9 दय पर विशेष कार्यक्रम
ईरान में 30 दिसंबर को दूरदर्शिता दिवस मनाया जाता है इस अवसर पर हम एक विशेष कार्यक्रम लेकर आप की सेवा में उपस्थित हैं।
इस कार्यक्रम में हम संक्षेप में ईरान की सातवीं और आठवीं सरकारी के कार्यकाल में इस्लामी गणतंत्र ईरान की विदेश नीतियों पर चर्चा कर रहे हैं। ईरान में इन दोनों सरकारों को सुधारवादी सरकारों के नाम से जाना जाता है। इन दोनों सरकारों ने तनाव दूर करने, शांति स्थापना और सभ्यताओं के मध्य संवाद को विदेश नीतियों के तीन सिद्धान्त के रूप में अपनाया। इन सरकारों ने विश्वास की बहाली , सहमति व परस्पर सम्मान, मतभेदों के बजाए समानताओं पर ध्यान जैसी आधारों पर ईरान की इन दो सरकारों ने अपनी विदेश नीतियों को आगे बढ़ाया।
सुधारवादी सरकार का एक अन्य नारा शांति प्रेम था और सरकार देश के भीतर प्रजातंत्र और देश से बाहर शांति प्रेम का नारा लगाया और यही वजह है कि सातवीं और आठवीं सरकार के नेता के बयानों में शांति शब्द को सब से अधिक प्रयोग किया गया। इन दोनों सरकारों ने हिंसा से दूरी , शांति प्रेम, मित्रता और सांस्कृतिक मेल मिलाप को आधार बनाया और दूसरे देशों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और सभ्यताओं के मध्य संवाद का विचार पेश किया । संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी सन 2001 को सभ्यताओं के मध्य संवाद के साल का नाम दिया लेकिन उसी वर्ष नाइन इलेवन की घटना हो गयी जिसकी वजह से सभ्यताओं के मध्य टकराव के सैमूएल हांटिंग्टन की विचारधारा पर पुनः ध्यान केन्द्रित हो गया।
कुल मिला कर ईरान की सातवीं और आठवीं सरकारों का मुख्य लक्ष्य यह था कि वह ईरान को अलग थलग करने के प्रयासों को विफल बनाएं। इस संदर्भ में राजनीतिक मामलों के विश्लेषक सैयद जलाल देहक़ानी फिरोज़ाबादी कहते हैं। इस काल में ईरान ने यह कोशिश की कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश की गयी अपनी गलत छवि को सुधार और ईरान का सही रूप दुनिया वालों के सामने पेश करे इस आधार पर ईरान की विदेश नीतियों का आधार , राजनीतिक व सांस्कृतिक विकास, तनाव दूर करने, विश्वास बहाली और शांति प्रेम को बनाया गया। पड़ोसी देशों से संबंधों को भी वरीयता दी गयी और यह प्रक्रिया सातवीं और आठवीं सरकारों में जारी रही जिसकी चरम सीमा दिसंबर सन 1997 में तेहरान में इस्लामी राष्ट्रध्यक्षों का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें इस्लामी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने बढ़- चढ़ कर हिस्सा लिया।
इस शिखर सम्मेलन के उदघाटन समारोह में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने बल देकर घोषणा की कि इस्लामी गणतंत्र ईरान की ओर से किसी भी इस्लामी देश को कोई खतरा नहीं है। उनके इस एलान का इस्लामी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने स्वागत किया। सऊदी अरब के तत्कालीन क्राउन प्रिंस अब्दुल्लाह ने तेहरान सम्मेलन में भाग लिया और इसे इतिहासिक भेंट की संज्ञा दी। सम्मेलन के संपन्न होने के बाद सऊदी अरब के तत्कालीन विदेशमंत्री सऊद अलफैसल ने भी कहा कि बड़े पैमाने पर इस्लामी देशों की इस सम्मेलन में उपस्थिति, ईरानी राष्ट्र, उसकी भूमिका और इस देश में आशा का चिन्ह है।
सम्मेलन के घोषणापत्र में भी अमरीका की मनमानी पर आधारित नीतियों की आलोचना की गयी थी और डेमेटो कानून को खत्म करने की मांग रखी गयी थी। इस सम्मेलन के केवल तीन महीने बाद, हाशमी रफसंजानी ने सऊदी अरब की यात्रा की और सऊदी नरेश किंग फहद और क्राउन प्रिंस अब्दुल्लाह से भेंट वार्ता की । उन्होंने विश्वास बहाली के लिए बहरैन की भी अप्रत्याशित यात्रा की। इस तरह से दोनों देशों ने फैसला किया कि बीस वर्षों के बाद अपने कूटनैतिक संबंधों को राजदूत के स्तर तक विकसित करें। ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भी मई 1999 में सऊदी अरब और क़तर की यात्रा की। पड़ोसी देशों से ईरान के संबंधों में बेहतरी की यह प्रक्रिया सुधारवादी सरकार के दूसरे सत्ताकाल में भी जारी रही। बहरैन के नरेश शेख हमद बिन आले ईसा, अगस्त 2002 को तेहरान की यात्रा की और ईरान के राष्ट्रपति तथा वरिष्ठ नेता से भेंट की जिसके बाद ईरानी राष्ट्रपति ने भी मनामा की यात्रा की।
इस दौरान युरोपीय देशों के साथ भी इस्लामी गणतंत्र ईरान के संबंध बदले और आलोचनात्मक वार्ता , सार्थक वार्ता में बदल गयी। युरोपीय नेताओं ने तेहरान की निरंतर यात्रा की और ईरानी अधिकरियों ने युरोप की यात्रा की जिसके बाद ईरान व युरोप के मध्य संबंधों को बेहतर बनाने के लिए दस चरणों में द्वीपक्षीय वार्ता हुई। इटली के विदेशमंत्री लैंबर्तो डेनी, ने मार्च 1997 में ईरान की यात्रा की जो तनाव के बाद ईरान की यात्रा करने वाले पहले अधिकारी थे। उसके बाद कई युरोपीय देशों के विदेशमंत्रियों ने ईरान की यात्रा की। ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति ने ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद पहले ईरानी राष्ट्रपति के रूप में मार्च 1999 युरोप की यात्रा की। उन्होंने इटली की अपनी इस यात्रा के दौरान इस देश के प्रधानमंत्री से भेंट के अलावा पोप जाॅन पाॅल द्वीतीय से भी भेंट की। उन्होंने इसी प्रकार फ्रासं, जर्मनी, आस्ट्रिया और स्पेन की भी यात्रा की।
इसी मध्य अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने ईरान के नाम को सीरिया और उत्तरी कोरिया के साथ " दुष्टता की धुरी" में शामिल किया तो युरोपीय देशों ने इसका कड़ाये विरोध किया और ईरान व युरोप के मध्य सार्थक वार्ता का सिलसिला जारी रहा किंतु सन 2002 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा उछाला गया जिसके बाद सार्थक वार्ता की जगह , सशर्त वार्ता आ गयी और ईरान व युरोप के मध्य संबंध विस्तार की प्रक्रिया धीमी पड़ गयी।
अगस्त सन 2003 में पहली बार फ्रासं, जर्मनी और ब्रिटेन ने एक संयुक्त पत्र लिख कर ईरान से मांग की कि वह पूरक प्रोटोकोल को पारित करे और यूरेनियम के संवर्धन का काम रोक दे। अक्तूबर 2003 में ईरान और युरोप के मध्य परमाणु मुद्दे पर पहली बैठक तेहरान में स्थित सअदाबाद काम्पलेक्स में हुई और तीनों युरोपीय देशों का आग्रह था कि ईरान एक तरफा तौर पर और युरोप से बिना कोई मांग किये, यूरेनियम के संवर्धन का काम रोक दे। तीन युरोपीय देशों और ईरान के प्रतिनिधियों ने मार्च 2004 में ब्रसल्ज़ और अक्तूबर सन 2004 में पेरिस में भेंटवार्ता की जिसके परिणाम में ईरान ने युरेनियम का संवर्धन रोक दिया लेकिन ईरान के खिलाफ युरोप की धमकियों का सिलसिला रुका नहीं यहां तक कि युरोप ने धमकी दी कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के मामले को सुरक्षा परिषद में भेज दिया जाएगा। ईरान ने यूरेनियम का संवर्धन रोक दिया था किंतु उसके बदले में युरोप ने जो वादे किये थे उसका उसने पालन नहीं किया और अन्ततः ईरान ने नवीं सरकार में शांति पूर्ण परमाणु गतिविधियां फिर से शुरु कर दीं और ईरान के परमाणु मामले को सुरक्षा परिषद में पेश कर दिया गया।
सातवीं और आठवीं सरकार में एक महत्वपूर्ण विषय अमरीकी सरकार से संबंध की शैली भी था। तनाव रहित वातावरण के लिए प्रयास करने वाली सुधारवादी सरकार को यह आशा थी कि अमरीका के साथ भी तनाव कम होगा इसी लिए ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद पहली बार ईरान के राष्ट्रपति ने 7 जनवरी सन 1998 में सीएनएन टीवी चैनल द्वारा अमरीकी जनता से बात की जिसके बाद अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने जनवरी 1998 में ही रमज़ान के बाद ईद के अवसर पर ईरानी राष्ट्र को बधाई दी और कहा कि अमरीकी सरकार दोनों राष्ट्रों के मध्य दूरी से दुखी है।
अमरीका की तत्कालीन विदेशमंत्री मेडलिन अलब्राइट ने खुल कर स्वीकार किया कि सन 1953 में अमरीका ने ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गये प्रधानमंत्री अर्थात डाक्टर मुसद्दिक की सरकार गिराने में स्पष्ट रूप से भूमिका निभाई थी। इन सब बातों के बावजूद ईरान के खिलाफ अमरीका की शत्रुतापूर्ण नीतियां और ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध जारी रहे और इस तरह से यह स्पष्ट हो गया कि ईरान के बारे में अमरीका की कथनी और करनी में काफी अंतर है।
ईरान के बारे में अमरीका की नीतियां हमेशा दोहरी रही हैं एक तरफ से वह ईरान से दोस्ती और संधि की बात करता है लेकिन दूसरे ओर वह ईरान का नाम आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों की सूचि में डालता है यही वजह थी कि ईरान के तत्कालीन विदेशमंत्री कमाल खर्राज़ी ने कहा कि हमारे सारे अधिकारी , अमरीकी अधिकारियों और व्यवहार की सत्यता को शंका की दृष्टि से देखते हैं। यदि हम अविश्वास की इस ऊंची दीवार को गिराना चाहते हैं तो अमरीका को एसा व्यवहार अपनाना चाहिए जिससे हमारे अंदर विश्वास पैदा हो और सब से पहले उसे अपनी सच्चाई साबित करना चाहिए।
क्लिंटन की सरकार खत्म होने और बुश सरकार के सत्ता में आने के बाद जो कुछ लोगों को अमरीका ईरान संबंधों में तनाव कम होने की उम्मीद थी वह भी खत्म हो गयी और जार्ज बुश ने सब से पहले तो ईरान, सीरिया और उत्तरी कोरिया को दुष्टता की धुरी का नाम दे कर यह स्पष्ट कर दिया कि अमरीकी नीतियों के कारण विश्व स्तर पर तनाव कम करना संभव नहीं है। अमरीका के इस क़दम की युरोप ने भी आलोचना की थी लेकिन अमरीका को किसी प्रकार की आलोचना की चिंता नहीं थी।
इन हालात में इस्लामी गणतंत्र ईरान का राष्ट्र सदैव की भांति संघर्ष और प्रतिरोध की राह पर आगे बढ़ता रहा और एकता व एकजुटता द्वारा देश व व्यवस्था के खिलाफ की जाने वाली हर साज़िश का मुक़ाबला किया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली खामेनई ने अपने बयानों में बारम्बार अमरीकी साज़िशों का उल्लेख किया है। वास्तव में उनके बयानों में अमरीकी साज़िशों का पूरी तरह से वर्णन किया गया है। निश्चित रूप से जैसा कि वरिष्ठ नेता ने भी बार बार बल दिया है, ईरान में सांप्रदायिक, भाषाई, जातीय व धार्मिक फूट डालने के लिए अमरीका की ओर से भांति भांति की साज़िशें और भारी बजट सब कुछ नाकाम हो चुका है औैर निश्चित रूप से ईरान का विकास अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति के काल में भी जारी रहेगा और जैसा कि वरिष्ठ नेता ने कहा है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान को किनारे लगाने या कमज़ोर करने का सपना इन सब के दिल में ही रह जाएगा। ईरानी राष्ट्र ने तीस दिसंबर सन 1999 को विदेशी साजिश का जिस प्रकार से जवाब दिया उससे एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि जनता की ही ईरान की इस्लामी क्रांति की सब से बड़ी शक्ति है। (Q.A.)