अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर तबरी- 6
हमने बताया था कि शताब्दियां पहले वर्ष 224 हिजरी क़मरी में ईरान के उत्तर में स्थित आमुल शहर में एक बच्चे ने जन्म लिया और ईश्वर ने उसके भाग्य में लिख दिया था कि वह इस्लामी जगत का पहला महान इतिहासकार और पवित्र क़ुरआन का व्याख्याकार बनेगा।
इस बच्चे का नाम अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर तबरी था।
मुहम्मद बिन जरीर तबरी ने 12 वर्ष तक अपने जन्म स्थल में आरंभिक ज्ञान प्राप्त और 12 वर्ष की आयु के बाद वह पिता के कहने पर उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्त करने के लिए यात्रा पर निकल गये और उन्होंने अपनी पहली यात्रा रय की की।
मुहम्मद बिन जरीर तबरी, एक योग्य और मेधावी व्यक्ति थे जिनका उदाहरण मनुष्यों में बहुत ही कम मिलता है। वह हमेशा ज्ञान और शिक्षा को पसंद करते थे और उन्होंने अपनी पूरी उम्र ज्ञान की प्राप्ति और शिष्यों की तैयारी में व्यतीत कर दी। यहां तक कि ज्ञान की प्राप्ति में बाधा न पैदा हो इसीलिए उन्होंने विवाह तक नहीं किया। तबरी दक्षता और ज्ञान में चरम पर पहुंचने के बारे में कहते हैं कि मैंने सात साल की आयु में पवित्र क़ुरआन याद करना शुरु दिया और आठ वर्ष की आयु में मैं इमामे जमाअत हो गया और लोगों को नमाज़ पढ़ाया करता था और नौ वर्ष की आयु में मैंने हदीस लिखना शुरु किया, उसके बाद वह कहते हैं कि मेरे पिता ने एक सपना देखा जिसके बाद बचपन से ही उन्होंने मेरी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया।
ऐसा प्राचीनतम स्रोत जिसमें तबरी के बारे में पूर्ण सूचना मिल सकती है, वह इब्ने नदीम की पुस्तक अलफ़ेहरिस्त है जो वर्ष 377 हिजरी क़मरी में तबरी के निधन के 67 वर्ष बाद लिखी गयी। अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर तबरी का निधन शनिवार 26 शव्वाल वर्ष 310 हिजरी क़मरी में बग़दाद में हो गया। उन्हें उन्हीं के घर में दफ़्न कर दिया गया।

तबरी की एक अन्य प्रसिद्ध पुस्तक, पवित्र क़ुरआन की व्याख्या है। तफ़सीरे तबरी, इस्लामी ज्ञान व संस्कृति के क्षेत्र में सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण तफ़सीरों और व्याख्याओं में से है। बुद्धिजीवियों के निकट यह पुस्तक बहुत ही मूल्यवान और तर्क देने योग्य है। तबरी ने पुस्तक की भूमिका में स्वयं अपनी तफ़सरी को जामेउल बयान अन तावीले अय्य अलक़ुरआन का नाम दिया है किन्तु स्वयं किताब में इस नाम की ओर कहीं इशारा नहीं मिलता। यही कारण है कि इसके वास्तविक नाम को इतनी ख्याति नहीं मिली और यह लेखक के नाम से ही प्रसिद्ध हुई और लोगों में तफ़सीररे तबरी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।
यह सही पता नहीं है कि तबरी ने यह पुस्तक लिखने का काम कब शुरु किया। स्रोतों में केवल दो बातें ही मिलती है। एक पुस्तक में वर्ष 270 हिजरी क़मरी बराबर 882 ईसवी की तारीख़ मिलती है जबकि दूसरी जगह 283 से 290 हिजरी क़मरी के बीच का सन बयान किया गया है। यह बातें तबरी के शिष्यों ने बयान की हैं। इन कथनों के आधार पर यह परिणाम निकाला जा सकता है कि पुस्तक के विभिन्न भाग हाथ से लिखे हुए मौजूद थे और समय बीतने के साथ साथ उस्में वृद्धि की गयी और अंत में लेखक या तबरी के शिष्यों की ओर से उसे अंतिम रूप दिया गया।
याक़ूत हमवी कुछ इतिहासकारों के बारे में लिखते हैं कि तबरी ने आरंभ में अपनी व्याख्या का ज्ञान जो तीस हज़ार पृष्ठों पर आधारित था अपने शिष्यों को बयान किया किन्तु जब उन्हें यह पता चला कि शिष्य इस ज़बरदस्ती से परेशान हैं तो उन्होंने खेद प्रकट करने के बाद उसको तीन हज़ार पृष्ठों में समेट दिया। यह बात आज की तफ़सीरे तबरी से बहुत निकट महसूस होती है। यद्यपि व्याख्या की पुस्तक के बारे में जो आरंभ में बात बताई गयी है वह कुछ बढ़ा चढ़ा के हो किन्तु दस्तावेज़ों में से पता चलता है कि तबरी की व्यापकता, क़ुरआन की व्याख्या पर निर्भर है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस पुस्तक के लिखे जाने के समय जो बग़दाद में और तीसरी हिजरी सहस्त्राब्दी के आरंभ में अंजाम पायी, व्याख्या के इतिहास ने क्लासिकल दौर में क़दम रखा। इस काल में जो तफ़सीर के विस्तार का महत्वपूर्ण दौर था, तफ़सीर अपने पारंपरिक ढंग से लिखी जाती थीं और इस ज्ञान में समस्त बुद्धिजीवियों के दृष्टिकोणों को पुस्तक में जगह देकर एक नई शैली आरंभ की और उसके बाद से पवित्र क़ुरआन की व्याख्या लिखने की नई शैली आरंभ हो गयी।
तबरी उन धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने अपनी व्याख्या की पुस्तक लिखने में जीवनी और शिष्टाचार लिखने की शैली से प्रभावित होकर अतीत के व्याख्याकारों के दृष्टिकोण बयान किए किन्तु उन्होंने इन दृष्टिकोणों को बयान करने को ही पर्याप्त नहीं समझा बल्कि उनकी आलोचना की और फिर उन समस्त दृष्टिकोणों में से सबसे सही दृष्टिकोण का चयन करने का प्रयास भी किया। इस प्रकार से उन्होंने विभिन्न दृष्टिकोणों को पेश करने और उनकी आलोचना करने के बाद सबसे सही राय पेश करने की शैली पेश की और इसी शैली को क़ुरआन की तफ़सीर लिखने में प्रयोग किया। इस प्रकार से उन्होंने पवित्र क़ुरआन की व्याख्या के इतिहास में एक नई चीज़ दाख़िल कर दी। तावील और तफ़सीर के शाब्दिक अर्थों की एक दूसरे से तुलना से पता चलता है कि वह पूर्वजों के समस्त दृष्टिकोणों को बयान तो करते थे और उनकी आलोचना करके केवल एक को ही स्वीकार करते थे और यही कारण है कि उन्होंने अपनी किताब का नाम रखने में तफ़सीर के बजाए तावील शब्द का प्रयोग किया।
तबरी के काल में जिन महत्वपूर्ण तफ़सीरों को लिखा गया है उनमें से एक इब्ने अबी हातम राज़ी और इब्ने मुन्ज़िर नीशापूरी की तफ़सीरों का नाम लिया जा सकता है। इन दो पुस्तकों में प्रयोग की गयी रिवायतों को दूसरों की ओर से प्रयोग किए जाने से पता चलता है कि इन दो पुस्तकों में भी तबरी की तफ़सीर से कम रिवायतों और हदीसों को शामिल नहीं किया गया किन्तु तीनों किताबों पर नज़र डालने वाले यही परिणाम निकालते हैं कि यह दोनों किताबें कभी भी किसी समय तबरी जैसी ख्याति प्राप्त नहीं कर सकीं।
तबरी अपनी पुस्तक की लंबी भूमिका में तफ़सीर लिखने की शैली को बयान करते हैं। तबरी अपनी तफ़सीर की किताब में अरबी भाषा को पवित्र क़ुरआन की आयतों की व्याख्या का महत्वपूर्ण साधन क़रार देते हैं। वह क़ुरआने मजीद को ऐसी किताब क़रार देते हैं जो शुद्ध अरबी में है जो अरब भाषी राष्ट्र के सात लहजों में उतरी है। वह कुछ रिवायतों पर बल देते हुए कहते हैं कि पवित्र क़ुरआन की आयतों को जो तफ़सीर योग्य हैं, तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला गुट वह आयतें हैं जिनकी व्याख्या केवल ईश्वर को ही पता होती हैं। दूसरा गुट उन आयतों का है जिनकी तबरी के अनुसार, व्याख्या केवल पैग़म्बरे इस्लाम ही कर सकते हैं। तीसरा गुट उन आयतों का है जो ही अरबी भाषा जानता है उनकी व्याख्य कर सकता है। तबरी भूमिका के अंत में रिवायतों को बयान करके अपनी तरफ़ से व्याख्या करने की निंदा करते हुए पहले और दूसरे गुट के लिए व्याख्याकार का रास्ता बंद कर देते हैं।
क्लाउड जिलियो का मानना है कि तबरी ने इस पुस्तक में दक्षिणपंथी इस्लामी मत का चित्रण पेश किया। इस प्रकार से वह अपनी आलोचनात्मक चर्चाओं में किसी विशेष व्यक्ति या गुट पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते। उनका मानना है कि यद्यपि तबरी वाद विवाद और धार्मिक चर्चाओं के माहौल में पले बढ़े हैं इसीलिए उन्होंने उस माहौल से प्रभावित होकर वादशास्त्र के तर्क पेश किए और इस चीज़ को हम पुस्तक की भूमिका से अंत तक देख सकते हैं। दूसरे साधन के रूप में उन्होंने अरबी भाषा का चयन किया क्योंकि उनका मानना था कि पवित्र क़ुरआन की भाषा सभी से उच्च और श्रेष्ठ है, इस चीज़ ने उनकी बहुत अधिक सहायता की ताकि वह बड़ी सरलता से अपने दृष्टिकोण को बयान कर सकें। यही कारण है कि उनकी व्याख्या में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रकार से कि उनकी तफ़सीर की किताब, रिवायतों द्वारा तफ़सीर की जाने वाली किताब होने के बावजूद वादशास्त्र की प्रवृत्ति को अपने अंदर शामिल किए हुए होती है। (AK)