Apr ०४, २०१६ ०६:५० Asia/Kolkata

अबू इस्माईल अब्दुल्लाह बिन मंसूर अंसारी 396 हिजरी क़मरी में तूस के इलाक़े कोहन्दोज़ में पैदा हुए थे।

अबू इस्माईल अब्दुल्लाह बिन मंसूर अंसारी 396 हिजरी क़मरी में तूस के इलाक़े कोहन्दोज़ में पैदा हुए थे। उनके महत्वपूर्ण कार्यों में से एक रहस्यवाद या परिज्ञान का वर्गीकरण था। उन्होंने ही सामान्य जीवन के नियमों को रहस्यवाद के चरणों में शामिल किया। इस प्रकार, प्रत्येक सूफ़ी जीवन से जुड़ने के साथ साथ आध्यात्मिक जीवन भी व्यतीत करता है और अपने मार्ग और शरीअत में समन्वय पैदा करता है। इलाही नामा के नाम से प्रसिद्ध मुनाजात नामा शेख़ की सबसे प्रसिद्ध किताब है और फ़ारसी के अलावा अंग्रेज़ी भाषा में कई बार प्रकाशित हो चुकी है।



अब्दुल्लाह अंसारी की किताब मुनाजात नामा की विचारधारा के बारे में किताब की समीक्षा और उसमें प्रस्तुत किए गए विषयों से पता लगाया जा सकता है और उसे तीन भागों एकेश्वरवाद, ज्ञानवाद और रहस्यवाद में बांटा जा सकता है।

पहले भाग में ईश्वर को एक मानना किताब की मूल विषय वस्तु है। ख़्वाजा अब्दुल्लाह ईश्वर को हर चीज़ और हर विवरण से पाक मानते हैं। उसे समझने और सोचने से पाक मानते हैं।

वे एकेश्वरवाद को विचारों की सीमा से परे मानते हैं और कहते हैं कि इंसान एकेश्वरवाद को नहीं समझ सकता। वे लिखते हैं, वास्तविक एकेश्वरवाद बुद्धि की सीमा से परे है, वास्तविक एकेश्वरवाद भ्रम से सुरक्षित है, मैं जानता हूं कि है, लेकिन नहीं जानता कि कैसे है। उन्होंने अपनी किताब में ईश्वर के संबंध में हर प्रकार के विवरण का इनकार किया है।



इस संदर्भ में इसी विषय को जारी रखते हुए वे ईश्वर को पहचानने का भी इनकार करते हैं और स्वयं को हक़ अर्थात ईश्वर को पहचानने से असमर्थ मानते हैं। हे ईश्वर मैंने सोचा कि मैं तुझे पहचान चुका हूं, लेकिन अब उस विचार और पहचान को पानी में फेंक चुका हूं।

एक स्थान पर कहते हैं कि अगर ईश्वर के मित्रों को पहचान लोगे तो सत्य को प्राप्त कर लोगे। वास्तव में ईश्वर के मित्र ईश्वर को पहचानने का कारण बनते हैं।

धर्म से संबंधित विषयों वाले भाग में ईश्वर के ज्ञान और ज्ञानवाद से संबंधित विषयों को प्रस्तुत किया गया है और अंततः ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने से असमर्थता जताई गई है। इस भाग का स्पष्ट निष्कर्ष यही है। इसके बावजूद ख़्वाजा अब्दुल्लाह ने हमेशा यह प्रयास किया है कि ईश्वर को पहचानने के लिए अपने आध्यात्मिक अनुभवों का सहारा लें। इस भाग में रहस्यावादी दृष्टिकोणों और क़ुरान की आयतों और हदीसों का उल्लेख नहीं किया गया है। मोटे तौर पर उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक एवं रहस्यवादी सिद्धांतों से कम ही लाभ उठाया है और अक्सर अपने अनुभवों को बयान किया है।



ख़्वाजा अब्दुल्लाह का मानना है कि ईश्वर उनके कर्मों को देख रहा है, इसलिए कर्मों द्वारा स्वर्ग में नहीं पहुंचा जा सकता। उनका मानना है कि स्वर्ग तपस्वियों का स्थान है, न कि उपासकों का। वे यद्यपि तपस्या को मज़दूरी बताते हैं, लेकिन कर्म से हाथ खींचने को भी ईश्वर का आभार व्यक्त न करना मानते हैं।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह उन रहस्यवादियों में से हैं, जो यद्यपि बहुत धार्मिक हैं और ईश्वरीय आदेशों के पालन में बहुत गंभीर, लेकिन उनका मानना है कि ईश्वर की कृपा के मुक़ाबले में बंदे के पापों का कोई भार नहीं है। वे कभी कभी तपस्या में इतने लीन हो जाते हैं कि ईश्वर को समस्त चीज़ों का स्रोत और कारण मानते हैं, यहां तक कि कहते हैं, सब कुछ वह करता है और इसकी और उसकी गर्दन में डाल देता है।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह उन विद्वानों में से हैं, जो शरीअत का पालन करते हैं और शरीअत को ज्ञान पर प्राथमिकता देते हैं और बिना शरीअत के ज्ञान को भटकने का कारण मानते हैं।

उन्होंने जिन विषयों पर ध्यान दिया है, उनमें से एक प्रलय है। प्रलय के बारे में विचार और प्रलय से भय को उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है वे यद्यपि ईश्वर की कृपा को अनंत एवं असीम मानते हैं, इसके बावजूद अपने कर्मों के बारे में सचेत हैं। वे कहते हैं, जब अपने कर्मों के बारे में विचार करता हूं तो भय की लहरें मुझे घेर लेती हैं, लेकिन जब उसकी कृपा को देखता हूं तो मेरा साहस शिखर पर होता है।


रहस्यवाद के शोधकर्ताओं के मुताबिक़, इस्लाम की आरम्भिक शताब्दियों में हसन बसरी के विश्वासों के आधार पर भय का प्रचलन था, लेकिन पांचवी शताब्दी में धीरे धीरे यह आशा में परिवर्तित हो गया।

कहा जाता है कि हसन बसरी ने एक व्यक्ति को हंसते हुए देखा, उससे पूछा क्या तुम्हारे पास नकीर और मुनकिर के सवालों का जवाब है? क्या पुले सिरात से गुज़र चुके हो, क्या तुम्हारे कर्मों को तराज़ू में तोला जा चुका है, उस व्यक्ति ने हर सवाल का न में उत्तर दिया। अंत में वे उससे कहते हैं कि अफ़सोस, फिर क्यों हंस रहे हो? लेकिन ख़्वाजा अब्दुल्लाह और उनके समकालीन विद्वानों के रहस्यवाद में ईश्वर की कृपा के प्रति आशा की इंसान के जीवन में अधिक भूमिका है। वे कहते हैं, दुआ करना और प्रत्येक चीज़ ईश्वर से मांगने का असर स्पष्ट है।



मुनाजात नामा किताब के अन्य विषय रहस्यवादी हैं। तपस्या दुनिया से सन्यास लेने के अर्थ में, मंसूर हल्लाज और उनका अनलहक़ कहना, ख़य्यामी विचार, प्रेम और श्रम ख़्वाजा अब्दुल्लाह की किताब के अन्य महत्वपूर्ण रहस्यवादी विषय हैं। ख़्वाजा अब्दुल्लाह के निकट तपस्या, दुनिया और जो कुछ उसमें है उसे त्याग देना है। इसके अलावा जो कुछ है, वह तपस्या नहीं है।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह मंसूर हल्लाज की घटना को अलग आयाम से देखते हैं। मंसूर हल्लाज तीसरी शताब्दी के विख्यात रहस्यवादी हैं, जिन्हें ख़लीफ़ा अब्बासी के आदेशानुसार फांसी दे दी गई थी। ख़्वाजा अब्दुल्लाह का मानना है कि ईश्वर के रहस्यों को छिपाना चाहिए और ज़बान बंद रखनी चाहिए। वे स्वयं को चुप्प रहने के कारण हल्लाज से वरिष्ठ मानते हैं, इसी आधार पर वे उनकी बातों की तुलना में अपनी बातों को सत्य मानते हैं। हल्लाज ने अनलहक़ कहा और फांसी चढ़ गए, अब्दुल्लाह ने सब हक़ कहा और ताजदार हो गया।

ख़य्यामी विचारों के नमूने भी मुनाजात नामा में देखे जा सकते हैं। समय को उचित समझना और उसका उचित प्रयोग ऐसे विषय हैं, यद्यपि मुनाजात नामों में अधिक महत्व नहीं है, लेकिन ख़्वाजा अब्दुल्लाह के मुनाजात नामे में उसे देखा जा सकता है, जो पाठक का ध्यान अपनी ओर खींचता है। हालांकि ख़य्याम का उनसे कुछ समय बाद अर्थात 518 हिजरी क़मरी में निधन हुआ था, इसके बावजूद इस किताब में इस तरह के विषयों के होने से पता चलता है कि ख़्वाजा अब्दुल्लाह के काल में ख़ुरासान में इन विचारों का कितना अधिक प्रभाव था। बीता हुआ समय वापस नहीं आता, कल पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता, इस समय को उचित समझो जो दोबारा नहीं लौटेगा, जो कोई इस समय का उपयोग करेगा वही इंसान है, जो कोई इसे नहीं पाएगा वह दुनिया में केवल एक चिन्ह है।



ख़्वाजा अब्दुल्लाह के मुनाजात नामे के अन्य विषयों में सामाजिक विषय हैं। मुनाजात नामे के सामाजिक महत्व ने उसे सातवीं शताब्दी हिजरी क़मरी के विख्यात कवि सआदी की गुलिस्तान की शैली से निकट कर दिया है।