Apr ११, २०१६ ०७:०९ Asia/Kolkata

सूरे जासिया पवित्र क़ुरआन का ४५वां सूरा है और यह मक्का में उतरा है और इसमें ३७ आयतें हैं।

इस सूरे की २८वीं आयत से जासिया नाम लिया गया है। घुटने टेक देने वाली हालत को जासिया कहते हैं। यह उन सूरों में से है जो हा मीम शब्दों से शुरु होते हैं। जिन विषयों की इस सूरे में चर्चा की गयी है वे इस प्रकार हैं पवित्र कुरआन की महानता, मार्गदर्शन में उसकी भूमिका, एकेश्वरवाद के प्रमाण, भौतिकवादियों के प्रश्नों के उत्तर, बनी इस्राईल जैसी अतीत की कुछ जातियों के अंजाम की ओर संकेत, गुमराह लोगों को चेतावनी, दूसरों को क्षमा कर देने का निमंत्रण और प्रलय के दिन दिल को दहला देने वाली घटनाएं और इंसान के कर्मपत्र।

 

 

इस सूरे की तीसरी आयत में आया है कि बेशक आसमान और ज़मीन में मोमिनों के लिए निशानियां हैं।“

 

आसमानों की महानता और आश्चर्यचकित कर देने वाली उसकी व्यवस्था और इसी प्रकार ज़मीन एवं उसमें मौजूद चकित कर देने वाली चीज़ें सबकी सब महान ईश्वर की निशानियां हैं। आसमान अरबों साल से अपने स्थान पर बना हुआ है और ज़मीन बहुत ही तीव्र गति से अपने और सूरज के चारों ओर घूम रही है। इसी प्रकार आसमान, ज़मीन और तारे सबके सब बहुत ही तीव्र गति से आकाश गंगा के केन्द्र में घुम रहे हैं और अपनी अनत यात्रा को जारी रखे हुए हैं। इन सबके बावजूद बहुत ही शांत हैं और किसी को उनके चलने व गति का आभास तक नहीं होता है और ज़मीन समस्त इंसानों और प्राणियों आदि पालना बनी हुई है।

ज़मीन गोल, सुन्दर और अंडाकार है और उसकी सुन्दरता को देखने वाला हर इंसान अभी हो जाता है। रोचक बात यह है कि इंसान और दूसरे प्राणियों आदि के जीवन के बाक़ी रहने के ज़मीन में असंख्य स्रोत मौजूद हैं। पहाड़, समुद्र, ज़मीन का वातावरण व वायुमंडल भी सृष्टि की रचना करने वाले की महानता के चिन्ह हैं। अलबत्ता अनभिज्ञ और घमंडी लोग इस वास्तविकता को समझने से वंचित हैं।

 

 

पवित्र क़ुरआन के सूरे जासिया की चौथी आयत में इंसान और दूसरे प्राणियों की सृष्टि की ओर संकेत किया गया है। इस आयत में महान ईश्वर कहता है तुम्हारी सृष्टि में और जो कुछ ज़मीन पर चलते हैं और उस पर फैल गये हैं सब ईमान रखने वालों के लिए निशानियां हैं।“

इंसान का शरीर नगर की एक औद्योगिक इमारत की भांति बहुत ही रहस्यमयी है। इंसान के शरीर में हज़ारों किलोमीटर लंबी छोटी- बड़ी नाड़ियां व धमनियां हैं। इसी प्रकार इंसान के मस्तिष्क की बनावट और समस्त कार्यों के लिए उसका आदेश देना और इंसान के शरीर के समस्त अंगों का उसके आदेश देने के केन्द्र से जुड़ा होना चकित कर देने वाली चीज़ है। इंसान के शरीर के अंदर मौजूद समस्त तंत्रों की कार्यशैली और बाहरी चीज़ों के आक्रमण की स्थिति में स्वतः उनका प्रतिरोध महान ईश्वर की निशानी है।

 

 

इंसान के अलावा महान ईश्वर ने असंख्य प्राणियों को पैदा किया है उसमें वे प्राणी भी शामिल हैं जिन्हें माइक्रोप से देखा जा सकता है और उसमें दैत्याकार जानवर भी शामिल हैं और महान ईश्वर ने सबकी रचना विशेष प्रकार से की है। इनमें से हर एक अपने स्थान पर असीमित ज्ञान और समाप्त न होने वाली शक्ति यानी महान ईश्वर का चिन्ह है।

सूरे जासिया की पांचवीं आयत में महान ईश्वर की कुछ उन अनुकंपाओं का उल्लेख है जिनकी इंसान और दूसरे प्राणियों आदि के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है जैसे प्रकाश, हवा और पानी। महान ईश्वर कहता है और रात –दिन के उलट-फेर में भी और उस रोज़ी में जिसे ईश्वर ने आकाश से उतारा फिर उसके द्वारा धरती को उसके मुर्दा हो जाने के बाद जीवित किया और हवाओं के चलने में भी उन लोगों के लिए बहुत सी निशानियां हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं।

 

 

प्रकाश और अंधकार, रात- दिन का होना और उन दोनों का एक दूसरे का स्थान लेने की व्यवस्था बहुत ही सूक्ष्म व चकित कर देने वाली है। अगर हमेशा दिन ही रहता या वह बहुत लंबा होता तो गर्मी इतनी अधिक हो जाती कि समस्त प्राणी जल जाते और अगर हमेशा रात ही रहती तो सभी ठंडक से जम जाते और महान ईश्वर जो आसमान से रोज़ी देता है अर्थात वर्षा करता है वह समस्त प्राणियों, जीव जन्तुओं और वनस्पतियों आदि के जीवन को तरुणायी प्रदान करता है। इस आयत में इसी प्रकार हवा चलने के बारे में बात की गयी है। हवा आक्सीजन गैस से पूरिपूर्ण होती है और वह इस गैस को समस्त प्राणियों तक पहुंचाती है और वह कार्बनडाइ ऑक्साइड से मुक्त व स्वच्छ बनाने के लिए उन्हें जंगलों और मैदानी इलाक़ों में ले जाती है और स्वच्छ हो जाने के बाद उसे नगरों एवं आबदियों में भेजती है ताकि जीवन में संतुलन की रक्षा हो सके। इसके अतिरिक्त हवा वनस्पतियों के प्रजनन और उनके फलने-फूलने का कारण बनती है। हवायें समुद्रों में मौजें पैदा करती हैं और इस माध्यम से वे पानी में गति पैदा करतीं और उसे सड़ने से बचाती हैं। यही हवा समुद्रों में नावों के चलने में प्रभावी है। सूरे जासिया की ६ठीं आयत में महान ईश्वर फरमाता है” ये ईश्वर की निशानियां हैं जिनकी मैं सच्चाई के साथ तुम पर तिलावत करता हूं तो अगर वे इन आयतों पर ईमान नहीं लाते हैं तो ईश्वर और उसकी निशानियों के बाद किस चीज़ पर ईमान लायेंगे?

 

 

जो गुट व लोग ईश्वर की बातों और उसकी आयतों पर ईमान नहीं लाते हैं महान ईश्वर उनके अंजाम को बयान करता है धिक्कार झूठे पापियों पर कि उन पर ईश्वरीय आयतों की तिलावत की जाती है वे सुनते हैं परंतु उद्दंडता व अहं के कारण उसके विरोध पर आग्रह करते हैं तो उन्हें कड़े दंड की शुभ सूचना दे दो।“ पवित्र कुरआन के अनुसार ईश्वरीय आयतों के मुक़ाबले में शत्रुतापूर्ण रवाइया उन लोगों का कार्य है जिनका पूरा अस्तित्व पापों में डूबा हुआ है और वे झूठ बोलते हैं। ये वे इंसान हैं जिनके सामने महान ईश्वर की आयतों की तिलावती की जाती है परंतु घमंड के कारण वे इसका विरोध करते हैं मानो उन्होंने सुना ही नहीं। अतः महान ईश्वर उन्हें दर्दनाक दंड की सूचना देता है।

 

 

महान ईश्वर सूरे जासिया की १२वीं-१३वीं आयतों में एकेश्वरवाद के विषय को पेश करता है। ये आयतें कहती हैं” ईश्वर वह है जिसने समुद्र को तुम्हारे अधिकार में दे दिया है ताकि नाव उसके आदेश से उसमें चलें और तुम उसमें रोज़ी प्राप्त कर सको और शायद उसका आभार व्यक्त करो और जो कुछ आसमान और ज़मीन में है उसे तुम्हारे नियंत्रण में दे दिया है कि सब कुछ उसका है बेशक इसमें उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो चिंतन-मनन करते हैं।“

सूरे जासिया की १५वीं आयत में इस वास्तविकता की ओर संकेत किया गया है कि इंसान जो अच्छा या बुरा कार्य करता है उसका फायदा या नुकसान स्वयं इंसान को मिलता है। अतः इंसान को चाहिये कि वह स्वयं और अपने कार्यों के प्रति सावधान रहे। महान ईश्वर कहता है जो अच्छा कार्य करेगा वह स्वयं अपने लिए करेगा और जो बुरा कार्य करेगा वह स्वयं उसके नुकसान में है तो तुम सब अपने पालनहार की ओर पलटाये जाओगे।“

 

 

इस प्रकार की बात पवित्र कुरआन में विभिन्न स्थानों पर आई है और वास्तव में यह उन लोगों का उत्तर है जो यह कहते हैं कि ईश्वर को हमारी उपासना की क्या आवश्यकता है? इस आयत के आधार पर महान ईश्वर को हमारे कार्यों की कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि यह हम हैं जो भले व अच्छे कार्यों की छाया में पूरिपूर्ण होते हैं या बुरे कार्यों व पापों के कारण हमारा पतन होता है और हम गुमराही का मार्ग तय करते हैं और हमें अपने बुरे कार्यों का फल मिलेगा। यह आयत इस बिन्दु को भी बयान करती है कि ईश्वरीय क़ानून के समक्ष सब बराबर हैं और प्रतिदान एवं दंड का कानून भी पूर्णरूप से न्यायपूर्ण और इंसान के कर्मों के आधार पर होगा।

सूरे जासिया की २७वीं आयत में आया है ज़मीन और आसमान में ईश्वर का शासन है और जब प्रलय का दिन होगा तो उस दिन असत्प पर चलने वाले लोग घाटा उठायेंगे।“

 

 

महान ईश्वर समस्त ब्रह्मांड का मालिक है और उसने इस ब्रह्मांड को परलोक की खेती बनाया है यानी अगर इंसान इस दुनिया में अच्छा कार्य करेगा तो उसे परलोक में उसका अच्छा बदला मिलेगा और उसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा जिसमें हमेशा- २ रहेगा और वहां पर उसे हर प्रकार की ईश्वरीय अनुकंपा प्राप्त होगी और अगर बुरा कार्य करेगा तो उसका ठिकाना नरक होगा जहां वह हमेशा -२ के लिए ईश्वरीय दंड में रहेगा। जिन लोगों ने सत्य को स्वीकार नहीं किया और ग़लत विचारों व चीज़ों को प्रचलित किया प्रलय के दिन वे स्वयं को घाटे में होने को अपनी आंख से देखेंगे। इस सूरे की २८वीं आयत में प्रलय के दिन को चित्रित किया गया है महान ईश्वर कहता है उस दिन तुम हर जाति को घुटने के बल झुका हुआ देखोगे। प्रत्येक गुट को अपनी किताब की ओर बुलाया जायेगा आज तुम्हें उसका बदला दिया जायेगा जो तुम करते थे।“

 

 

प्रलय के दिन समस्त लोगों को एकत्रित किया जायेगा और वे सबके सब महान ईश्वर की न्याय की अदालत में हाज़िर होंगे ताकि उन्हें उनके कर्मों का बदला दिया जा सके। वे भय या नतमस्तक होने के कारण घुटने टेके होंगे। इस आयत में जिस किताब की ओर संकेत किया गया है वह वही कर्मपत्र होगा जिसमें समस्त अच्छाइयां और बुराइयां लिखी होंगी। महान ईश्वर की ओर से उनसे कहा जायेगा कि यह हमारी किताब है जो तुमसे सच्चाई व हक़ के साथ बात करती है बेशक तुम जो कुछ करते थे हम उसे लिखते थे।

 

 

सूरे जासिया की ३०वीं और ३१वीं आयतों में प्रलय के दिन होने वाले निर्णय के अंतिम चरण को बयान किया गया है। इन आयतों में महान ईश्वर कहता है जो लोग ईमान लाये और अच्छे कार्य किये उनका पालनहार उन्हें अपनी कृपा में दाख़िल करेगा यह वही स्पष्ट सफलता है परंतु जिन्होंने कुफ्र किया उनसे कहा जायेगा कि क्या हमारी आयतें तुम पर नहीं पढ़ी जाती थीं? किन्तु तुमने अहं किया और तुम बुरी जाति थे।“

सूरे जासिया की ३६वीं ३७वीं आयतें महान ईश्वर की असीमित शक्ति एवं तत्वदर्शिता को बयान करती हैं। महान ईश्वर कहता है” अतः सारी प्रशंसा ईश्वर से विशेष है जो आसमान और ज़मीन का पालनहार है। आकाशों और ज़मीन में बड़ाई उसी के लिए है और वह प्रभुत्वशाली और अत्यंत तत्वदर्शी है।“