Dec ०४, २०१८ १४:०३ Asia/Kolkata

हमने मोहम्मद बिन सलमान यमन के ख़िलाफ़ थोपी गयी जंग से लेकर क़तर पर लगायी गयी पाबंदियों की समीक्षा की थी।

इस बात में नहीं कि तुर्की के इस्तांबूल शहर में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में वॉशिंग्टन पोस्ट के लिए लेख लिखने वाले सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की नृशंस हत्या से विश्व जनमत और ख़ास तौर पर पश्चिमी मीडिया और हस्तियों के सामने सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान का अस्ली चेहरा इस तरह सामने आ गया कि अब उन्हें अरब जगत में सद्दाम और क़ज़्ज़ाफ़ी के नाम से याद किया जा रहा है कि जिसे सऊदी अरब की राजशाह गद्दी पर नहीं पहुंचना चाहिए।

पिछले एक साल में मोहम्मद बिन सलमान की एक बड़ी कार्यवाही सैकड़ों सऊदी शहज़ादों, प्रभावीशाली हस्तियों और धार्मिक प्रचारकों की गिरफ़तारी थी। सऊदी अधिकारियों ने सितंबर 2017 में लगभग 20 लोगों को गिरफ़्तार किया जिनमें कुछ भाषणकर्ता और प्रभाव रखने वाले लोग थे। मोहम्मद बिन सलमान ने 4 नवंबर 2017 को आर्थिक भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरु की। रियाज़ का रिट्ज़ कार्लटन होटल एक महीने तक हुकूमत की सफ़ाई का केन्द्र और दसियों सऊदी शहज़ादों व उच्च पदस्थ अधिकारियों के लिए आरामदेह जेल बना हुआ था। वलीद बिन तलाल सहित कुछ संदिग्ध लोगों से पैसा वसूली करके छोड़ दिया। वास्तव में मोहम्मद बिन सलमान ने वित्तीय भ्रष्टाचार को शहज़ादों को गिरफ़्तार करने का बहाना बनाया था और उनके इस नारे को आम लोगों ने पसंद किया लेकिन अस्ल कारण शहज़ादों की राजनैतिक शक्ति को ख़त्म करना, उनकी वित्तीय ताक़त को कम करना और सऊदी अरब में शक्ति का ध्रुवीकरण करना था। फ़्रांसीसी अख़बार सूद ओएस्ट ने जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के बाद एक रिपोर्ट में सऊदी युवराज की पिछले एक साल की कार्यवाहियों की ओर इशारा करते हुए लिखाः "जून 2017 में सऊदी अरब में मोहम्मद बिन सलमान के युवराज के रूप में पहचनवाए जाने के समय से यह देश उनकी कार्यवाहियों की वजह से बहुत से विवादों का केन्द्र बिन्दु बन गया है। मोहम्मद बिन सलमान ने देश के आधुनिकीकरण, राजनैतिक सुधार और अपने लिए विशिष्टता हासिल करने के लिए विरोधियों, ख़ास तौर पर धार्मिक लोगों, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार के समर्थकों का दमन तेज़ कर दिया है।" सऊदी अरब के मामलों के माहिर स्टीफ़न लाकरवा मोहम्मद बिन सलमान के सांकेतिक सामाजिक सुधार और व्यापक स्तर पर गिरफ़्तारियों को तानाशाही के आधुनिकीकरण का नाम दिया है।  

    

लेबनान के प्रधान मंत्री सअद हरीरी ने 4 नवंबर 2017 को अचानक रियाज़ से अपने इस्तीफ़े का एलान किया। उन्होंने अपने देश के हिज़्बुल्लाह आंदोलन पर इल्ज़ाम लगाया कि देश का नियंत्रण उसने अपने हाथ में ले लिया है। सअद हरीरी के रियाज़ आवास के दौरान सभी समीक्षाओं में यह कहा गया कि उन्हें मोहम्मद बिन सलमान ने बंधक बना रखा है। अंततः फ़्रांस के हस्तक्षेप से इस संकट से निकलने का रास्ता बना और सअद हरीरी ने लेबनान पहुंच कर हिज़्बुल्लाह तथा अपने इस्तीफ़े के बारे में अपने दावों को सांकेतित रूप से वापस लिया और मई महीने के संसदीय चुनाव के बाद एक बार फिर उन्हें नए मंत्रीमंडल के गठन की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। सअद हरीरी को बंधक बनाने का मोहम्मद बिन सलमान का क़दम ऐसा था जिसकी मिसाल बहुत कम मिलती है और यह लेबनान की संप्रभुता का उल्लंघन था जिस पर लेबनानी राष्ट्रपति मीशल औन और हिज़्बुल्लाह के महासचिव सय्यद हसन नसरुल्लाह ने कड़ी आपत्ति दर्शायी। सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने अपने इस अकूटनैतिक क़दम से यह दर्शा दिया कि वे सत्ता तक पहुंचने की योग्यता नहीं रखते बल्कि वह पश्चिम एशिया क्षेत्र को अशांत बनाने व अस्थिर करने की क्षमता रखते हैं जबकि इस क्षेत्र में सबसे ज़्यादा स्थिरता की ज़रूरत है।           

अमरीका में रह रहे सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की इस्तांबूल में इस देश के वाणिज्य दूतावास में नृशंस हत्या सरकारी आतंकवाद की स्पष्ट मिसाल है। सऊदी सरकार शुरु में ख़ाशुक़जी की हत्या में लिप्त होने का इंकार करती रही लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबाव में उसे 18 दिन बाद इस अपराध में लिप्त होने की बात स्वीकार करनी पड़ी। इसके साथ ही सऊदी सरकार ने इस अपराध को इस देश के गुप्तचर विभाग के उप प्रमुख अहमद अलअसीरी और शाही दरबार के सलाहकार सऊद अलक़हतानी जैसे निचले स्तर के अधिकारियों पर थोपा और किसी न किसी तरह मोहम्मद बिन सलमान के इस अपराध में शामिल न होने को छिपाया। यह ऐसा विषय जिसे अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के अलावा किसी और ने नहीं माना है।                   

 

जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने साफ़ तौर पर कहा है कि वह ख़ाशुक़जी की मौत के बारे में सऊदी अरब के स्पष्टीकरण को नहीं मानेंगी। वेबसाइट अरबी-21 की रिपोर्ट के अनुसार, सोशल साइटों के यूज़र्स का कहना है कि सऊदी हुकूमत के बयान में ख़ाशुक़जी की हत्या में इस देश के 18 नागरिकों को आरोपित करने से यह सच्चाई नहीं बदल सकती कि इस अपराध में मोहम्मद बिन सलमान सबसे बड़े मुल्ज़िम हैं। इंटरनेट पर सक्रिय कार्यकर्ताओं का कहना है कि सऊदी युवराज ने अपने कुछ आदमियों को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया है ताकि ख़ुद को ख़ाशुक़जी की हत्या के इल्ज़ाम से बचा सके। सऊदी दरबार में सलाहकार सऊद अल क़हतानी ने अगस्त महीने के मध्य में अपने ट्वीटर हैंडल पर किसी आलोचक के जवाब में कहा थाः "क्या तुम्हें लगता है कि मैं बिना इजाज़त के सिर भी हिला सकता हूं? मैं अधीन हूं और अपने मालिक युवराज के आदेश को लागू करने वाला एक भरोसेमंद हूं।"

जमाल ख़ाशुक़जी के ख़िलाफ़ अपराध इतना घिनौना है कि कोई भी उसकी निंदा करने से नहीं हिचकिचाएगा लेकिन इस बात में शक नहीं कि इस अपराध की क्रूरता यमन के ख़िलाफ़ जंग, मिना घटना, ग़ज़न्फ़र रुकनाबादी के ख़िलाफ़ अपराध, शैख़ निम्र को मृत्युदंड, शहज़ादों, प्रचारकों और कार्यकर्ताओं गिरफ़्तारी, सअद हरीरी को बंधक बनाए जाने की घटना के साथ सबसे ज़्यादा क्रूर है। यह अपराध इतना क्रूर है कि मोहम्मद बिन सलमान को ऐसा अपराधी कहा जा सकता है जिसकी नागरिकता छीन कर उसके ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्री अपरोध न्यायालय में मुक़द्दमा चलना चाहिए।

इस बात पर बहस न करते हुए कि मोहम्मद बिन सलमान सऊदी युवराज की कुर्सी पर बने रहेंगे या नहीं, पिछले 45 महीनों के दौरान उनके क्रियाकलाप जिनमें जमाल ख़ाशुक़जी की नृशंस हत्या शामिल है, यह दर्शाते हैं कि सऊदी सरकार मानवाधिकार जैसे विषय से अनभिज्ञ है यहां तक कि बिन सलमान के दिखावटी सुधार भी सऊदी अरब की काली करतूतों की क्रूरता को कम नहीं कर सकते जैसा कि जमाल ख़ाशुक़जी का मानना था कि मोहम्मद बिन सलमान एक क़बायली नेता हैं जो अपनी चमक खो चुके हैं।          

इस सच्चाई से कौन इंकार कर सकता है कि आले सऊद और आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। कभी वहाबी मत में परवरिश पाने वालों के हाथों आतंकवादी घटनाएं अंजाम पाती हैं जैसे 11 सितंबर 2001 की घटना और कभी सऊदी शहज़ादे ख़ुद हत्या का आदेश देते हैं। अलक़ुद्स अलअरबी अख़बार ने तौफ़ीक़ रियाह ने एक लेख में जिसका शीर्षक था, "न्यूयॉर्क की लड़ाई से इस्तांबूल की लड़ाई तक, सऊदी अरब पिंजड़े में" लिखा है कि सऊदी अरब 11 सितंबर 2001 के विनाशकारी आतंकवादी हमले के कुप्रभाव से पूरी तरह रिहाई पाने से पहले एक बार फिर नकारात्मक फ़्रेम में कि जिसका 2001 की घटना से ज़्यादा अंतर नहीं है, अंतर्राष्ट्रीय चर्चाओं में मुख्य रूप से बहस का बिन्दु बन गया है। 2001 की आतंकवादी घटना के बारे में पूरी दुनिया में लोगों का मानना था कि इसे लोगों ने अंजाम दिया है जबकि मौजूदा घटना सरकारी आतंकवाद की है जिसकी पूरी दुनिया निंदा कर रही है हालांकि इस घटना के सरकारी आतंकवाद होने का आधिकारिक रूप से एलान नहीं हुआ है। न्यूयॉर्क में 2001 में 11 सितंबर की घटना सऊदी अरब के लिए बहुत बड़ी घटना थी जिसकी वजह से पूरी दुनिया में उसकी थू थू हुयी और लगता है कि 2 अक्तूबर 2018 को तुर्की की घटना में भी एक बार फिर सऊदियों का लिप्त होना सामने आया। 11 सितंबर की घटना में सऊदी अरब के 19 जवानों ने एक अभूतपूर्व क़दम उठाते हुए अमरीका की ज़मीन का निशाना बनाया लेकिन उन्होंने उस घटना के ज़रिए सऊदी अरब का ही नुक़सान किया जिसकी वजह से सऊदी अरब इस घटना के 17 साल बाद भी उसके भौतिक व आत्मिक नुक़सान की भरपाई कर रहा है और करता रहेगा। 2 अक्तूबर 2018 को तुर्की की घटना में 15 सऊदियों ने देश के एक विरोधी की हत्या की कि जिसके पास क़लम के सिवा कोई हथियार न था। लेकिन जिन्होंने यह कृत्य किया उन्होंने वास्तव में सऊदी अरब को भारी नुक़सान पहुंचाया कि जिसके दुष्परिणाम को दुनिया लंबे समय तक देखती रहेगी। इस्तांबूल में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में हत्या करने वालों का लक्ष्य सऊदी अरब के शासक की प्रसन्नता हासिल करना थी। कुछ दशक बाद इतिहास यह बात याद दिलाएगी कि ख़ाशुक़जी के लापता होने की घटना का सबसे ज़्यादा असर ख़ुद सऊदी अरब पर हुआ है।

जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या एक राजनैतिक अपराध है जिसका अंजाम भी आपराधिक क़ानून के दायरे में तय होना चाहिए लेकिन इस बात की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि ख़ाशुक़जी का मामला भी अरब जगत सहित दुनिया में इस तरह के कुछ दूसरे नमूनों की तरह अस्पष्ट रहेगा। जैसे लेबनान के धर्मगुरु इमाम मूसा सद्र और मोरक्को के सरकार विरोधी वामपंथी कार्यकर्ता महदी बिन बरका के लापता होने की घटनाएं।

सऊदी अरब विदेश संबंध परिषद के प्रमुख रिचर्ड हास का कहना हैः "सऊदियों को फ़्रीहैंड देने का सिलसिला बंद होना चाहिए क्योंकि मोहम्मद बिन सलमान ने यह दर्शा दिया है कि वह समर्थन पाने की योग्यता नहीं रखते।"

यहां पर एक अहम सवाल यह उठता है कि क्यों विश्व मीडिया और पश्चिमी अधिकारी सिर्फ़ सऊदी पत्रकार की हत्या पर ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं? क्या पश्चिमी अधिकारी और मीडिया यमन की त्रासदीपूर्ण स्थिति को नहीं देख रहे हैं कि जिसे संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने ख़ुद हालिया दो दशको की सबसे बड़ी मानव त्रासदी कहा है। क्या यमन के बेगुनाह बच्चों के खिलाफ़ अपराध जो 2015 में बिन सलमान के सऊदी रक्षा मंत्री बनने के समय से अब तक  जारी है, ख़ाशुक़जी के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध से अधिक घिनौना नहीं है?

बिना किसी शक के दुनिया के आज़ाद मीडिया और पश्चिमी अधिकारियों को चाहिए कि मोहम्मद बिन सलमान के अपराध से निपटने के लिए, यमन के ख़िलाफ़ जंग को रुकवाने से शुरु करें   और फिर अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय सऊदी युवराज की गिरफ़्तारी का वारेंट जारी करे ताकि अगर सऊदी हुकूमत उन्हें इस न्यायालय के हवाले करने से पीछे हटे तो कम से कम वह दूसरे देशों का सफ़र न कर सकें।