Apr ११, २०१६ ०६:५१ Asia/Kolkata

साफ़्फ़ात नामक सूरे में जिन ईश्वरीय दूतों की जीवनी का उल्लेख है, उनमें से हर एक ईश्वर पर आस्था और उसकी बंदगी के नतीजे में ईश्वर की कृपा का पात्र बना।

 साफ़्फ़ात सूरे में सबसे पहले हज़रत नूह का उल्लेख किया गया है। इस सूरे की नंबर 75 से 78 तक की आयतों में ईश्वर कहता है, नूह ने हमको पुकारा था तो हम कितने अच्छे निवेदन स्वीकार करने वाले हैं। हमने उन्हें और उनके परिजनों को बड़ी घुटन और बेचैनी से बचा लिया। और उसकी पीढ़ी को बाक़ी रखा। और बाद की पीढ़ियों में उनकी उनकी याद को बाक़ी रखा।

 

 

हज़रत नूह को उनकी जाति ने बहुत सताया था। वह जितना अपनी जाति के लोगों को एकेश्वरवाद की ओर बुलाते लोग उतना उनका मज़ाक उड़ाते और उन्हें यातना देते थे। किन्तु हज़रत नूह ने अपनी जाति के लोगों के दुर्व्यवहार पर संयम से काम लिया यहां तक कि उन्हें यह विश्वास हो गया कि उनकी जाति के लोग ईश्वर पर ईमान नहीं लाएंगे। उस वक़्त उन्होंने ईश्वर से दुआ की कि उन्हें उनकी जाति के हाथ से मुक्ति दिलाए। पवित्र क़ुरआन में उस हालत का उल्लेख है जब हज़रत नूह अपनी जाति की ओर से निराश हो गए। साफ़्फ़ात सूरे में ईश्वर कहता है, हमने उनकी दुआ क़ुबूल की और उन्हें तथा उनके परिजनों को बड़े दुख से मुक्ति दिलायी। हां! ईश्वर ने बाद की जातियों के बीच भले नाम से उनकी चर्चा बाक़ी रखी। पवित्र क़ुरआन में उन्हें धैर्यवान व हमदर्द ईश्वरीय दूत के रूप में याद किया गया है। साफ़्फ़ात सूरे की 79वीं आयत में ईश्वर कहता है, तमाम दुनियावालों में नूह पर सलाम हो।

क्या इससे बड़ी भी कोई गर्व की बात हो सकती है कि ईश्वर नूह पर सलाम भेजे। ऐसा सलाम जो प्रलय के दिन तक दुनियावालों में बाक़ी रहे। पवित्र क़ुरआन में इस तरह का सलाम ईश्वर ने गिने चुने स्थान पर भेजा है।

 

               

साफ़्फ़ात सूरे की आयत नंबर 83 से 113 के बीच हज़रत इब्राहीम की ज़िन्दगी की महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख किया गया है। ईश्वर कहता है, याद करो जब इब्राहीम क़ल्बे सलीम अर्थात पवित्र मन के साथ अपने ईश्वर की उपासना की ओर उन्मुख हुए।

क़ल्बे सलीम, मन की उस अवस्था को कहते हैं जब वह हर प्रकार की नैतिक व आस्था से जुड़ी बीमारियों से पाक हो। क़ल्बे सलीम उस मन को कहते हैं जो हर प्रकार के भ्रष्टाचार, अनेकेश्वरवादी विचार और ईश्वर के बारे में हर प्रकार के संदेह से पाक हो।

पवित्र क़ुरआन में प्रलय के दिन क़ल्बे सलीम अर्थात पवित्र मन को मनुष्य की मुक्ति का एकमात्र मार्ग बताया गया है। जैसा कि शूरा नामक सूरे की आयत नंबर 88 और 89 में ईश्वर कह रहा है, जिस दिन धन संपत्ति और बच्चे इंसान को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचाएंगे सिर्फ़ वह व्यक्ति मुक्ति पाएगा जो पवित्र मन के साथ ईश्वर के सामने उपस्थित होगा।

 

 

हज़रत इब्राहीम ने पवित्र मन और दृढ़ संकल्प के साथ मूर्ति पूजा करने वालों से संघर्ष का बीड़ा उठाया। इतिहास में आया है कि इराक़ के बाबिल शहर के मूर्ति पूजक हर साल विशेष त्योहार का समारोह आयोजित करते थे। उस दिन वे खाना पकाते और उसे मूर्तियों से भरे उपासना स्थल पर रखते थे ताकि खाना उनके विचार में पवित्र हो जाए। उसके बाद वे शहर के बाहर जाते और सूरज डूबने के वक़्त लौटते और प्रार्थना तथा खाना खाने के लिए उपासना स्थल जाते थे। हज़रत इब्राहीम के मन में एक विचार आया कि जब त्योहार के दिन शहर ख़ाली हो जाए तो मूर्तियों को तोड़ें ताकि इस प्रकार लोगों की सोयी हुयी अंतरात्मा को झिंझोड़ें और उन्हें समझाएं कि मूर्ति पूजने का कोई फ़ायदा नहीं है। जब लोगों ने हज़रत इब्राहीम को त्योहार की पूर्व संध्या पर, त्योहार में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने तारों पर एक निगाह डाली और कहा कि मैं बीमार हूं और इस तरह वह उस समारोह में जाने से बच गए। बाबिल शहर के लोग विशेष समारोह के लिए शहर से बाहर गए। इस तरह हज़रत इब्राहीम इस शहर में अकेले रह गए। वह क्षण आ पहुंचा था जिसका उन्हें बड़े दिन से इंतेज़ार था। उन्हें अकेले मूर्ति पूजा के ख़िलाफ़ संघर्ष करना था और ऐसा काम करना था जिससे मूर्ति पूजने वाले, निश्चेतना से जाग सकें।

 

 

पवित्र क़ुरआन में इस घटना का इस प्रकार उल्लेख किया गया है, वह जिसे वे पूजते थे, उनके पास गया। उन्हें और उनके आस-पास मौजूद खाने के बर्तनों को देखा और मज़ाक़ भरे स्वर में कहा, इन खानों में से क्यों नहीं खाते? क्यों बात नहीं करते? उसके बाद हाथ में कुल्हाड़ी ली और सीधे हाथ से उन पर भारी वार किया। मूर्ति से भरे उस उपासना स्थल का नक़्शा ही बदल दिया।

जब मूर्ति पूजने वाले शहर लौटे तो उन्हें ऐसा दृष्य दिखाई दिया जो उनके लिए आश्चर्यजनक था। कुछ देर उन्होंने आश्चर्य भरी निगाहों से ईधर-उधर देखा और फिर चिल्लाए कि किसने यह काम किया है? उन्हें याद आया कि शहर में ईश्वर की उपासना करने वाला एक जवान है जो मूर्तियों का मखौल उड़ाता था। फ़ौरन हज़रत इब्राहीम के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मूर्तियों को किसने तोड़ा है। हज़रत इब्राहीम के तार्किक जवाब को साफ़्फ़ात सूरे की आयत संख्या 95 और 96 में ईश्वर यूं बयान करता है, क्या उस चीज़ को पूजते हो जिसे अपने हाथों से तराशा है? जबकि ईश्वर ने तुम्हें और जिस चीज़ को बनाते हो, सबको पैदा किया है। किन्तु उन लोगों ने अपनी ताक़त पर घमन्ड करते हुए कहा कि उनके लिए एक ऊंचा स्थान बनाओ और आग के भड़कते हुए कुन्ड में डाल दो। उन्होंने हज़रत इब्राहीम को ख़त्म करने के लिए एक योजना बनायी थी किन्तु हम उन पर हावी रहे। ईश्वर के आदेश से इब्राहीम के लिए आग ठंडी हो गयी और वे इस ख़तरे से पूरी तरह सुरक्षित बाहर आए।

 

 

साफ़्फ़ात सूरे की 114 से 122 तक की आयतों में हज़रत मूसा और हज़रत हारून पर ईश्वर की कृपा का उल्लेख किया गया है। उसके बाद हज़रत इल्यास का संक्षेप में उल्लेख किया गया है। हज़रत इल्यास ईश्वरीय दूत थे और उनकी जाति मूर्ति पूजती थी। उन्होंने अपनी जाति से कहा, क्या तुम ‘बअल’ को पुकारते हो और सबसे अच्छे रचयिता को छोड़ देते हो। हज़रत इल्यास ने लोगों को इस बुरे कर्म से रोका और उन्हें अनन्य ईश्वर की ओर बुलाया। उन्होंने मूर्ति पूजने वालों को फटकार लगाते हुए कहा, उस ईश्वर को छोड़ दिया है जो तुम्हारा और तुम्हारे बाप-दादाओं का पालनहार है। किन्तु उस जाति ने इस ईश्वरीय दूत की नसीहतों पर ध्यान नहीं दिया और उसे झुठलाने पर तुल गए।

 

 

साफ़्फ़ात सूरे में ईश्वरीय दूत हज़रत लूत की जाति की करतूतों की ओर इशारा किया गया है और आयत नंबर 139 से 148 तक हज़रत यूनुस के जीवन के एक भाग का उल्लेख करती है। हज़रत यूनुस अन्य ईश्वरीय दूतों की तरह, लोगों को अनन्य ईश्वर की ओर बुलाया और मूर्ति पूजा के ख़िलाफ़ संघर्ष शुरु किया। उसके बाद वे अपने समाज की बुराइयों को मिटाने के लिए उठ खड़े हुए। वह उस भ्रष्ट जाति को हमदर्द बाप की तरह नसीहत करते रहे किन्तु बहुत थोड़े लोग ईश्वर पर आस्था लाए। हज़रत यूनुस अपनी जाति की ओर से निराश हुए और उन्हें शाप दिया। जब ईश्वर के प्रकोप का वक़्त क़रीब आ गया तो हज़रत यूनुस उनके बीच से चले गए। यहां तक कि क्रोध की हालत में समुद्र के किनारे पहंचे। वहां मुसाफ़िरों व सामान से लदी एक नाव दिखाई दी। उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें भी अपने साथ ले चलें। वह नाव पर सवार हुए लेकिन अचानक एक बड़ी मछली नाव के रास्ते में मुंह खोल कर खड़ी हो गयी। नाव पर सवार लोगों ने कहा कि हममें से किसी एक व्यक्ति को ख़ुद को इस मछली के हवाले करना पड़ेगा। उन्होंने ड्रॉ अर्थात क़ुरआ निकाला तो उसमें हज़रत यूनुस का नाम निकला। उन्होंने तीर बार ड्रॉ निकाला और तीनों बार हज़रत यूनुस का नाम आया। मजबूर होकर उन्होंने हज़रत यूनुस को समुद्र में फेंक दिया और मछली उन्हें निगल गयी।

हज़रत यूनुस ईश्वरीय दूत थे। उनके लिए बेहतर था कि वह अपनी जाति के संबंध में और धैर्य से काम लेते और आख़री क्षण तक अपनी जाति के बीच मौजूद रहते कि शायद वे सुधर जाते। जब हज़रत यूनुस को मछली ने निगल लिया तो उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ। मछली के पेट के अंधेरे में उन्होंने ईश्वर को याद किया और उससे क्षमा मांगी। साफ़्फ़ात सूरे की आयत नंबर 143 और 144 में ईश्वर कहता है, अगर वह गुणगान करने वालों में न होते तो प्रलय के दिन तक मछली के पेट में रहते।

 

 

ईश्वर के गुणगान ने उन्हें ईश्वर की कृपा का पात्र बनाया। विशाल मछली ने सूखे साहिल पर हज़रत यूनुस को उगल दिया। पवित्र क़ुरआन के शब्दों में, हमने उन्हें सूखी और हर प्रकार की वनस्पति से ख़ाली ज़मीन पर डाल दिया इस हालत में कि वह बीमार थे। मछली के पेट से निकलने के बाद ईश्वर ने उन पर कृपा की। इस बारे में पवित्र क़ुरआन कहता है, हमने उनके लिए लौकी उगायी ताकि वह उसके चौड़े पत्तों की छावं और उसकी आर्द्रता में आराम करें।

ठीक होने के बाद हज़रत यूनुस अपनी जाति की ओर लौटे तो देखा कि वे सबके सब अनन्य ईश्वर के उपासक बन गए हैं। उन्हें इस बदलाव पर बहुत हैरत हुयी।

 

 

पूरे इतिहास में इंसानों का अंजाम हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा और हज़रत लूत की जातियों के अंजाम जैसा हो सकता है या हज़रत यूनुस की जाति की तरह अपना अंजाम अच्छा कर सकता है। यह घटना बताती है कि किस तरह ईश्वर के प्रकोप की पात्र एक जाति अंतिम लम्हों में अपनी क़िस्मत बदल कर इतिहास के धारे को मोड़ सकती है और ईश्वर की कृपा का पात्र बन सकती है।