May १५, २०१८ ११:२९ Asia/Kolkata

हमने 10वीं और 11वीं हिजरी क़मरी के ईरानी साहित्यकार व बुद्धिजीवी “तक़ीयुद्दीन मुहम्मद औहदी दक़क़ाक़ी बलयानी काज़रूनी” के बारे में चर्चा की थी। 

आज के कार्यक्रम में भी हम उसी चर्चा को जारी रखेंगे। जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में बताया था कि तक़ीयुद्दीन मोहम्मद दक़्क़ाकी बल्यानी काज़रूनी का जन्म तीन मुहर्रम सन 973 हिजरी क़मरी को इस्फहान नगर में हुआ था। बलयानी का संबन्ध एक मशहूर परिवार से था।  उनके परिवार के लोग रहस्यवाद और सूफीवाद की ओर झुकाव रखते थे।

औहदी ने इस्फ़हान में अरबी की व्याकरण, तर्कशास्त्र तथा गणित जैसे तत्कालीन प्रचलित ज्ञानों को मात्र 12 साल की आयु में सीख लिया था।  इसके पश्चात उन्होंने दर्शनशास्त्र और नैतिकता जैसे विषयों की शिक्षा आरंभ की। उन्होंने अपनी युवा अवस्था का कुछ भाग यज़्द और शीराज़ नगरों में बिताया।  बलयानी ने इन नगरों की महान हस्तियों से ज्ञान अर्जित किया। इसी दौरान उनका झुकाव सूफीवाद और रहस्यवाद की ओर हो गया।  बलयानी शीराज़ तथा यज़्द में कवि सम्मेलनों में भाग लिया करते थे जहां पर उपस्थित लोग उनके शेरों की बहुत प्रशंसा किया करते थे।  तत्कालीन शासक शाह अब्बास ने जब उज़बेकों पर विजय प्राप्त की तो उस सफलता के बारे में शाह ने एक समारोह आयोजित करवाया था। औहदी ने इस समारोह में जो रुबाइयां या दोहे पढ़े थे उसके कारण उन्हें "शाह पसंद" की उपाधि दी गयी थी।

सन 1014 हिजरी क़मरी के अंत में बलयानी ने अपने कुछ साथियों के साथ भारत की यात्रा की। इस यात्रा में उनके साथ फारसी भाषा जानने वाले कुछ शायर भी थे। औहदी बलयानी शीराज़, किरमानशाह और क़ंधार होते हुए लाहौर गये। औहदी ने भारत के कई नगरों का भ्रमण किया।  औहदी के बारे में यह कहा जाता है कि उनके जीवन के अंन्तिम काल के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।  यही कारण  है कि उनके निधन की सही तिथि के बारे में ज्ञान नहीं है।  उनके अन्तिम समय के बारे में केवल इतना ही ज्ञात है कि औहदी 1038 से 1039 के वर्षों में ज़िन्दा थे क्योंकि उन वर्षों में उन्होंने जो शेर कहे हैं वे मौजूद हैं।

भारत आवास के दौरान औहदी को अध्ययन करने का अच्छा मौक़ा मिला।  इस दौरान औहदी ने लेखन का काम जारी रखा।  इसके अतिरिक्त उन्होंने संकलन का काम भी किया।  उनकी मशहूर किताब का नाम है, “अरफ़ातुल आशेक़ीन”।  उन्होंने कई किताबें लिखीं जिनमें से कुछ के बारे पता नहीं है।  औहदी बलयानी की कई हस्तलिखित किताबें विश्व के कई पुस्तकालयों में मौजूद हैं।  औहदी की कुछ किताबों के नाम इस प्रकार हैं जैसे अरफातुल आशेक़ीन, अरसातुल आरेफीन, काबए इरफ़ान, फ़िरदौसे ख़याल, सुरमये सुलैमानी और कुल्लियाते अशआर आदि।

“तक़ीयुद्दीन मुहम्मद औहदी दक़क़ाक़ी बलयानी काज़रूनी” की रचनाओं से पता चलता है कि वे एक परिश्रमी साहित्यकार थे।  उन्हें शायरी पर पूरा कंट्रोल था।  हालांकि कुछ आलोचको का बलयानी के बारे में दूसरा दृष्टिकोण है।  कुछ ने उन्हें उच्च स्तर का कवि माना है जबकि कुछ अन्य आलोचक बलयानी को मध्य स्तर का कवि मानते हैं।  बलयानी का तख़ल्लुस “तक़ी” था जबकि कुछ लेखक यह समझते थे कि उनका तख़ल्लुस औहदी है।  यही कारण है कि कुछ ने उनके जीवन के बारे में जो कुछ लिखा है वह औहदी शीर्षक के अन्तर्गत है।

बताया जाता है कि अपने काल के कवियों में औहदी, सबसे अधिक उर्फ़ी शीराज़ी को महत्व देते थे।  यही कारण है कि उन्होंने बहुत सी कविताएं, उर्फ़ी शीराज़ी की शैली में कही हैं।  औहदी की नज़र कविता के हर आयाम पर थी इसीलिए उन्होंने कविता के हर क्षेत्र में कुछ न कुछ कहा है।  अपनी किताब “अरफ़ातुल आशेक़ीन” में औहदी ने अपने जीवन के बारे में जो बातें लिखी हैं उनके साथ ही कुछ ग़ज़लें भी लिखी हैं।

औहदी काज़रूनी की महत्वपूर्ण रचनाओं में अरफातुल आशेक़ीन, अरसातुल आरेफीन का नाम लिया जा सकता है।  इस पुस्तक में औहदी ने फ़ारसी भाषा के 3400 कवियों के जीवन और उनके चुने हुए शेरों को पेश किया है।  विशेष बात यह है कि उन्होंने फ़ारसी शायरी के आरंभ से लेकर अपने समय तक सारे ही मशहूर कवियों का उल्लेख इस किताब में किया है।  औहदी की एक अन्य किताब का नाम है काबए इरफ़ान।

अरफ़ातुल आशेक़ीक नामक किताब लिखने के बाद औहदी काज़रूनी ने इस किताब को आम लोगों के समझाने के उद्देश्य से इसका निचोड़ लिखा जिसका नाम काबए इरफ़ान रखा। उनकी यह किताब, जो वास्तव में अरफ़ातुल आशेक़ीन का सारांश है, सन 1036 हिजरी क़मरी में गुजरात के अहमदाबाद में पूरी हो थी।  इस किताब में कवियों के नामों को वर्णमाला के हिसाब से रखा गया है।  किताब में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किस कवि का संबन्ध किस काल से है और उसका महत्व क्या है।  औहदी ने अपनी यह किताब जहांगीर को उपहार में दी थी।  बताते हैं कि औहदी की किताब काबए इरफ़ान अभी तक छप नहीं सकी है किंतु उसकी हस्तलिखित कापी अब भी सुरक्षित है।  उनकी इस किताब की एक प्रति ईरान के राष्ट्रीय पुस्तकालय में मौजूद है।

काबए इरफ़ान नामक किताब लिखने के बाद औहदी ने जहांगीर के आदेश पर एक किताब लिखी “इन्तेख़ाबे काबए इरफ़ान”।  इस किताब में समय या काल के हिसाब से कवियों को प्राचीनकाल और आधुनिक काल के साथ ही मध्य काल में बांटा गया है।  सईद नफ़ीसी और नकवी जैसे तत्कालीन शोधकर्ताओं ने इसकी समीक्षा करके इसे प्रशंसनीय बताया है।  नक़वी ने औहदी की इस किताब की समीक्षा में लिखा है कि औहदी के देहांत के कुछ वर्षों के बाद भारत के एक लेखक ने सन 1155 हिजरी क़मरी में “गुलदस्ता” नामक एक किताब लिखी थी।  इस किताब को लिखने में उन्होंने औहदी की किताब काबए इरफ़ान से बहुत मदद ली थी।  उस भारतीय लेखक का नाम था, अब्दुल वह्हाब आलमगीर मंसूरख़ान।

जब “तक़ीयुद्दीन मुहम्मद औहदी दक़क़ाक़ी बलयानी काज़रूनी” ने भारत की यात्रा की तो उनके साथ कुछ कवि भी थे।  इन कवियों में से एक का नाम था हैदर हमदानी।  हैदर हमदानी ने औहदी को इस बात के लिए प्रेरित किया था कि वे कवियों के हास्य लेखों को संकलित करें।  औहदी ने उनकी बात मानते हुए पिछले छह वर्षों के बीच इस संबन्ध में जो कुछ इकट्ठा किया था उसे संकलित किया।  उन्होंने अपने इस संकलन का नाम “फ़िरदौसे ख़याल” रखा।  सन 1020 में औहदी ने अपना यह काम पूरा किया था।  उनकी इस किताब की मूल रचना की कोई हस्तलिखित प्रति मौजूद नहीं है।  हालांकि अपनी किताब अरफ़ातुल आशेक़ीन की भूमिका में औहदी ने बताया है कि फ़िरदौसे ख़याल में उन्होंने अपनी भारत यात्रा का उल्लेख किया है।

औहदी की एक अन्य पुस्तक है, “सुरमए सुलैमानी”।  यह किताब वास्तव में फ़ारसी भाषा का शब्दकोश है।  इस शब्दकोष में फ़ारसी भाषा के उन शब्दों का विस्तार से उल्लेख किया गया है जो आम बोलचाल में प्रयोग नहीं किये जाते।  इस किताब में उन्होंने बहुत से एतेहासिक और भौगौलिक नामों के साथ ही कई पुरानी दवाओं के नाम भी लिखे हैं।  यह किताब 32 भागों में विभाजित है।  औहदी ने यह किताब उस समय लिखी जब वे इस्फ़हान में रहा करते थे।  इसमें औहदी तथा एक अन्य लेखक सरवरी काशानी के बीच वार्ता का भी उल्लेख है जिन्होंने एक अन्य शब्दकोश लिखा था।  यही औहदी की एकमात्र पुस्तक है जो प्रकाशित हुई है।