ईश्वरीय वाणी-५५
सूरे साफ़्फ़ात पवित्र क़रआन का ३७वां सूरा है और उसमें १८२ आयतें हैं।
चूंकि यह सूरा मक्के में नाज़िल हुआ था इसलिए इसमें अधिकांश बातों का संबंध आस्था, महान ईश्वर और प्रलय से है और साथ ही इसकी बहुत सी आयतों में अनेकेश्ववादियों की भर्त्सना की गयी है। सूरे साफ़्फ़ात की आरंभिक आयतों में महान ईश्वर फ़रिश्तों की बात करता है। इसके मुक़ाबले में उद्दंडी गुट शैतान और उसके परिणाम के बारे में चर्चा की जाती है। इसी तरह सूरे साफ़्फ़ात की आरंभिक आयतें काफ़िरों द्वारा पैग़म्बरी और प्रलय के इंकार तथा प्रलय के दिन उनके परिणाम के बारे में बात करती हैं। इसी प्रकार इन आयतों में स्वर्ग की कुछ महत्वपूर्ण नेअमतों का उल्लेख किया गया है। पवित्र क़ुरआन की सूरे साफ़्फ़ात की आयतों में हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत इस्हाक़, हज़रत मूसा, हज़रत हारून, हज़रत इलियास, हज़रत लूत और यूनुस के जीवन के कुछ पहलुओं का उल्लेख है। अलबत्ता इस मध्य हज़रत इब्राहीम के बारे में सबसे अधिक विस्तार से चर्चा की गयी है। सूरे साफ़्फ़ात की आयतें उस विश्वास व आस्था को रद्द करती हैं जिसके अनुसार अनेकेश्वरवादी यह मानते थे कि ईश्वर और फ़रिश्तों के मध्य रिश्तेदारी है। इसी प्रकार सूरे साफ़्फ़ात की अंतिम कुछ आयतों में सत्य की असत्य पर जीत और प्रलय में काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों के दंड की बात की गयी है। सूरे साफ़्फ़ात की आरंभिक आयतों में महान ईश्वर लोगों का ध्यान आसमान और ज़मीन में अपनी क्षमता की ओर ध्यान दिलाने के लिए क़सम खाता है ताकि इंसान सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जायें।
शस्पष्ट है कि जब बात करने वाला अपनी बात को दृढ़ विश्वास के साथ कहता है तो निश्चित रूप से मानसिक दृष्टि से उसका प्रभाव संबोधक पर अधिक पड़ता है।
सूरे साफ़्फ़ात की आरंभिक आयतों में महान ईश्वर पंक्ति में रहने वाले फ़रिश्तों की सौगंध खाता है जो इंसान को पापों से रखते हैं। इसी तरह इस सूरे की आरंभिक आयतों में हमें उन तीन गुटों का सामना होता है जिनकी सौगंध खाई गयी है। जिन तीन गुटों के बारे में क़सम खाई गयी है उनकी विशेषताएं क्या हैं? वे कौन हैं? इसके बारे में पवित्र क़ुरआन के अधिकांश व्याख्याकर्ताओं का मानना है कि ये तीनों गुट फ़रिश्तों के हैं। फ़रिश्तों का एक गुट वह जो ईश्वरीय आदेश अंजाम देने के लिए पंक्ति में खड़ा है।
फ़रिश्तों का दूसरा वह गुट है जो इंसानों को पापों से रोकता है और लोगों के दिलों में शैतान के उकसावे को निष्क्रिय करता है या आसमान में बादलों को इधर –उधर ले जाने का मालिक है और सूखी ज़मीनों की सिंचाई की ज़िम्मेदारी उस पर है जबकि तीसरा गुट उन उन फ़रिश्तों का है जो उन आयतों को पढ़ते हैं जो ईश्वरीय दूतों व पैग़म्बरों पर उतरती हैं। महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन में इन गुटों की सौगंद खाने के बाद बल देकर कहता है कि ईश्वर का कोई भी समतुल्य नहीं है और एक अकेला- ईश्वर है। वह कहता है निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार एक है। उसके बाद महान ईश्वर आगे कहता है” जो कुछ आसमान और ज़मीन तथा इन दोनों के बीच में है उन सबका का और पूर्वों का मालिक ईश्वर है। बेशक हमने ज़मीन के आसमान को तारों से सुसज्जित किया है और मैंने उसे हर उद्दंडी शैतान से सुरक्षित कर रखा है।“ इसी कारण आसमान, ज़मीन, चांद और तारों की इस ब्रह्मांड में भूमिका और महत्व को बयान करने के साथ महान ईश्वर ने उनकी रचना के विभिन्न रहस्यों की याद दिलाई है और यह सब महान ईश्वर के एक होने के बेहतरीन प्रमाण हैं। सूरज हर दिन पहले वाले स्थान से भिन्न दूसरे स्थान से निकलता है और इन स्थानों के मध्य दूरी इतनी सूक्ष्म व सटीक है कि एक हज़ारवां सेंकेड भी कम ज़्यादा नहीं हो सकता और हज़ारों साल से यह सूक्ष्म प्रक्रिया जारी है और अगर पूरे साल सूरज अपनी नियत दूरी तय न करे तो जो चार मौसम ही वजूद में नहीं आयेंगे और मौसम में भिन्नता के कारण ही ज़मीन पर रहने वालों को अलग २ लाभ मिलता है और यह स्वयं ईश्वर की महानता व कृपा की एक अन्य अलामत है।
उसके बाद महान ईश्वर आसमान की सुन्दरता का चित्रण करता और कहता है” हमने निकट वाले आसमान को तारों से सुसज्जित किया है।“ महान ईश्वर के इस कथन से स्पष्ट है कि कुछ दूसरे आसमान भी हैं जो हमसे बहुत दूर हैं और जो आसमान सबसे निकट है महान ईश्वर ने उसे सितारों से सुसज्जित किया है। रातों को जब इंसान आसमान की ओर देखता है तो पूरा आसमान तारों के प्रकाश से जगमगा रहा होता है। दूसरे शब्दों में सुन्दरता का बड़ा ही अनुपम, मनोरम, लुभावना और आकर्षक दृश्य होता है।
इसी तरह पवित्र क़ुरआन के इस सूरे की आयतों में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि आसमान शैतान की घुसपैठ से सुरक्षित है। महान ईश्वर कहता है हमने उसे हर उदंदडी शैतान से सुरक्षित कर रखा है।
पवित्र क़ुरआन सूरे साफ़्फ़ात की ११वीं और उसके बाद की आयतों में प्रलय और उसका इंकार करने वालों की ओर संकेत करता है। मानो जो अनेकेश्वरवादी प्रलय का इंकार करने थे जब उन्होंने पवित्र क़ुरआन की आयतों को सुना तो ज़मीन, आसमान और फ़रिश्तों के पैदा करने के संदर्भ में कहा हमारी रचना इनसे महत्वपूर्ण व जटिल है। पवित्र क़ुरआन इन लोगों के उत्तर में कहता है ज़मीन, विशाल आसमान और फ़रिश्तों के मुक़ाबले में इंसान की रचना जटिल व कठिन नहीं है क्योंकि इंसान की रचना का आरंभ मुट्ठी भर चिपकने वाली गीली मिट्टी के अतिरिक्त कुछ और नहीं था। उसके आगे महान ईश्वर कहता है इनसे पूछो कि फ़रिश्तों, आसमान और ज़मीन की रचना कठिन है या उनकी रचना जो मुट्ठीभर चिपकने वाली गीली मिट्टी से पैदा किये गये हैं?। उसके बाद महान ईश्वर कहता है” हे पैग़म्बर आप इस पर आश्चर्य करते हैं कि वे प्रलय का इंकार करते हैं आप इस विषय को इतना स्पष्ट देख रहे हैं कि प्रलय का इंकार करने पर आपको आश्चर्य हो रहा है परंतु वे उसे इस सीमा तक असंभव समझते हैं कि मज़ाक़ उड़ाते हैं जो लोग प्रलय का इंकार करते हैं उसका कारण केवल उनकी अज्ञानता नहीं है बल्कि उनकी दुश्मनी और हठधर्म भी भी है। अतः जब उनके सामने प्रलय की बात की जाती है तो वे उस पर ध्यान नहीं देते हैं और अपने ग़लत रास्ते पर बाक़ी रहते हैं और जब भी आपके चमत्कारों में से कोई चमत्कार देखते हैं तो वे न केवल मज़ाक उड़ाते हैं बल्कि दूसरों को भी मज़ाक उड़ाने के लिए उकसाते और कहते हैं यह केवल खुला हुआ जादू है इसके अलावा कुछ नहीं है!
इस्लाम और सच्चाई के शत्रु पवित्र क़ुरआन को एक चमत्कार के रूप में स्वीकार करने के बजाये कहते थे कि यह एक जादू है। साथ ही वे पवित्र क़ुरआन के प्रभावों व चमत्कारों को स्वीकार करते थे। उसके बाद पवित्र कुरआन की आयतों में प्रलय के दिन का वर्णन किया गया है और प्रलय का परिचय एक दूसरे से अलग हो जाने और छूट जाने के दिन के रूप में किया गया है और हर इंसान को अपने स्थान पर रखा जायेगा।
इसी प्रकार सूरे साफ़्फ़ात की आयतों में प्रलय का इंकार करने वालों के दंड और नरकवासियों की एक दूसरे से वार्ता का उल्लेख किया गया है। पवित्र कुरआन के सूरे साफ़्फ़ात की २४वीं से ३२वीं तक आयतों में नरकवासियों के अंत और उनकी एक दूसरे से वार्ता का उल्लेख किया गया है। महान ईश्वर कहता है” उन्हें रोकिये कि उनसे पूछताछ की जानी चाहिये। उनसे कहा जायेगा कि तुम क्यों एक दूसरे से सहायता मांग रहे हो? परंतु वे लोग उस दिन ईश्वर की शक्ति के समक्ष नतमस्तक होंगे। उस समय वे एक दूसरे को संबोधित करेंगे और सवाल करेंगे। एक गुट कहेगा तुम हमारी भलाई के बहाने हमारे मध्य प्रविष्ट हुए जबकि तुम्हारे कार्य में पाखंड व धोखा के अलावा कुछ नहीं था उसके उत्तर में दूसरा गुट कहेगा। तुम ख़ुद ही ईमान नहीं लाये हमारी क्या ग़लती है? हमारा किसी प्रकार का वर्चस्व तुम पर नहीं था बल्कि तुम स्वयं उद्दंडी जाति थे। अब ईश्वर का आदेश हम सब पर स्पष्ट हो चुका है और हम सब दंड का स्वाद चखेंगे। हां हमने तुम्हें गुमराह किया जिस तरह तुम स्वयं गुमराह थे।“
विशेषज्ञों का मानना है कि मार्गदर्शक और दोस्त इंसान के भविष्य में बहुत प्रभावी भूमिका रखते हैं। अतः दोस्त और मार्गदर्शक के चयन में बहुत ही सूक्ष्मता और होशियारी से काम लेने की आवश्यकता है। पवित्र क़ुरआन ने गुमराह मार्गदर्शकों और उनके अनुयाइयों के अंत को बयान कर दिया है। प्रलय के दिन गुमराह मार्गदर्शक और उनके अनुयाई अपने पापों को एक दूसरे की गर्दन में डालने का प्रयास करेंगे। साथ ही कोई भी स्वयं को निर्दोष सिद्ध नहीं कर पायेगा। पवित्र कुरआन गुमराह मार्गदर्शक और उनके अनुयाइयों के अंत को बयान करने के साथ कहता है” उस दिन चाहे अनुयाइ हो या गुमराह मार्गदर्शक सबके सब ईश्वरीय प्रकोप में होंगे। अतः बुद्धि से काम लेने वाले हर इंसान को चाहिये कि वह पथप्रदर्शक और दोस्त के चयन में बहुत ही होशियारी से काम ले।
सूरे साफ़्फ़ात की ३५वीं आयत में महान ईश्वर इन लोगों के बुरे अंत के कारणों को बयान करते हुए कहता है” जब उनसे कहा गया कि ईश्वर के सिवा कोई दूसरा पूज्य नहीं है तो क्यों वे अंह और उद्दंडता से काम लेते थे।?
वास्तव में इंसान के अंदर अंह और स्वयं को दूसरों से बेहतर व श्रेष्ठ समझने की भावना सत्य को स्वीकार न करने का कारण बनती है। दूसरे शब्दों में दूसरों को हेय दृष्टि से देखना, उनका मज़ाक उड़ाना और ग़लत विश्वासों व परंपराओं पर आग्रह करना अंह का परिणाम है। प्रलय के दिन फ़रिश्ते पापियों, अत्याचारियों, उनके साथियों और उनके झूठे पूज्यों के साथ उन्हें एक साथ नरक की ओर ले जायेंगे।