Apr ११, २०१६ ०७:०३ Asia/Kolkata
  • ईश्वरीय वाणी-६०

सूरे फ़ुस्सेलत पवित्र क़ुरआन का ४१वां सूरा है और जो यह मक्के में उतरा है।

 इस सूरे में ५४ आयतें हैं और उसे हा मीम सज्दा भी कहते हैं। इस सूरे में पवित्र क़ुरआन की महानता, किसी भी ग़लत चीज़ का उसमें न होना, इस किताब के मुक़ाबले में शत्रुओं का दृष्टिकोण, महान ईश्वर की असीम शक्ति की निशानियां, घमंडी और उद्दंडी जातियों का परिणाम और प्रलय तथा इंसान के शरीर के अंगों का गवाही देना आदि वे विषय हैं जिनकी इस सूरे में चर्चा की गयी है।

इस्लामी इतिहास में आया है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम हमेशा उन चीजों की आलोचना करते थे जिनकी अनेकेश्वरवादी पूजा करते थे और उनके लिए पवित्र कुरआन की तिलावत करते थे ताकि वे एकेश्वरवाद की ओर पलट आयें परंतु वे कहते थे पैग़म्बरे इस्लाम शायर हैं कुछ कहते थे कि यह जादू है, इसमें भविष्य की बातें हैं।

 

 

जब भी कोई किसी प्रकार का झगड़ा करता था या अरब आपस में लड़ते- झगड़ते थे तो वलीद बिन मुग़ैरा नाम के एक अरब व्यक्ति से उसकी राय पूछते थे और उससे फैसला करने के लिए कहते थे। कभी- कभी वे अपने शेर भी उसके सामने पढ़ते थे ताकि वह उसमें से अच्छे शेर का चयन कर सके। एक दिन अबू जेहल उसके पास आया और बोला मोहम्मद की बातों के बारे में तेरा दृष्टिकोण क्या है? वलीद ने कहा छोड़ो मुझे मोहम्मद की बात सुनने दो उसके बाद मैं अपनी राए बताऊंगा।

 

वलीद, पैग़म्बरे इस्लाम(स) के पास गया और कहा हे मोहम्मद हमारे लिए अपने कुछ शेरों को पढ़ो। पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया मैं जो कुछ कहता हूं वे शेर नहीं हैं बल्कि ईश्वर की बातें हैं। वलीद ने कहा उसमें से कुछ को मेरे लिए पढ़ो। इस पर पैग़म्बरे इस्लाम ने हा मीम सज्दा सूरे की १ से १३ तक की आयतों की तिलावत की। यदि वे लोग ध्यान न दें तो हे पैग़म्बर आप उनसे कह दीजिये कि मैं तुम्हें उसी तरह के वज्रपात से डराता हूं जैसा वज्रपात आद और समूद जाति पर हुआ था। वलीद ने जैसे ही यह आयत सुनी वह कांपने लगा। उसके बाद वह उठा और क़ुरैश के पास जाने के बजाये अपने घर चला गया। अबू जेहल उसके पास गया और उससे बोला क्या तू भी मोहम्मद की बातों से प्रभावित हो गया? वलीद ने कहा नहीं परंतु मैंने मोहम्मद (से) ऐसी बात सुनी है जो न तो इंसानों जैसी है और न ही परियों जैसी। उनकी बातें मीठी और विशेष आकर्षण रखती हैं। तुम अगर क़ुरआन की आयतों को निष्क्रिय करना चाहते हो तो कहो कि मोहम्मद जादूगर हैं क्योंकि यह किताब लोगों के दिलों को अपनी ओर खींचती है। यह घटना पवित्र क़ुरआन के प्रभाव की सूचक है।

 

 

“हा मीम यह किताब कृपालु व दयालु ईश्वर की ओर से उतरी है। यह वह किताब है जिसकी आयतें स्पष्ट रूप से बयान की गयी हैं। समझदार लोगों के लिए क़ुरआन को अरबी में नाज़िल किया गया है। यह किताब शुभ सूचना देने और डराने वाली है परंतु अधिकांश लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया इसलिए वे क़ुरआन की आवाज़ को नहीं सुन रहे हैं।“

 

इस सूरे की पहली आयत पवित्र क़ुरआन की महानता की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यह किताब दयालु व कृपालु ईश्वर की ओर से नाज़िल की गयी है। उसके बाद वह इस किताब की कुछ उन विशेषताओं को बयान करती है जिन्से पवित्र क़ुरआन की वास्तविक तस्वीर का चित्रण होता है। पवित्र क़ुरआन हर उस चीज़ को साफ़­- साफ और विस्तार से बयान करता है जो इंसान के मार्गदर्शन में प्रभावी है। पवित्र क़ुरआन वास्तविकताओं को स्पष्ट व सूक्ष्म और बहुत ही सुन्दर ढंग से बयान करता है। साथ ही पवित्र क़ुरआन शुभ सूचना देने और डराने वाला है। अच्छे कार्य करने वालों को शुभ सूचना देता है और बुरे कार्य करने वालों और अपराधियों को नरक की आग से डराता है। पवित्र क़ुरआन शुभ सूचना और डराने की बात एक साथ करता है परंतु बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि अधिकांश लोग वास्तविकता से मुंह- मोड़ लेते हैं मानो वास्तविकता को सुनते ही नहीं।

सूरे फ़ुस्सेलत में महान ईश्वर आसमान और ज़मीन की रचना में अपने ज्ञान और अपनी महानता की निशानियों को बयान करने के बाद काफिरों की अंतरआत्मा से पूछता है और पैग़म्बरे इस्लाम का आह्वान करता है कि वे काफ़िरों से पूछें कि क्या वे उस ईश्वर का इंकार कर सकते हैं जिसने इतने विशाल ब्रह्मांड की रचना की है? इसी तरह पवित्र कुरआन पैग़म्बरे इस्लाम का आह्वान करता है कि वे काफ़िरों से पूछें कि क्या वे लोग उस ईश्वर का इंकार करते हैं और उसका समतुल्य क़रार देते हैं जिसने ज़मीन की रचना दो दिनों में की? वह ब्रह्मांड का रचयिता है केवल वही उपासना योग्य है।

 

 

सूरे फ़ुस्सेलत की १०वीं आयत में पहाड़ों के पैदा करने और ज़मीन की बरकतों व नेअमतों की चर्चा की गयी है। महान ईश्वर ने ज़मीन में पहाड़ों को रखा है और उसमें अत्यधिक नेअमतों को क़रार दिया है। महान ईश्वर ने ज़मीन के अंदर विभिन्न चीज़ों की खदानें और पानी आदि रखा है जबकि ज़मीन के ऊपर नाना प्रकार के वृक्षों, नदियों और समुद्रों आदि को करार दिया है जिनसे विभिन्न प्राणी लाभान्वित हो रहे हैं।

 

 

दूसरे शब्दों में महान ईश्वर ने हर उस चीज़ को पैदा किया है जिसकी समस्त प्राणियों और ग़ैर प्राणियों को आवश्यकता है। इसी प्रकार महान ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरे फ़ुस्सेलत में आसमान की चर्चा करता और कहता है फिर दो दिनों में उनको अर्थात सात आकाशों को बनाकर पूरा किया और प्रत्येक आकाश में उससे संबंधित आदेश को स्पष्ट कर दिया और दुनिया के आसमान को हमने द्वीपों यानी तारों से( रात के यात्रियों के दिशा- निर्देश आदि के लिए सजाया) सुरक्षित करने के उद्देश्य से। यह अत्यंत प्रभुत्वशाली सर्वज्ञ की ओर से ठहराया हुआ है।“ उसके बाद ईश्वर ने धरती और आकाश को आदेश दिया कि वे अस्तित्व ग्रहण करें इस प्रकार ईश्वर की इछ्छा से धरती और आकाश बने।

 

इस आयत के आधार पर आसमान की रचना बहुत अधिक गैस से हुई है और आज की साइंस ने जो अध्ययन किया है वह भी इसी बात की पुष्टि करती है।

पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकर्ताओं के अनुसार महान ईश्वर ने आसमान को जोर दिनों में पैदा किया है उसका अर्थ आसमान को दो चरणों में बनाया है। इसमें हर चरण में लाखों या अरबों साल का समय लगा है। इस आयत से समझा जा सकता है कि ब्रह्मांड में सात आसमान मौजूद हैं और हम जो कुछ चांद, तारे और सूरज देखते हैं वे सब पहले आसमान का भाग हैं। दूसरे शब्दों में इंसान केवल एक आसमान को देखते हैं। तारों के माध्यम से महान ईश्वर ने आसमान को सुसज्जित किया है और इंसान की दृष्टि में वे चेराग़ के समान प्रतीत होते हैं और वे सबके सब महान ईश्वर का पावन अस्तित्व में बेहतरीन प्रमाण हैं।

 

 

सूरे फ़ुस्सेलत, प्रलय का वर्णन करते हुए अनेकेश्वरवादियों को चेतावनी देते हुए कहता है प्रलय वह दिन है जिस इंसान का समस्त अस्तित्व यहां तक कि उसके शरीर की खाल भी बात करेंगे और उसके रहस्यों को प्रकट करेगी अतः पापी व अपराधी लोग बहुत भयभीत हो जायेंगे। इस संबंध में पवित्र क़रआन कहता है। वे अपने शरीर की खाल से कहेंगे क्यों मेरे ख़िलाफ़ गवाही दे रहे हो? वे जवाब में कहेंगे ईश्वर ने सब को बात करने की शक्ति प्रदान कर दी है हमें भी बोलने की शक्ति प्रदान कर दी है उसने तुम्हें पहली बार पैदा किया और तुम उसकी ओर पलटा दिये जाओगे।

अनेकेश्वादियों के सरगना जमा हुए और उन्होंने कहा मोहम्मद की मीठे बातें और जो आकर्षक कहानियां वे बयान करते हैं वे सबको अपनी ओर आकर्षित करती हैं अतः कुरआन पर नियंत्रण करने के लिए हमें कोई विकल्प ढ़ूढ़ना चाहिये। इसके बाद उन लोगों ने भ्रष्टाचार के केन्द्रों में विस्तार का फैसला किया अतः लोगों तक सच को पहुंचने से रोकने के लिए उन्होंने लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम से दूर करने का यथासंभव प्रयास किया। उन्होंने लोगों से कहा कि जब भी वे पैग़म्बरे इस्लाम को देखें तो सीटी और ताली बजायें और ऊंची आवाज़ में शेर पढ़ें तथा हो हल्ला करें और शोर मचायें ताकि पैग़म्बरे इस्लाम की आवाज़ को दबा सकें।

क़ाफिरों ने कहा इस क़ुरआन को न सुनो क़ुरआन की तिलावत के समय अर्थहीन बातें करो शायद सफल हो जाओ परंतु महान ईश्वर सूरे फ़ुस्सेलत की २७वीं २८वीं आयतों में उन काफिरों को कड़े दंड की चेतावनी देता है जो यह कहते थे कि क़ुरआन न सुनो।

 

 

इस समय सत्य के शत्रु भी विस्तृत पैमाने पर सत्य विरोधी कार्यवाहियां कर रहे हैं। वे सत्य की आवाज़ को लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए विभिन्न चालें चलते हैं। इन सबके बावजूद चौदह सौ साल से अधिक का समय गुज़र रहा है जब से पवित्र कुरआन इंसानों की पीढ़ियों को सफलता व कल्याण का मार्ग दिखा रहा है। सूरे फ़ुस्सेलत की ४१वीं और ४२वीं आयत में आया है कि क़ुरआन हर समय के लोगों के लिए है। इसी तरह इसमें कहा गया है कि जिन लोगों ने अनुस्मृति का इंकार किया जबकि वह उनके पास आई, हालांकि वह एक प्रभुत्वशाली किताब है। असत्य उस तक न उसके आगे से आ सकता है और न ही उसके पीछे से। यह क़ुरआन उसकी ओर से उतरा है जो अत्यंत तत्वदर्शी और प्रशंसा के योग्य है।“

 

पवित्र क़ुरआन वह किताब है जिसकी शिक्षाएं व आदेश इंसान की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार हैं और कोई भी ग़लत चीज़ पवित्र क़ुरआन में नहीं आ सकती। उसके अर्थों में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है और कोई भी उसके अर्थों को बातिल नहीं कर सकता। इसी प्रकार उसके क़ानूनों और शिक्षाओं में किसी प्रकार का विघ्न मौजूद नहीं है। इसी प्रकार न उसकी कोई आयत कम हुई है और न उसमें किसी शब्द की वृद्धि हुई है। दूसरे शब्दों में पवित्र क़ुरआन में किसी प्रकार का बातिल नहीं आ सकता।