और काज़मैन में बिताए। उनकी बग़दाद में मौलाना तर्ज़ी शुश्तरी जैसे फ़ारसी शायरों के साथ बैठकें होती थीं। औहदी ने अपनी मूल्यवान किताब अरफ़ातुल आशेक़ीन में इराक़ में रहने वाले मौलाना तर्ज़ी शुश्तरी सहित कई ईरानी शायरों का उल्लेख किया है।

पवित्र स्थलों के दर्शन से लौटने के बाद औहदी 1014 हिजरी क़मरी तक इस्फ़हान में रहे और इस दौरान वे किताबें लिखने और शायरी में व्यस्त रहे। यहां तक कि अपने दोस्तों के साथ भारत के सफ़र पर निकल पड़े। उनके साथ मीर अबुल क़ासिम फ़िन्दर्सकी और मीर तुराबी मश्हदी जैसे शायरों व विद्वानों का एक गुट था। औहदी शीराज़, किरमान और क़न्धार होते हुए लाहौर पहुंचे। उन्होंने डेढ़ साल लाहौर में बिताए और जब मुग़ल शासक जहांगीर की सेना आगरा चली गयी तो वह भी आगरा चले गए। आगरा में कुछ समय रहने के बाद वह गुजरात चले गए जहां उन्होंने कुछ साल इस क्षेत्र के शायरों व विद्वानों के हल्क़ों में बिताए। 

 

औहदी ने 1020 हिजरी में हज करने का इरादा किया लेकिन इसमें वह सफल न हुए बल्कि आधे रास्ते से उन्हें आगरा लौटना पड़ा। जिसके बाद उन्होंने कुछ साल आगरा में बिताए और इसी शहर में उन्होंने 1022 में मशहूर किताब अरफ़ातुल आशेक़ीन लिखनी शुरु की और दो साल में उसे पूरा किया। औहदी ने जिस तरह ईरान में विभिन्न शहरों का भ्रमण किया उसी तरह उन्होंने विशाल भारत के अनेक शहरों का भ्रमण किया और हर शहर में विद्वानों, बुज़ुर्गों और शायरों के साथ मुलाक़ात करते। उन्होंने अरफ़ातुल आशेक़ीन किताब में गुजरात में नज़ीरी नीशापूरी और अजमेर में तालिब आमुली के साथ अपनी बैठकों का उल्लेख किया है।

औहदी का भारत में वर्षों रहना उपयोगी साबित हुआ। उन्होंने इस दौरान अरफ़ातुल आशेक़ीन किताब लिखने के अलावा बहुत ज़्यादा शेर कहे और दीवान संकलित किया। इनमें से हर एक के लिए अलग अलग समीक्षा करने की ज़रूरत है।

यह बात पूरे विश्वास से नहीं कही जा सकती कि औहदी का किस स्थान पर देहान्त हुआ लेकिन एक बात स्पष्ट है कि औहदी 1038 से 1039 के बीच ज़िन्दा थे क्योंकि इस दौरान उनके कहे हुए शेर मौजूद हैं। तज़केरतुश शोअरा किताब के अनुसार, औहदी का 1050 में देहान्त हुआ लेकिन इस बात का प्रमाण स्पष्ट नहीं है।