Jan २६, २०१९ १७:२८ Asia/Kolkata

हमने ईरान पर हमला करने की अपनी ग़लती को सही ठहराने के लिए सीमाओं से संबंधित सद्दाम के दावे का उल्लख किया था और अल-जज़ायर समझौते को फाड़कर फेंकने की घटना की ओर संकेत किया था। हालांकि ईरान पर हमला करने का उद्देश्य केवल सीमाओं से संबंधित दावा नहीं था।

सद्दाम चाहता था कि क्षेत्र में अमरीका के सबसे बड़े समर्थक के रूप में मोहम्मद रज़ा पहलवी के पतन के बाद, ईरान की इस्लामी क्रांति को उखाड़ फेंक कर उसकी जगह लेले। ईरान पर सद्दाम के हमले के एक साल बाद, इराक़ के तत्कालीन उप प्रधान मंत्री ताहा यासीन ने कहा था, यह युद्ध, 1975 के समझौते या कुछ सौ किलोमीटर और आधी अरवंद नदी के लिए नहीं है, बल्कि इस युद्ध का उद्देश्य इस्लामी क्रांति व्यवस्था का पतन है। इराक़ के इस उद्देश्य की गूंज पश्चिमी मीडिया में भी सुनाई दे रही थी।

जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एडवर्ड उडलक के हवाले से क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर अख़बर ने लिखा, संभवतः इराक़ का एक उद्देश्य ईरान की इस्लामी व्यवस्था का पतन करना है। इराक़, क्षेत्र के अन्य देश और पश्चिम की बड़ी शक्तियां ईरान में इस्लामी क्रंति के पतन पर सहमत थे। इन शक्तियों का कम से कम यह उद्देश्य तो था ही कि ईरान के व्यवहार में बदलाव किया जाए। अमरीका, पश्चिमी शक्तियां और फ़ार्स खाड़ी के अरब देश ऐसी योजना तैयार करना चाहते थे, जिससे ईरान को निंयत्रित कर सकें। इस्लामी गणतंत्र को पश्चिमी देशों के साथ सहयोग करने के लिए मजबूर कर सकें या उसे उखाड़ फेंके और क्रांति से पहले वाली स्थिति को बहाल कर दें। इसलिए कि ईरान की स्वाधीन नीतियां पश्चिम और अमरीका के हितों से टकरा रही थीं।

अमरीका ने भी यूरोपीय देशों के समर्थन से ईरान के ख़िलाफ़ कई क़दम उठाए। यह क़दम आतंरिक एवं बाहरी स्तर पर उठाए गए। घरेलू स्तर पर हंगामे कराना, अल्पसंख्यकों द्वारा गृहयुद्ध शुरू करवाना और सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्तर पर बाएं बाज़ू के दलों को सक्रिय करना। अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर इन शक्तियों ने ईरान को अलग थलग करने के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़े, कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए, ईरान की संपत्तियों को सीज़ किया, आर्थिक घेराबंदी की और इसी तरह तबस सैन्य ऑप्रेशन की योजना बनाई। अमरीकी दूतावास पर ईरानी छात्रों के निंयत्रण की प्रतिक्रिया में अमरीका ने तबस पर हमला किया था, हालांकि तबस रेगिस्तान में अमरीका का यह ऑप्रेशन बुरी तरह से नाकाम हो गया था।

ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद, अमरीका को सबसे गहरा घाव तेहरान में उसके कूटनयिकों को बंधक बनाए जाने से लगा। इमाम ख़ुमैनी का अनुसरण करने वाले छात्रों का मानना था कि तेहरान स्थित अमरीकी दूतावास अपनी कूटनीतिक गतिविधियों के बजाए जासूसी का अड्डा बना हुआ है और इस्लामी व्यवस्था का पतन करना चाहता है। छात्रों ने अपनी बात साबित करने के लिए अमरीकी दूतावास से मिलने वाले दस्तावेज़ों को प्रकाशित कर दिया। वास्तव में अमरीकी दूतावास ईरान में अस्थिरता फैलाने की योजना बना रहा था। इस सैन्य ऑप्रेशन की नाकामी के बाद, पश्चिम ने अमरीका के नेतृत्व में नई साज़िशें रचना शुरू कर दीं। ईरान पर इराक़ के हमले शुरू होने से 6 महीने पहले अप्रैल 1980 में न्ययॉर्क टाइम्स ने अमरीका की इस योजना से पर्दा उठाया था।

 

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा था, तबस ऑप्रेशन की नाकामी के बाद, अमरीकी सरकार 3 महत्वपूर्ण सैन्य विकल्पों पर विचार कर रही है। जिन शहरों में अमरीकियों को बंधक बनाकर रखा गया है, वहां सैनिकों को उतारना, ईरान के तेल के कुओं और रिफ़ाइनरियों पर बमबारी करना जैसी योजनाएं अमरीकी सरकार के विचाराधीन थीं। न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है, अमरीका को उम्मीद है कि ईरान पर आर्थिक एवं राजनीतिक प्रतिबंधों से ईरान और इराक़ के रिश्तों में और अधिक तनाव उत्पन्न होगा। पश्चिम में कुछ लोगों का मानना था कि एक शक्तिशाली देश से युद्ध की संभावना, शायद ईरान को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दे।

ईरान-इराक़ युद्ध शुरू होने से पहले वे एक ऐसी योजना पर काम करना चाहते थे कि अगर वह सफल हो जाती है तो इस्लामी गणतंत्र का पतन हो जाता और अगर नाकाम रहती तो युद्ध को शुरू किया जाता। इसलिए 25 जून 1980 को ईरान की सेना के कुछ तत्वों के सहयोग से नक़ाब नामक तख़्तापलट की योजना तैयार की गई। लेकिन योजना पर अमल शुरू होने से पहले ही इसका फंडाफोड़ हो गया और अमरीका को एक दूसरी अपमानजक हार का मुंह देखना पड़ा।

सुरक्षा मामलों में अमरीकी राष्ट्रपति कार्टर के सलाहकार ब्रेजेंस्कि ने उस समय कहा था, ईरान की क्रांति का मुक़ाबला करने के लिए अमरीका को उन देशों को शक्तिशाली बनाना चाहिए जो ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान छेड़ सकते हैं। अपनी इसी योजना को आगे बढ़ाने के लिए ब्रेजेंस्कि ने ख़ुफ़िया तौर पर जुलाई 1980 में जॉर्डन में सद्दाम से मुलाक़ात की थी।

व्हाइट हाउस की सलाहकार टीम के सदस्य गेरी सिक के मुताबिक़, इस मुलाक़ात में ब्रेजेंस्कि ने सद्दाम को यह आश्वासन दिलाने की कोशिश की थी कि वाशिंगटन ने तेहरान पर हमले के लिए बग़दाद को हरी झंडी दिखा दी है। फ़िगारो पत्रिका ने इस संबंध में लिखा था कि जून से इराक़ और ईरान युद्ध के लिए उस समय से कोशिशें शुरू हो गई थीं जब ब्रेजेंस्कि ने जॉर्डन की यात्रा की थी और जॉर्डन-इराक़ सीमा पर सद्दाम से मुलाक़ात की थी, इस मुलाक़ात में अमरीकी राष्ट्रपति के सुरक्षा सलाहकार ने सद्दाम के समर्थन का वादा किया था।

ब्रेजेंस्कि ने सद्दाम से कहा था कि अमरीका, अरवंद नदी के बारे में इराक़ की योजना और इस इलाक़े में एक अरब देश की स्थापना का विरोध नहीं करेगा। इस मुलाक़ात के बाद, जिमी कार्टर ने इराक़ को पांच बोईंग विमानों के बेचने की अनुमति दी थी और ईरान पर हमला शुरू होने से कुछ दिन पहले ही बग़दाद पर जनरल इलैक्ट्रिक के मोटर बेचने पर लगा प्रतिबंध उठा लिया गया। इराक़ के संबंध में अमरीका की यह नीतियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उस समय बग़दाद पूर्वी ब्लॉक में शामिल था और उसे यूएसएसआर का समर्थन प्राप्त था। अर्थात अमरीका जो भी सद्दाम के साथ सहयोग का फ़ैसला करता, वह सोवियत संघ की सहमति से होता। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व की दो महा शक्तियों के बीच ईरान के ख़िलाफ़ यह अभूतपूर्व समनव्य था। अमरीका ईरान की इस्लामी क्रांति की दुश्मनी में अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी के साथ सहयोग करने के लिए तैयार था, इसलिए कि उसकी नज़र में केवल इराक़ ऐसा देश था जो ईरान से भिड़ सकता था।