शुक्रवार- 17 जुलाई
17 जुलाई सन 1968 ईसवी को इराक़ में अहमद हसन अलबक्र के नेतृत्व में विद्रोह करके बास पार्टी ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया।
- 17 जुलाई सन 1712 को इंग्लैंड, पुर्तगाल और फ्रांस ने युद्धविराम संधि पर हस्ताक्षर किए।
- 17 जुलाई सन 1850 को हार्वर्ड वेधशाला ने तारे का पहला चित्र लिया।
- 17 जुलाई सन 1924 को ऑस्ट्रेलिया में संघीय चुनाव में मतदान अनिवार्य हो गया।
- 17 जुलाई सन 1947 को भारतीय यात्री जहाज़ रामदास मुम्बइ के पास तूफ़ान में फंसकर डूब गया जिसमें 625 लोगों की मौत हो गई।
- 17 जुलाई सन 2014 को मलेशिया एयरलाइंस के विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से २८३ यात्री और चालक दल के १५ सदस्यों की मौत हो गई।
17 जुलाई सन 1968 ईसवी को इराक़ में अहमद हसन अलबक्र के नेतृत्व में विद्रोह करके बास पार्टी ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद राष्ट्रपति अब्दुर्रहमान आरिफ़ को अपदस्थ कर दिया गया बास पार्टी के सत्ता में पहुंचने के बाद पार्टी के दूसरे नंबर के नेता के रूप में सद्दाम, ने विरोधियों का दमन आरंभ किया सद्दाम ने बड़ी ही बर्बरता का प्रदर्शन करके देश में आतंक फैला दिया। वर्ष 1979 में सद्दाम ने दबाव डालकर हसन अलबक्र को अपदस्थ कर दिया और देश की बागडोर अपने हाथ में ले ली। इसके बाद सद्दाम ने पार्टी के भीतर भी अपने विरोधियों का सफ़ाया आरंभ कर दिया। सद्दाम ने तानाशाह के रूप में शासन किया और इस शासन काल में इराक़ ने दो पड़ोसी देशों इस्लामी गणतंत्र ईरान और कुवैत पर आक्रमण किए जिससे पूरे क्षेत्र के लिए संकट उत्पन्न हो गया जबकि इराक़ अत्यंत दयनीय स्थिति में पहुंच गया। इस प्रकार फ़ार्स की खाड़ी के क्षेत्र में विदेशी सेनाओं को घुसने का अवसर मिल गया। अंततः अमरीका और ब्रिटेन ने इराक़ पर आक्रमण करके अप्रैल सन 2003 में सद्दाम शासन का अंत कर दिया किंतु अब भी बास शासन के बहुत से तत्व अमरीका के साथ सांठगांठ करके इराक़ी जनता का जनसंहार कर रहे हैं।
17 जुलाई सन 1790 ईसवी को स्काटलैंड के दार्शनिक व अर्थ शास्त्री एडम स्मिथ का निधन हुआ। वे सन 1723 ईसवी में जन्मे थे आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने ग्लास्गों और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयो में उच्च शिक्षा ग्रहण की और फिर ग्लास्गों विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। वह वैसे तो दर्शनशास्त्र पढ़ाते थे किंतु साथ ही अर्थशास्त्र के भी अध्ययन में व्यस्त रहते थे। उन्हें नवीन अर्थ शास्त्र का जनक कहा जाता है। एडमस्मिथ आर्थिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत हित और व्यवसाय के सही विभाजन जैसे विचारों के पक्षधर थे।

17 जुलाई सन 1913 ईसवी को फ्रांस के विख्यात दार्शनिक व लेखक रोजर गैरोडी का मार्से नगर में जन्म हुआ। आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे विश्वविद्यालय पहुंचे जहां उन्होंने तीन विषयों दर्शनशास्त्र, साहित्य तथा संस्कृति व सभ्यता में डाक्ट्रेट किया। फ्रांस पर जर्मनी के अधिकार के दौरान उन्होंने हिटलर के फ़ासीवाद का विरोध किया जिसके चलते उन्हें वर्ष 1940 से 1943 तक जर्मनी की जेल में रहना पड़ा जो युद्ब बंदियों के लिए बनाई गई थी। 36 वर्षों तक वे फ्रान्स की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे जबकि 25 वर्ष वे पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी रहे। कम्युनिज़्म और लिबरलिज़्म से गैरोडी संतुष्ट नहीं हुए जिसके बाद उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। वर्ष 1979 में ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता का इस्लाम की ओर उनके झुकाव में बड़ा प्रभाव रहा। उन्होंने ज़ायोनिज़्म के बारे में अपने विचार बड़े साहस के साथ व्यक्त किए उन्होंने इस्राईल की कहानी और ज़ायोनी राजनीति के नाम से एक पुस्तक लिखी जिसके चलते उन पर मुक़द्दमा चलाया गया। उनकी दूसरी पुस्तक इस्राईल के नीति निर्धारक के मिथक नाम से प्रकाशित हुई जिस पर ज़ायोनी बिफर उठे और हिटलर के हाथों साठ लाख यहूदियों की हत्या के अतिशयोक्तिपूर्ण दावे की पोल खोल देने के नाते उन्हें न्यायालय के कटहरे मे पहुंचा दिया गया। इस दार्शनिक ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें बीसवीं शताब्दी की कथा, अमरीका पतन का अगुवा और इस्लाम के वचन आदि का नाम लिया जा सकता है।

17 जुलाई सन 1945 ईसवी को दूसे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन अमरीका और सोवियत संघ का पोट्सडैम शिखर सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन मे एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए जिसके अन्तर्गत दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की संयुक्त देशों की निरीक्षण परिषद और सम्मेलन में भाग लेने वाले तीनों देशों की सैनिक कमान और फ्रांस को कुछ अधिकार दिए गए। इन अधिकारों के आधार पर हर देश को जर्मनी के उस भाग का संचालन सौंपा गया जिसपर उसका अधिकार था किंतु सोवियत संघ और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाने के कारण इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका।

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27 तीर वर्ष 1367 हिजरी शमसी को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव क्रमांक 598 को पारित करने का निर्णय किया गया। यह प्रस्ताव ईरान पर इराक़ की बासी सरकार की ओर से थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध के समापन पर आधारित था। इराक़ी तानाशाह सद्दाम हुसैन को अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों की सामरिक सहायता के अतिरिक्त कुछ अरब देशों की आर्थिक सहायता भी प्राप्त थी जिसके बल बूते पर इराक़ ने ईरान के सीमावर्ती क्षेत्रों और बस्तियों पर रासायनिक शस्त्रों के आक्रमण में वृद्धि की जबकि अंतर्राष्ट्रीय संगठन सद्दाम के इन भयानक अपराधों पर मूक दर्शक बने रहे। इमाम ख़ुमैनी ने स्थिति का आकलन करके अनचाहे मन से, युद्ध विराम पर आधारित संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव क्रमांक 598 को स्वीकृति देने का निर्णय लिया। उन्होंने इस निर्णय को विष का प्याला पीने के समान बताया था।
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25 ज़ीक़ादा सन 10 हिजरी क़मरी को पैग़म्बरे इस्लाम अपने एक लाख साथियों को लेकर हज के लिए मदीने से निकले।
मक्का से मदीना पलायन करने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने तीन बार मक्का जाकर काबे की ज़ियारत का प्रयास किया किंतु उन्हे केवल दो बार (स) ही हज करने का अवसर मिला। उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा में लोगों को सही हज करने के नियमों से अवगत कराया। हज से लौटते समय रास्ते में ग़दीर नामक स्थान पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने सभी हाजियों को इकटठा करके अपने उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा की। यह नाम हज़रत अली अ का था यह पैग़म्बरे इस्लाम का अंतिम हज था। इसके बाद वे कुछ ही महीनों में इस संसार से विदा हो गये।