ईश्वरीय वाणी-६४
सूरए अलअहक़ाफ़ पवित्र क़ुरआन का 46वां सूरा है। इसमें 35 आयते हैं।
सूरए अलअहक़ाफ़ में इन विषयों का मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है। क़ुरआन की महानता, अनेकेश्वरवाद से संघर्ष, प्रलय, आद नामक जाति का उल्लेख, ईश्वरीय दूतों के निमंत्रण के सार्वजनिक होने की बात, अनेकेश्वरवादियों को डराने के लिए मोमिनों को प्रेरित करना और ईश्वरीय दूतों की ओर से लोगों से घैर्य तथा प्रतिरोध करने का निमंत्रण आदि।
सूरए अहक़ाफ़ की आरंभिक तीन आयतों का अनुवाद इस प्रकार हैः हा. मीम. इस किताब का अवतरण उस अल्लाह की ओर से है जो प्रभुत्वशाली एवं अत्यन्त तत्वदर्शी है। हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के मध्य है उसे केवल हक़ के साथ और एक नियत अवधि तक के लिए पैदा किया है किन्तु जिन लोगों ने इन्कार किया वे उस चीज़ को ध्यान में नहीं लाते जिससे उन्हें सावधान किया गया है।
अलअहक़ाफ़ की आरंभ की ये आयतें, पहले तो इस ओर संकेत करती हैं कि पवित्र क़ुरआन को ईश्वर की ओर से भेजा गया है। उसके बाद वे इस वास्तविकता की ओर संकेत करती हैं कि धरती और आकाश को न्याय के साथ बनाया गया है। इस प्रकार सृष्टि में कोई असंतुलित चीज़ नहीं पाई जाती। जिस प्रकार से इस सृष्टि का एक आरंभ है उसी प्रकार इसका अंत भी है। इसीलिए ईश्वर कहता है कि हमने सृष्टि के अंत के लिए एक समय निर्धारित कर दिया है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि रचयिता ने सृष्टि को एक उद्देश्य के आधार पर बनाया है। निश्चित रूप से एक दिन इस सृष्टि का अंत हो जाएगा। हालांकि यह एक वास्तविकता है कि क़ुरआन सच्ची किताब है और सृष्टि को भी किसी उद्देश्य के आधार पर बनाया गया है किंतु हठधर्मी अनेकेश्वरवादी इस वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते थे।
सूरे की तेरहवीं आयत, भले लोगों की विशेषताओं का वर्णन करती है। इस आयत में कहा गया है कि निश्चित रूप से जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है।" फिर वे उसपर जमे रहे, तो उन्हें न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे। वास्तव में ईमान के समस्त चरणों एवं समस्त सदगुणों का उल्लेख इस आयत में मिलता है।
इस आधार पर भले लोग वे हैं जो आस्था की दृष्टि से तो एकेश्वरवादी हों और व्यवहारिक रूप में धैर्य करने वाले हों। स्वभाविक है कि इस प्रकार के लोगों के मन में न तो भविष्य में घटने वाली घटनाओं के प्रति भय होगा और न ही वे अपने विगत के बारे में दुखी होंगे। वे समस्याओं से बिल्कुल नहीं डरेंगे बल्कि उनका डटकर मुक़ाबला करेंगे। समस्याओं से मुक़ाबला करने की यह विशेषता मोमिनों के भीतर सदैव रहती है।
सूरए अहक़ाफ़ की आयत संख्या 14 में ईश्वर कहता है कि वही जन्नतवाले हैं, वहाँ वे सदैव रहेंगे, उसके बदले में जो वे करते रहे हैं।
इस सूरे की 15वीं आयत, माता-पिता के साथ भलाई से पेश आने की आवश्यकता का उल्लेख करती है। इस कार्य को वह ईश्वर की कृतज्ञता की भूमिका समझती है। सूरए अहक़ाफ़ की आयत संख्या 15 का अनुवाद इस प्रकार हैः हमने मनुष्य के लिए अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने पर बल दिया है। उसकी माँ ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म दिया, और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने की अवधि तीस माह है, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे सम्भाल कि मैं तेरी उस अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञता दिखाऊँ, जो तुने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर की है और यह कि मैं ऐसा अच्छा काम करूँ जो तुझे प्रिय हो और मेरे लिए मेरी संतति में भलाई रख दे। मैं तेरे आगे तौबा करता हूँ औऱ मैं मुसलमान हूँ।"
इस आयत में माता-पिता के अधिकारों को पहचानने की आवश्कयता पर बल दिया गया है। 15वीं आयत में विशेषकर माता के अधिकारों को पहचानने पर बल देखने में मिलता है। इसका मुख्य कारण यह है कि मां अपनी संतान को लंबे समय तक गर्भ में रखती है और जैसे-जैसे भ्रूण बढ़ता जाता है माता की समस्याएं भी बढ़ती जाती हैं। एक समय ऐसा भी आ जाता है कि जब कोख में पल रहे भ्रूण के कारण माता का जीवन बहुत ही पीड़ा दायक हो जाता है। मां इन सभी कठिनाइयों को अपने बच्चे के लिए सहन करती है। अंतिम चरण बच्चे को जन्म देने का है जो वास्तव में बहुत ही कठिन एवं जटिल चरण है।
संतान के पैदा हो जाने के बाद माता के लिए एक अन्य कठिन चरण आरंभ होता है। इस दौरान अपने नवजात की उचित देखभाल के लिए मां रातों को जागती है और अपनी संतान की हर उस आवश्यकता की पूर्ति करती है जिसकी उसे आवश्यकता होती है। पवित्र क़ुरआन के हिसाब से मां अपनी संतान के लिए हर प्रकार का बलिदान करती है। बाद में क़ुरआन ने गर्भकाल और दूध पिलाने का काल 30 महीनों का बताया है। माता इस दौरान संतान के लिए बड़ी-बड़ी क़ुर्बानियां देती है। दुनिया में क़दम रखने के बाद इंसान धीरे-धीरे बढ़ता है और बड़ा होता है। कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन के 40 वर्ष जिस सोच और विचारधारा में व्यतीत करता है फिर उसी शैली पर आगे भी चलता रहता है।
सूरए अहक़ाफ़ की आयत संख्या 16 में ईश्वर कहता है कि ऐसे ही लोगों के अच्छे कर्म हम स्वीकार कर लेंगे जो उन्होंने किए होंगे। ईश्वर, उन लोगों के कर्मों को मानदंड बनाता है और उनके द्वारा किये गए छोटे कर्मों को उच्च श्रेणी के कर्मों में रूप में स्वीकार करता है।
इस प्रकार के लोगों के मुक़ाबले में ऐसे बेईमान लोग भी हैं जो अपने माता-पिता के अधिकारों की ओर कोई ध्यान नहीं देते। सूरे की 21वीं आयत के बाद से कुछ आयतों में हूद और आद जातियों का उल्लेख किया गया है। आद के भाई को याद करो, जबकि उसने अपनी क़ौम के लोगों को अहक़ाफ़ में सावधान किया, और उसके आगे और पीछे भी सावधान करने वाले गुज़र चुके थे कि "अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी न करो। मुझे तुम्हारे बारे में एक बड़े दिन के प्रकोप का भय है।
यहां पर क़ुरआन, आद जाति के बारे में कहता है कि यह जाति, विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करती थी। आद जाति के भीतर मूर्ति पूजन आम हो चुका था। इन लोगों की पथभ्रष्टता के कारण ईश्वर ने उनके बीच अपने नबी हज़रत हूद को भेजा। हज़रत हूद ने लोगों को ईश्वर की ओर आने का निमंत्रण दिया। उन्होंने लोगों से कहा कि वे अनेकेश्वरवाद को त्यागकर केवल ईश्वर की उपासना करें। उसके बाद उन्होंने कहा कि मैं इस बात से डरता हूं कि कहीं तुमपर ईश्वरीय प्रकोप न आन पड़े। इसपर उन लोगों ने हज़रत हूद से कहा कि यदि तुम सच कहते हो तो हमें वह प्रकोप दिखाओ। हज़रत हूद ने उनकी अतार्किक बात के उत्तर में कहा कि वास्तव में ज्ञान तो ईश्वर के ही पास है। उन्होंने कहा कि ईश्वर को भलिभांति ज्ञात है कि किस समय और किस स्थान पर प्रकोप उतारा जाए। उसके बाद उन्होंने कहा कि मेरा कर्तव्य तो यह है कि मुझे जो कुछ बताया गया है उसे तुमको बताऊं। उन्होंने कहा कि मैं तुमको उस गुट की भांति पाता हूं जो पथभ्रष्ट होते हैं। हज़रत हूद ने अपनी जाति को सही रास्ते पर लाने के लिए बहुत प्रयास किये किंतु उनकी उदंडी जाति ने उनकी एक न मानी। उनकी जाति के बहुत ही कम लोग उन पर ईमान लाए जबकि अधिकांश लोग पथभ्रष्टता पर चलते रहे।
अंततः महाप्रकोप का दिन निकट आया। हूद जाति के लोगों ने आकाश में घने बादलों को देखा। जब उन्होंने देखा कि घने बादल उनकी बस्ती की ओर आ रहे हैं तो इससे वे बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा कि इन बादलों से हमारे यहां वर्षा होगी। हालांकि वे काले बादल बरसने वाले नहीं थे बल्कि वे तो उस प्रकोप की भूमिका थी जिसके बारे में उनसे कहा जा चुका था। कुछ ही देर में तेज़ हवाएं चलने लगीं। हर क्षण इन हवाओं की गति बढ़ने लगी। अब वे लोग स्वयं को बचाने के लिए इधर से उधर भागने लगे और अंततः उनका नाश हो गया। इस प्रकार का प्रकोप केवल हूद जाति तक सीमित नहीं था बल्कि ईश्वर हर उद्दंडी जाति को विभिन्न प्रकार के दंड से दंडित करता है। वास्तव में यह ईश्वरीय चेतावनी है कि जो भी जाति या व्यक्ति पापों को नहीं छोड़ता और बुराई करता रहता है उसे निश्चित रूप से ईश्वरीय प्रकोप का सामना करना पड़ सकता है।
सूरए अहक़ाफ़ की 35वीं आयत में धैर्य का आह्वान करते हुए कहा गया है कि केवल तुम ही नहीं हो जिसे अपनी जाति के विरोध और उसकी शत्रुता का सामना करना पड़ा है बल्कि अन्य ईश्वरीय दूतों को भी इसी प्रकार की समस्या का सामना रहा है। ईश्वर के महान दूतों का जीवन, समस्याओं के मुक़ाबले में कड़े प्रतिरोध का साक्षी रहा है। हालांकि उनके काल के अनेकेश्वरवादियों ने उनको परास्त करने के लिए यथासंभव प्रयास किये किंतु वे विफल रहे। जब पैग़म्बरे इस्लाम, ईश्वरीय संदेश को पहुंचाने के उद्देश्य से ताएफ़ नगर पहुंचे तो उनपर इतने पत्थर बरसाए गए कि उनके पैर घायल हो गए। कुछ लोगों ने तो उन्हें बुरा-भला तक कहा। हालांकि इस्लाम के शत्रुओं ने इस्लाम को क्षति पहुंचाने के लिए अथक प्रयास किये किंतु आज इस्लाम पूरे विश्व में फैल चुका है और अज़ान की आवाज़ विश्व के कोने-कोने से सुनाई दे रही है।