Jan ०६, २०१९ १७:४० Asia/Kolkata

नई नई स्थापित हुई इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के ख़िलाफ़ सद्दाम की सेना के व्यापक हमले के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र के आठ वर्षीय पवित्र प्रतिरोध को लगभग तीन दशक बीत जाने के बाद भी इस हमले और ईरानी जवानों के प्रतिरोध के बारे में बहुत सी अनकही बातें बाक़ी हैं।

हम शौर्य गाथा शीर्षक के अंतर्गत एक कार्यक्रम श्रृंखला के माध्यम से इस्लामी गणतंत्र ईरान पर इराक़ की सद्दाम सरकार की ओर से थोपे गए युद्ध के विभिन्न आयामों की चर्चा करेंगे। आशा है हमारा यह कार्यक्रम भी आपको पसंद आएगा।

22 सितम्बर सन 1980 को इराक़ की बासी सरकार की सेना ने जल, थल और वायु मार्ग से ईरान पर व्यापक हमले शुरू कर दिए। सद्दाम ने इस अतिक्रमण से कुछ दिन पहले ही बग़दाद में टीवी कैमरे के सामने वर्ष 1975 के सीमा संबंधी अलजीरिया समझौते को फाड़ दिया था। सद्दाम की सेना ने पहले हले में तेहरान, अहवाज़, तबरेज़, हमदान, बूशहर और आबादान के हवाई अड्डों पर बमबारी की। ख़ुर्रमशहर और आबादान के लोग तोप और टैंक के गोलों के धमाकों की आवाज़ से नींद से जागे। इस प्रकार नई नई स्थापित हुई इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था पर आठ वर्षीय युद्ध थोप दिया गया।

ईरान की पश्चिमी व दक्षिणी सीमाओं पर इराक़ के हमलों में वृद्धि के बाद ईरानी जनता के विभिन्न वर्गों के लोगों ने रणक्षेत्र के मोर्चों पर जाने के लिए अपनी तैयारी की घोषणा की। इस्लामी गणतंत्र के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने एक संदेश में इराक़ के हमले की निंदा करते हुए सद्दाम शासन का अतिक्रमण जारी रहने के बारे में चेतावनी दी। उन्होंने अपने संदेश में कहा था। सद्दाम शासन यह न सोचे कि ईरानी राष्ट्र, सरकार और सेना इस अतिक्रमण का जवाब देने में अक्षम है। जब भी आवश्यक होगा मैं ईरानी राष्ट्र को संदेश दूंगा और सद्दाम और उस जैसे लोगों के समक्ष सिद्ध कर दूंगा कि अमरीका के पिछलग्गू उल्लेखनीय ही नहीं हैं और हमारा हमेशा यह संकल्प है कि इस प्रकार के मामलों में उनका जवाब अवश्य दिया जाए लेकिन इराक़ी राष्ट्र को कोई नुक़सान न पहुंचे।

 

ईरान पर इराक़ का अतिक्रमण ऐसी स्थिति में शुरू हुआ कि जब इस्लामी क्रांति को सफल हुए केवल 19 महीने बीते थे। उस समय इस्लामी गणतंत्र, व्यवस्था को मज़बूत बनाने और आंतरिक व बाहरी षड्यंत्रों व ख़तरों से मुक़ाबले में व्यस्त था। ईरान की सेना भी राजशाही व्यवस्था के पतन के बाद पुनर्निर्माण की स्थिति में थी। इस्लामी क्रांति संरक्षक बल या आईआरजीसी भी अपने गठन के आरंभिक चरणों में था। ईरान पर इराक़ की बासी सेना के सैन्य अतिक्रमण के एक साल बाद ईरान की सेना और आईआरजीसी ने जनता के व्यापक समर्थन से अपनी स्थिति पुनः हासिल कर ली और कई औचक व सफल अभियानों के माध्यम से इराक़ी शासन को रक्षात्मक स्थिति में पहुंचा दिया। ईरानी बलों ने कई अतिग्रहित क्षेत्रों से अतिक्रमणकारियों को अंतर्राष्ट्रीय सीमा तक पीछे धकेल दिया।

थोपा गया युद्ध, जिसे ईरान की नई इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का तख़्ता पलटने के लिए शुरू किया गया था, ईरानी जनता की एकता व एकजुटता व उसके मज़बूत बिंदु में बदल गया। इस्लामी गणतंत्र ईरान के ख़िलाफ़ इराक़ की सद्दाम सरकार की ओर से थोपा गया आठ वर्षीय युद्ध, इस्लामी क्रांति के इतिहास के अमर चरणों में से एक है। लोगों विशेष कर युवाओं ने प्रतिरोध के आठ वर्षों में सद्दाम की सेना के मुक़ाबले में न्यूनतम साधनों व सैन्य उपकरणों के साथ अपने देश व क्रांति की रक्षा के संबंध में सबसे साहसिक, उदाहरणीय व अमर नमूने संसार के समक्ष पेश किए। ईरानी जनता के ये साहसिक नमूने पूरे संसार में स्वतंत्रताप्रेमी आंदोलनों के लिए आदर्श बन गए। लेबनान व फ़िलिस्तीन में इस्लामी प्रतिरोध का वास्तविक सात ईरान के मुस्लिम युवाओं का बलिदान व शहादत ही है।

ईरान के दसियों हज़ार युवाओं ने इस्लामी क्रांति के उच्च लक्ष्यों की रक्षा की राह में साहस व बलिदान का बेजोड़ उदारण पेश करते हुए अपने प्राणों की आहूति दी। उनके इसी साहस और त्याग व बलिदान के कारण ईरान की भूमि का एक इंच भाग भी दुश्मन के हाथ में बाक़ी न रहा। युद्ध और उसके कुपरिणाम हर देश के लिए विध्वंसक होते हैं लेकिन जब किसी देश पर दुश्मन हमला करता है और एक राष्ट्र विशेष कर उसके जवान अपने पूरे अस्तित्व के साथ अपने देश व व्यवस्था की रक्षा के लिए उठ खड़े होते हैं तो फिर वह युद्ध उस राष्ट्र और देश के लिए ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण हो जाता है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई इस बारे में कहते हैं कि यह युद्ध, एक प्रतिरक्षात्मक युद्ध था और आक्रामक युद्ध व प्रतिरक्षात्मक युद्ध में अंतर होता है। प्रतिरक्षात्मक युद्ध में लोगों की उमंगों व लक्ष्यों की रक्षा के संबंध में उनका गौरव, वफ़ादारी और आदर उभर कर सामने आते हैं।

पूरब व पश्चिम के दोनों ब्लॉकों के समर्थन प्राप्त दुश्मन के पाश्विक अतिक्रमण के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की आठ वर्षीय पवित्र प्रतिरक्षा, ईरानी जनता के लिए कभी न समाप्त होने वाले गौरव में बदल गई। यह प्रतिरोध इस बात का कारण बना कि इस्लामी गणतंत्र ईरान को झुकाने की पूरब व पश्चिम की बड़ी शक्तियों की साझा साज़िशें, ईरानी जनता की क्षमताओं के सामने आने के लिए अवसरों में बदल गईं। ईरानी युवाओं के साहस ने दिखा दिया कि अगर एक सरकारी व्यवस्था को जनता का समर्थन हासिल हो तो वह इस्लामी सत्ता और अपने बलों की एकता की छाया में हर दुश्मन को पराजित कर सकती है।

ईरानी जनता, जिसे एक ज्ञानी व सक्षम नेता प्राप्त था, धार्मिक व राष्ट्रीय भावनाओं के साथ अतिक्रमणकारी शत्रु के मुक़ाबले में उठ खड़ी हुई और उसने राष्ट्रीय एकजुटता का अद्भुत नमूना पेश किया। यही भावनाएं, धर्म, आस्था व राष्ट्र के युद्धों के मोर्चों पर ईरानी जनता की व्यापक उपस्थिति का कारण थीं। आठ वर्षीय प्रतिरक्षा को, ईरान की ओर से एक उदाहरणीय युद्ध के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि शत्रु की ओर से प्रतिबंधित हथियारों के इस्तेमाल और शहरों पर बमों व मीज़ाइलों की बारिश जैसी कायरतापूर्ण कार्यवाहियों के बावजूद ईरानी बलों ने मानवीय व इस्लामी मान्यताओं का पूरी तरह से पालन किया।

सभी देशों में राष्ट्रों की ओर से अपनी धरती की रक्षा, ज़िम्मेदार कलाकारों की प्रेरणा का स्रोत होती है। ईरान में साहित्य, सिनेमा, पेंटिंग और संगीत समेत कला के विभिन्न क्षेत्रों पर एक संक्षिप्त सी दृष्टि डालने से यह समझा जा सकता है कि सबसे अच्छी कला कृतियां, पवित्र प्रतिरक्षा के काल से संबंधित हैं। इस आधार पर सद्दाम शासन के मुक़ाबले में ईरानी जनता की आठ वर्षीय प्रतिरक्षा भी लोगों की एकता व एकजुटता और इसी तरह कला के विभिन्न क्षेत्रों के लिए एक परिपूर्ण व कभी न समाप्त होने वाला स्रोत है। यह आठ वर्षीय प्रतिरक्षा केवल ईरानी जनता के लिए प्रेरणा का स्रोत नहीं थी बल्कि ईरानी युवाओं के साहस व बलिदान का दायरा ईरान की सीमाओं से बाहर निकल कर अनेक शोषित व पीड़ित राष्ट्रों के लिए प्रेरणा बन गया।

आठ साल तक एक ऐसे दुश्मन से युद्ध ने, जिसे संसार के 58 देशों का समर्थन हासिल था, कुछ ख़ास परिस्थितियां पैदा कर दी थीं जिनका अनुभव कम ही राष्ट्रों को हुआ होगा। इन विशेष परिस्थितियों के कारण इस असमान युद्ध में ईरानी युवाओं का अद्भुत साहस, शौर्यगाथा में बदल गया और ईरानी जनता के मन में अमिट छाप छोड़ गया। आठ वर्षीय पवित्र प्रतिरक्षा काल की परिस्थितियां ईरानियों और इसी तरह ईरान व इस्लाम को पसंद करने वालों तथा संसार के स्वतंत्र सोच रखने वालों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत सिद्ध हो सकती हैं क्योंकि इस आठ वर्षीय युद्ध ने क्षेत्र व अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में ईरान के स्थान को मज़बूत बना दिया।

आठ वर्षीय प्रतिरक्षा की क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों को समझना भी कोई मुश्किल काम नहीं है। पवित्र प्रतिरक्षा के क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय आयाम, हालिया सभी युद्धों विशेष दूसरे विश्व युद्ध के बाद होने वाले युद्धों से अधिक व्यापक हैं। पिछले चार सौ साल में ईरान व उसमानी शासन के बीच ईरान की भौगोलिक सीमा में कई युद्ध हुए। उस समय, इराक़ उसमानी शासन का एक भाग था। उसमानी शासन द्वारा शुरू किए गए युद्धों को किसी भी स्थिति में इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के समान नहीं समझा जा सकता क्योंकि इस युद्ध में इराक़ को सभी बड़ी क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों का समर्थन हासिल था।

बहुत से रणनीतिकारों का कहना है कि सद्दाम शासन के अतिक्रमण के ख़िलाफ़ ईरानी जनता का आठ वर्षीय प्रतिरोध, नई क्लासिकल सेनाओं के साथ पहली लड़ाई थी जिसमें ईरानियों ने अपनी राष्ट्रीय एकता व एकजुटता की रक्षा करते हुए, बिना बाहरी शक्तियों का सहारा लिए हुए और बड़ी एवं वर्चस्ववादी शक्तियों की इच्छा के विपरीत, परिस्थितियों को बदल दिया। अब सवाल यह है कि सद्दाम की सरकार ने क्यों और किस प्रकार ईरान पर अतिक्रमण शुरू किया? ईरान व इराक़ के बीच सीमावर्ती मतभेद पहले से जारी थे और यह सद्दाम के हमले का कारण नहीं था बल्कि यह तो केवल एक बहाना था। वास्तव में जो चीज़ ईरान पर सद्दाम के हमले का कारण बनी वह इस्लामी क्रांति का क्षेत्रीय व वैश्विक प्रभाव था। ईरान की इस्लामी क्रांति ने क्षेत्र व संसार के बहुत से समीकरणों को बदल दिया था और यह बात उस समय की दो बड़ी शक्तियों और उनके क्षेत्रीय पिछलग्गुओं के हित में नहीं थी। ईरान के ख़िलाफ़ सद्दाम सरकार द्वारा थोपा गया युद्ध इस्लामी क्रांति के क्षेत्रीय व वैश्विक प्रभावों पर एक प्रतिक्रिया थी।