May २१, २०१८ ०७:५० Asia/Kolkata

हमने कहा था कि तक़ीयुद्दीन मोहम्मद दक़्क़ाकी बल्यानी काज़रूनी तीन मोहर्रम 973 हिजरी कमरी को इस्फहान नगर में पैदा हुए थे।

बल्यानी का संबन्ध एक मशहूर परिवार से था। उनके परिवार के लोग रहस्यवादी और सूफीवाद की ओर रुझान रखते थे। औहदी ने अरबी ब्यकरण, तर्कशास्त्र और गणित जैसे अपने समय के प्रचलित ज्ञानों को 12 साल की उम्र में सीख लिया था। उसके पश्चात उन्होंने दर्शनशास्त्र और नैतिकता को सीखना आरंभ किया। उन्होंने अपनी जवानी व नैजवानी का कुछ भाग यज़्द और शीराज़ में बिताया और वहां की महान हस्तियों से ज्ञान अर्जित किया। उसी समय उनका रुझान सूफीवाद और रहस्यवाद की ओर हो गया। उज़बेकान के मुकाबले में शाह अब्बास को जो सफलता मिली थी और उसकी सफलता का जश्म मनाने के लिए जो समारोह आयोजित हुआ था औहदी ने उसमें जो रुबाई पढ़ी थी उसके कारण उन्हें "शाह पसंद" की उपाधि दी गयी थी। 1014 हिजरी क़मरी के अंत में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ भारत की यात्रा की। इस यात्रा में फारसी भाषा जानने वाले और कुछ शायर उनके साथ थे और वह शीराज़, किरमानशाह और कंधार होते हुए लाहौर गये। उनके निधन की तारीख़ सही तरह से स्पष्ट नहीं है पर इतना ज्ञात है कि औहदी 1038 से 1039 के वर्षों में ज़िन्दा थे क्योंकि उन वर्षों में उन्होंने जो शेर कहे हैं वे मौजूद हैं। औहदी ने बहुत सी किताबें लिखी हैं जो अभी भी मौजूद हैं। जैसे अरफातुल आशेक़ीन, अरसातुल आरेफीन, काबये इरफान, फिरदौसे खयाल, सुरमये सुलैमानी और कुल्लीयाते अशआर।

औहदी की सबसे महत्वपूर्ण किताब का नाम अरफातुल आशेक़ीन और अरसातुल आरेफीन है। यह किताब अब तक सुधार व एडिटिंग के साथ ईरान में दो बार प्रकाशित हो चुकी है और हाथ से लिखी हुई अस्ल किताब मलिक राष्ट्रीय पुस्तकालय में मौजूद है। यह किताब आठ खंडो में है और फारसी भाषा में शायरों और लेखकों की जीवनी के बारे में सबसे महत्वपूर्ण किताब है जो 1022 से 1024 हिजरी कमरी के वर्षों में लिखी गयी है।

"अरफातुल आरेफीन" एक बहुत विस्तृत किताब है जिसमें फारसी भाषा के आरंभिक काल के तीन हज़ार चार सौ से अधिक शायरों की जीवनी और उनके शेरों का वर्णन किया गया है। औहदी ने इस किताब में विशेष प्रकार का वर्गीकरण किया है। औहदी ने इस किताब का वर्गीकरण अक्षरों के हिसाब से किया है और हर अक्षर को भी तीन भागों में विभाजित किया है। अरफातुल आशेक़ीन किताब के पहले भाग में चौथी और पांचवीं हिजरी क़मरी के शायरों और लेखकों की जीवनी का उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार इस किताब के अंतिम भाग में 6ठीं और उसके बाद की शताब्दियों के शायरों और लेखकों की जीवनी और उनके शेरों का उल्लेख है जबकि किताब के दूसरे भाग में इन दो कालों के मध्य के शायरों और लेखकों की जीवनी और उनके शेरों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इस किताब में एक विस्तृत प्रस्तावना है और लेखक की अपेक्षाकृत विस्तृत जीवनी का भी उल्लेख उसी में किया गया है।

तक़ीयुद्दीन औहदी ने अरफातुल आशेक़ीन किताब लिखने से पहले "फिरदौसे ख़याले औहदी" नाम की एक किताब लिखी थी जिसमें शायरों के केवल चुने हुए शेरों को ही लिखा था और उसमें शायरों की जीवनी का उल्लेख नहीं था। 1022 हिजरी कमरी में औहदी भारत के आगरा नगर में रहते थे उस समय वहां की एक हस्ती ने उनसे अनुरोध किया कि औहदी अपनी किताब फिरदौसे ख़याल को पूरा करें और शायरों की जीवनी का भी उसमें उल्लेख करें। इस प्रकार तक़ीयुद्दीन औहदी ने नई किताब लिखनी आरंभ की और उसका नाम "अरफातुल आशेक़ीन व अरसातुल आरेफीन" रखा। उस समय प्रचलित यह था कि किताब लिखने वाले अपनी किताब को महान हस्तियों को भेंट कर देते थे और उस पर उनका नाम लिखा जाता था किन्तु औहदी ने अपनी किताब किसी को भेंट नहीं की। औहदी ने इस बारे में किताब की प्रस्तावना में लिखा है कि उनका उद्देश्य शायरों के नामों को अमर बनाना है और वह अपनी किताब को किसी को भेंट नहीं करेंगे। इस किताब को लिखने में दो साल का समय लगा परंतु वास्तविकता यह है कि यद्पि किताब का अस्ली काम 1024 में खत्म हो गया था परंतु औहदी जब तक ज़िन्दा थे तब तक उसमें नये तथ्यों की वृद्धि करते रहते थे और जब भी उन्हें नये शेर और उसके शायर के बारे में कोई जानकारी मिलती थी तो उसे उस शायर के नाम के नीचे लिख देते थे। जैसे 1025 हिजरी कमरी में मीर अली क़ज़वीनी के बारे में जो जानकारी मिली उन्होंने उसे उनके नाम के नीचे लिख दिया किन्तु उनकी किताब में कुछ चीज़ें वर्ष 1041 और 1042 हिजरी कमरी से संबंधित दिखाई देती हैं। इस किताब में औहदी की लेखन शैली यह है कि वह जब कोई बात लिखते हैं तो अधिकांशतः उसकी तारीख और जगह का उल्लेख करते हैं और जहां उन्होंने ये बातें लिखी हैं और वे प्रायः भारतीय शहर हैं।

“अरफातुल आशेक़ीन” किताब रूदकी की जीवनी से शुरू होती है। किताब के लेखक के कथनानुसार निश्चित रूप से रूदकी का नाम फारसी भाषा के पहले शायर के रूप में आया है और दूसरे स्थान पर यानी जहां रा अक्षर का भाग होता है वहां विस्तार से उनकी जीवनी बयान की है। “अरफातुल आशेक़ीन” किताब में जिन शायरों का वर्णन किया गया है डाक्टर नक़वी उनकी संख्या 3195 बताते हैं जबकि दूसरों का कहना है कि इस किताब में लगभग 3300 शायरों का उल्लेख किया गया है परंतु “अरफातुल आशेक़ीन” किताब के आठ खंडों की समीक्षा से यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि इस किताब के लेखक ने 3500 से अधिक शायरों का वर्णन अपनी किताब में किया है।

 

“अरफातुल आशेक़ीन” किताब को लिखने में तक़ीयुद्दीन औहदी ने जिन स्रोतों से लाभ उठाया है उनमें महत्वपूर्ण स्रोत औफी की “लोबाबुल अलबाब” अमीर अलीशीर नवाई की “मजालिसुन्नफाएस, दौलत शाह समरकन्दी की “तज़केरतुश्शोरआ” जामी की “नफ़हातुल उन्स” “हमायुनी इतिहास” नामक किताबें और  नेज़ामी और अरुज़ी के चार लेख हैं जिनसे उन्होंने “अरफातुल आशेक़ीन” किताब को लिखने में लाभ उठाया है। औहदी ने अपनी किताब “अरफातुल आशेक़ीन” में औफी का बार- बार नाम लिया है और एक जगह पर वह हन्ज़ला बादग़ीसी के नाम के नीचे “हमायुनी इतिहास” किताब से सामानियों के बारे में कुछ तथ्यों का वर्णन करते हैं। इसी प्रकार उन्होंने “अल्फी” नामक इतिहास की किताब से शम्सुद्दीन जुईनी के बारे में कुछ बातों का उल्लेख किया है परंतु चौथी और पांचवी हिजरी कमरी के बाद के शायरों और अपने समय के शायरों के बारे में अधिकांशतः व्यक्तिगत बातें व जानकारियां लिखी हैं और स्वाभाविक रूप से उन्होंने इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि किस किताब से लाभ उठाया है।

 

तक़युद्दीन औहदी के समय में जो शायर थे उनमें से अधिकांश से उन्होंने मुलाक़ात की थी और उनके अच्छे शेरों को ले लिया और उनका वर्णन अपनी किताब “अरफातुल आशेक़ीन” में किया है और इसी प्रकार वह शेर पढ़ने की सभाओं में भाग भी लेते थे। उदाहरण के तौर पर जहां वह महमूद एयानी का उल्लेख करते हैं वहां गद्य और पद्य में उनकी कुछ रचनाओं का नाम लेते और कहते हैं कि “हल्लूर्रूमज़” “नज़्मे शरहिल कुनूज़” और “आसारुल अतवार” जैसी उनकी कुछ रचनाएं हमारे पास हैं।

तक़युद्दीन औहदी ने दूसरे शायरों और साहित्यकारों के बारे में भी कहा है कि यद्यपि उनकी सेवा में हाज़िर नहीं हो सका परंतु उनकी जीवनी और उनकी रचनाओं के बारे में काफी अध्ययन किया है।

तक़युद्दीन औहदी की जो “अरफातुल आशेक़ीन” किताब है वह पूरी तरह से एक जैसी नहीं है बल्कि इस विस्तृत किताब के विभिन्न भागों में अंतर को देखा जा सकता है। औहदी ने इस किताब में पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार उन्होंने शायरों के उन नामों का प्रयोग किया है जिन नामों से उन्हें शेरों में जाना जाता है। उनकी लेखन शैली प्राकृतिक नहीं होती है विशेषकर उस समय जब वह शायरों की विशेषता बयान कर रहे होते हैं।

तक़युद्दीन औहदी चूंकी साहित्यकार और प्रखर वक्ता थे और भाषण देने की शैली से अवगत थे इस आधार पर उन्होंने टीका- टिप्पणी को दृष्टि में रखकर अपनी किताब “अरफातुल आशेक़ीन” को लिखा है और शेरों को साहित्यकार की दृष्टि से देखा है। उदाहरण के तौर पर कुछ शेरों के बारे में लोगों ने कहा है कि यह नसीरी के शेर हैं जबकि उन्हीं शेरों के बारे में कुछ ने कहा है कि ये इसमत बोख़ारी के शेर हैं। उन शेरों के बारे में औहदी ने कहा है कि सबल विचार यह है कि यह इसमत के शेर हैं और सच्चाई यह है कि यह शेर पूरी तरह इसमत की शैली से मेल खाते हैं। इसी तरह जब नेज़ारी हरवी की बात करते हैं तो वहां औहदी कहते हैं कि कुछ लोग यह कहते हैं कि यह गज़ल नेज़ारी हरवी की है जबकि कुछ कहते हैं कि नेज़ारी हरवी की नहीं है किन्तु ग़ज़ल की जो शैली है वह खुद बता रही है कि मैं कौन हूं यानी किसकी ग़ज़ल हूं। शायद यह ग़ज़ल उस नेज़ारी क़हिस्तानी की है जो हेरात में पले- बढ़े।