Apr ११, २०१६ ०७:०७ Asia/Kolkata

सूरए दोख़ान, पवित्र क़ुरआन का 44वां सूरा है। इसमें 59 आयते हैं।

 यह सूरा मक्के में नाज़िल हुआ। दोख़ान का अर्थ होता है धुआं। सूरए दोख़ान में जिन विषयों का उल्लेख है वे इस प्रकार हैं- पवित्र क़ुरआन की महानता, इसका एक पवित्र रात में उतरना, एकेश्वरवाद, सृष्टि में ईश्वर की निशानियां, अनेकेवश्वरवादियों का अंजाम और उनको मिलने वाला दंड, हज़रत मूसा और बनी इस्राईल का क़िस्सा, फ़िरऔन और उसकी पराजय, सृष्टि का लक्ष्यपूर्ण होना, प्रलय का विषय, नरक वासियों को मिलने वाले दंड और स्वर्गवासियों को मिलने वाली अनुकंपाएं।

 

सूरए दुख़ान की आरंभिक 5 आयतों का अनुवाद कुछ इस प्रकार है। हा-मीम। गवाह है स्पष्ट किताब। निःसन्देह, हमने उसे एक बरकत भरी रात में नाज़िल किया है। निश्चय ही हम सचेत करने वाले हैं। उस (रात) में समस्त तत्वदर्शिता युक्त मामलों का फ़ैसला किया जाता है, हमारे यहाँ से आदेश के रूप में। निःसन्देह, पैग़म्बरों को भेजनेवाले हम ही हैं।

 

पवित्र क़ुरआन ऐसी महान पुस्तक है जो बहुत स्पष्ट हैं और जिसमें बताए गए विषय रोचक हैं तथा इसकी शिक्षाएं शिक्षाप्रद और जीवंत हैं। पवित्र क़ुरआन को एक महान रात में उतारा गया। यह ऐसी किताब है जो स्थाई अच्छाइयों का स्रोत है। पवित्र क़ुरआन के अधिकांश व्याख्याकर्ताओं ने इस रात को शबे क़द्र की रात बताया है। यह ऐसी रात है जिसमें पवित्र क़ुरआन के नाज़िल होने से मानवता को एक नई राह मिली। इस महान रात में पूरी सृष्टि के भविष्य को निर्धारित किया जाता है। पवित्र क़ुरआन को दो प्रकार से नाज़िल किया गया एक को तदरीजी कहा जाता है जबकि दूसरे को दफ़ई। तदरीजी नुज़ूल का अर्थ होता है टुकड़ों टुकड़ों में उतरना। इस हिसाब से पवित्र क़ुरआन 23 वर्षों के दौरान, पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर उतरा जबकि दफ़ई का अर्थ होता है कि क़ुरआन एक ही रात में नाज़िल हुआ। इस रात को शबे क़द्र के नाम से जाना जाता है। शबे क़द्र, पवित्र रमज़ान की एक रात है। इस बात का उल्लेख पवित्र क़ुरआन के सूरए क़द्र में इस प्रकार से किया गया हैः हमने उसे अर्थात क़ुरआन को शबे क़द्र में उतारा।

 

सूरए दोख़ान की 9वीं आयत में उन लोगों की ओर संकेत किया गया है जो वास्तविकता को अनदेखा करते हैं। यह वे लोग हैं जो सच्चाई का मखौल उड़ाते हैं। यह लोग इस आसमानी किताब और पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पैग़ंबरी में शंकाएं उत्पन्न करते हैं। इसके बाद की आयतों में इन हठधर्मी लोगों को धमकी देते हुए कहा गया है कि तुम उस दिन की प्रतीक्षा करो जब आकाश में धुआं फैल जाएगा जो सब लोगों को अपने घेरे में ले लेगा। यह बहुत भयंकर दंड है। वे कहेंगे कि हे ईश्वर! इस दंड को हमसे दूर कर दे हम ईमान लाते हैं।

 

दसवीं आयत में जिस दोख़ान शब्द का प्रयोग किया गया है उसका अर्थ गाढ़ा धुआं है जो इस नश्वर संसार की समाप्ति के समय आकाश पर छा जाएगा। इस धुएं से पूरा आकाश छिप जाएगा। यह धुंआ, वास्तव में संसार की समाप्ति और ईश्वरीय प्रकोप के आ पहुंचने की निशानी है। इस स्थिति से अनेकेश्वर वादियों में भारी भय व्याप्त हो जाएगा। अब ऐसी स्थिति में उनकी आखों के सामने वास्तविकता आ जाएगी। इन बातों के बाद वे अपनी ग़लती का आभास करेंगे और ईश्वर पर ईमान लाने को तैयार हो जाएंगे। वे कहेंगे, हे ईश्वर! हमसे अपने इस प्रकोप को दूर कर ले और हम तुझपर ईमान लाते हैं। यह लोग किस प्रकार से ऐसी बातें कर रहे हैं? इससे पहले उनके पास ईश्वरीय दूत आए और उन्होंने उनको झुठलाया था। वे ऐसे दूत थे जिन्होंने स्पष्ट ढंग से ईश्वर के बारे में उन्हें समझाया था। इन लोगों ने बजाए इसके कि उन ईश्वरीय दूतों की बात मानते, उनको झुठलाया और उनके उपदेशों को नहीं सुना। वे ईश्वरीय दूतों को ऐसा पागल कहा करते थे जिन्हें कुछ सिखा-पढ़ा दिया गया है।

 

फिर ईश्वर कहता है कि हम उनसे अपना कुछ प्रकोप हटा लेंगे किंतु वे पाठ नहीं लेते और पुनः बुरे कामों में लग जाते हैं। इससे हमको यह पता चलता है कि यदि अत्याचारी और बुरे लोग, ईश्वरीय प्रकोप के समय अपनी करनी पर पछताएं और यह दर्शाएं कि उन्हें अपने किये पर दुख है। हालांकि यह अस्थाई पछतावा है जो क्षणिक है। जब वे देखते हैं कि उनसे प्रकोप दूर हो गया है तो वे फिर अपनी पुरानी दिनचर्या आरंभ कर देते हैं।

इसके बाद सूरए दोख़ान की 16वीं आयत में ईश्वर कहता है कि याद रखो, जिस दिन हम उन्हें पकड़ेंगे, तो निश्चय ही हम बदला लेकर रहेंगे। इस आयत में वास्तव में कड़े दंड की ओर संकेत किया गया है जो पापियों और अत्याचारियों की प्रतीक्षा में है।

 

पहले की जातियों के जीवन के अध्ययन से इस बात का पता चलता है कि उन्होंने अपने काल के ईश्वरीय दूतों को झुठलाया था। इसके उदाहरण के लिए ईश्वर, हज़रत मूसा और फ़िरऔन की कहानी का उल्लेख करता है। हज़रत मूसा ने फ़िरऔन तथा उसके मानने वालों से कहा था कि हे ईश्वर के दासों, (बनी इस्राईल) को मेरे हवाले करो। मैं तुम्हारे लिए ईश्वर का भेजा हुआ दूत हूं। इसके बाद उन्होंने स्पष्ट तर्कों से लोगों को ईश्वर का निमंत्रण दिया ताकि वे सच्चाई की ओर आ सकें। हालांकि हज़रत मूसा के निमंत्रण का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंततः फ़िरऔन और उसकी सेना को पराजय का स्वाद चखना पड़ा और बनी इस्राईल को उनके अत्याचारों से मुक्ति मिली। इस प्रकार फ़िरऔन और उसके अनुयाइयों के पास जो भी अनुकंपाएं थी तथा जिनसे वे लाभ उठा रहे थे वे सब अब बनी इस्राईल के नियंत्रण मे आ चुकी थीं।

 

सूरए दोख़ान की 38वीं और 39वीं आयतों में कहा गया है कि सृष्टि का निर्माण हक़ के साथ किया गया है। ईश्वर कहता हैः- हमने आकाशों और धरती को, और जो कुछ उनके बीच है, व्यर्थ नहीं बनाया। हमने उन्हें हक़ के साथ पैदा किया, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं हैं।

निःसन्देह, यह महान सृष्टि किसी लक्ष्य के अन्तर्गत पैदा की गई है। यदि यह मान लिया जाए कि मृत्यु ही अंत है तो फिर सृष्टि का पैदा किया जाना व्यर्थ है। हालांकि ईश्वर ने सृष्टि की रचना व्यर्थ नहीं की बल्कि एक उद्देश्य के अन्तर्गत की है। सृष्टि के बारे में थोड़ा सोचने और चिंतन करने से स्पष्ट हो जाएगा कि यह संसार वास्तव में अनंत जीवन का प्रवेश द्वार है। पवित्र क़ुरआन के सूरए अंबिया की 16वीं आयत में इस वास्तविकता का उल्लेख किया गया है कि सृष्टि की रचना व्यर्थ नहीं की गई है। इस आयत में ईश्वर कहता है कि हमने धरती और आकाश तथा जो कुछ उनके भीतर है उसे व्यर्थ पैदा नहीं किया है।

 

इस सृष्टि के उद्देश्यपूर्ण होने के लिए यह स्वभाविक है कि पापियों और पाप न करने वालों के बीच कुछ अंतर होना चाहिए। अर्थात मरने के बाद यदि पापी और पाप न करने वाले एक समान रहें तो फिर यह उन लोगों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने ईश्वर के भय से अपने जीवन में पाप नहीं किये थे। ऐसे में न्याय की दृष्टि से यह बात सही है कि इस नश्वर संसार के बाद कोई अन्य संसार हो जहां पर लोगों के जीवन के क्रियाकलापों का हिसाब-किताब किया जाए और उनको उनके कर्मों के अनुसार दंड या प्रतिफल दिया जाए।

 

इस सूरे की 40वीं आयत और उसके बाद प्रलय, पापियों और स्वर्ग में स्वर्गवासियों के जीवन की ओर संकेत किया गया है। आयत का आरंभ इस प्रकार होता है कि निश्चय ही फ़ैसले का दिन, (सच और झूठ में अलगवा) का नियत समय है। इस आयत में प्रलय के दिन का उल्लेख है जिसमें सच और झूठ में जुदाई होगी और बुरे तथा अच्छे लोग अलग-अलग पंक्तियों में होंगे। यह वह दिन है जिसके बारे में पापियों को बताया जा चुका है। यह ऐसा दिन होगा जब किसी को किसी की परवाह नहीं होगी। उस दिन कोई भी उनकी सहायता करने वाला नहीं होगा। इस दिन कोई भी मित्र अपने मित्र की सहायता नहीं कर पाएगा। उस दिन केवल उसपर कृपा की जाएगी जिसके कर्मपत्र में अच्छे कार्य लिखे होंगे।

 

सूरए दोख़ान की 43वीं आयत और उसके बादे की आयतों में नर्क में नर्कवासियों को दिये जाने वाले दंड को प्रतिबिंबित किया गया है। इन आयतों में कहा गया हैः निस्संदेह ज़क़्क़ूम का वृक्ष, गुनहगारों का भोजन होगा। तेल की तलछट जैसा, वह पेटों में खौलता होगा, जैसे गर्म पानी खौलता है। ज़क़्क़ूम ऐसा वृक्ष है जो नर्क में पापियों का खाना होगा। वह बहुत की कड़वा और बदमज़ा होगा। जैसे ही वह पेट में जाएगा, पेट के भीतर इस प्रकार उबलने लगेगा जैसे खौलता हुआ पानी। इसके खाने से, बजाए इसके कि भूख समाप्त हो, पेट में जलन होगी और पीड़ा बढ़ेगी। आयत में बाद में कहा गया है कि नर्क के चौकीदारों को संबोधित करके कहा जाएगा कि इन हठधर्मी लोगों को कसके पकड़कर नर्क के बीच में डाल दो और उनपर खौलता हुआ पानी डालो। इस प्रकार नर्क में रहने वाले पापी, बाहर से भी जलेंगे और भीतर से भी। इस प्रकार पापी अपने पूरे अस्तित्व से जलने का आभास करेगा।

 

आगे चलकर आयत में स्वर्गवासियों को दी जाने वाली अनुकंपाओं का उल्लेख किया गया है ताकि नर्कवासियों को दिये जाने वाले दंड और स्वर्गवासियों को दी जाने वाली अनुकंपाओं की तुलना की जा सके। स्वर्गवासी जिन ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित हो रहे होंगे वह उनके सदकर्मों के कारण ईश्वर की ओर से उन्हें प्रदान की गई हैं। इससे पता चलता है कि संसार में सदकर्म करने वालों को अपने जीवन के बाद अनुकंपाएं प्राप्त होंगी।

 

 

 

एक ज़ायोनी समाचारपत्र ने अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन से यहूदियों के पलायन की सूचना दी है।

 

हआरेत्ज़ ने एक नए सर्वेक्षण में लिखा है कि अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में रहने वाले 14 प्रतिशत यहूदियों ने यह बात स्वीकार की है कि वे यहां से जाना चाहते हैं। इस समाचारपत्र ने लिखा है कि यहां पर रहने वाले यहूदी, मुसलमान और इसाइयों में से कुछ ही ऐसे हैं जो अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन में रहने से खुशी का आभास करते हैं।

 

इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि यहां रहने वाले एक तिहाई लोग विगत में मनो चिकित्सक को दिखा चुके हैं। हआरेत्यज़ लिखता है कि 25 प्रतिशत यहूदियों का मानना है कि आगामी कुछ वर्षों के दौरान इस्राईल का ख़ात्मा हो जाएगा।

 

कुछ समय पहले ज़ायोनी शासन ने घोषणा की थी कि इस्राईल की पुलिस में नैतिक भ्रष्टाचार और अन्य प्रकार की कई बुराइयां पाई गई हैं। इस विषय ने ज़ायोनी शासन के प्रति इस्राईलियों में अविश्वास की भावना को बढ़ाया है।