Apr ११, २०१६ ०७:१३ Asia/Kolkata

सूरे मोहम्मद पवित्र क़ुरआन का 47वां सूरा है।

 इस सूरे के नाम को इसी सूरे की दूसरी आयत से लिया गया है जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम के नाम का उल्लेख किया गया है। धर्मयुद्ध और इस्लाम के शत्रुओं से जेहाद इस सूरे में चर्चा के महत्वपूर्ण विषय हैं। इस सूरे में 38 आयते हैं और यह मदीना में उतरा है। इस सूरे में जिन विषयों का उल्लेख किया गया है वे इस प्रकार हैं ईमान, कुफ्र, काफिरों और मोमिनों की स्थिति की तुलना, दुश्मनों के विरुद्ध जेहाद, युद्धबंदियों से संबंधित बातें, मित्थ्याचारियों के क्रिया-कलाप, ज़मीन में भ्रमण करना और पहले की जातियों के अंजाम की समीक्षा और काफिरों के साथ सुलह आदि।

 

 

इस सूरे की पहली आयत काफिरों की स्थिति को बयान करती और कहती है जिन लोगों ने ईश्वर का इंकार किया और लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोका ईश्वर उनके कार्यों को अकारथ कर देगा।“

पवित्र कुरआन की यह आयत उन काफिरों और अनेकेश्ववादियों की ओर संकेत करती है जिन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध की आग भढ़काई। वे ख़ुद काफ़िर थे यानी स्वयं महान ईश्वर का इंकार करते थे और दूसरों को भी विभिन्न बहानों से ईश्वर के मार्ग से रोकते थे। उन लोगों ने इस्लाम और मुसलमानों को मिटाने के लिए जो भी कोशिश की महान ईश्वर ने उसे नाकाम बना दिया।

सूरे मोहम्मद की दूसरी आयत का अनुवाद इस प्रकार है” जो लोग ईमान लाये और अच्छे कार्य किये और उस चीज़ पर, जो मोहम्मद पर ईश्वर की ओर से सत्य के साथ उतारी गयी है, ईमान लाये, तो ईश्वर उनके पापों को माफ कर देगा और उनके मामलों को ठीक कर देगा।“

 

 

पवित्र क़ुरआन की यह आयत महान ईश्वर पर ईमान लाने वालों की विशेषता बयान करती है। इस आयत में सबसे पहले व्यापक रूप से ईमान की बात की गयी है और उसके बाद उस चीज़ का उल्लेख किया गया है जो पैग़म्बरे इस्लाम पर नाज़िल हुई है। वास्तव में यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षा- प्रशिक्षा के कार्यक्रम पर बल देती है और यह इस वास्तविकता की सूचक है कि जो कुछ पैग़म्बरे इस्लाम पर नाज़िल हुआ है उस पर ईमान लाये बिना महान ईश्वर पर ईमान पूरा नहीं होगा।

ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि इस आयत में ईमान के उल्लेख के बाद इस बात पर बल दिया गया है कि जो कुछ पैग़म्बरे इस्लाम पर नाज़िल किया है वह सत्य और ईश्वर की ओर से है। यह वास्तव में उस धर्म की स्पष्ट पुष्टि है जो हज़रत मुहम्मद मानवता के लिए लाये हैं। अलबत्ता मोमिनों ने उसे सच पाया तो उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया।

सूरे मोहम्मद की तीसरी आयत में आया है” यह इस कारण है कि काफिरों ने असत्य का अनुसरण किया और मोमिनों ने उस सत्य का अनुसरण किया जो उनके पालनहार की ओर से है।“

 

 

ईमान और कुफ़्र दो अलग अलग मार्ग हैं जो सत्य एवं असत्य से निकलते हैं। मोमिन सत्य का अनुसरण करते हैं जबकि काफिर असत्य का और यही मोमिनों की सफलता एवं काफिरों की पराजय का प्रमाण है।

सूरे मोहम्मद की आरंभिक तीन आयतें मुसलमानों को युद्ध के महत्वपूर्ण आदेश को बयान करने की भूमिका हैं जिसे इसी सूरे की चौथी आयत में बयान किया गया है।

 

 

युद्ध वह विशेष परिस्थिति है जो अत्याचार व अन्याय की प्रतिक्रिया में होता है या बुराई को समाप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। स्पष्ट है कि जब इंसान का सामना अतिक्रमणकारी शत्रु से होता है तो अगर वह उस पर करारा हमला न करे तो उसका शत्रु ही उस पर हावी हो जायेगा। तो समय पर उचित क़दम तार्किक एवं स्वस्थ बुद्धि के अनुसार कार्यवाही है। सूरे मोहम्मद की चौथी आयत शत्रु के साथ दृढ़ता से पेश आने की ओर संकेत करती है और बल देकर कहती है कि इन हमलों को यहां तक जारी रखो कि शत्रु की पंक्ति को तितर-बितर कर दो और उन्हें अच्छी तरह कुचल दो उस स्थिति में शत्रुओं को गिरफ्तार करो और उन्हें जकड़ कर बांधो।“

 

 

इस आयत में युद्ध के एक सिद्धांत की ओर संकेत किया गया है और वह सिद्धांत यह है कि शत्रु के प्रतिरोध को कुचल देने से पहले बंदी बनाने का प्रयास नहीं करना चाहिये। क्योंकि शत्रुओं को गिरफ्तार करने का प्रयास कभी सिपाहियों द्वारा अपने मूल दायित्वों के ही भूल जाने का कारण बनता है। अतः शत्रुओं पर हावी हो जाने और उन्हें कुचल देने के बाद ही बंदी बनाना चाहिये। क्योंकि अगर दुश्मन को छोड़ दिया जाये तो संभव है कि वह अपनी शक्ति को संगठित करके दोबारा हमला आरंभ कर दे। दुश्मनों को बंदी बना लेने के बाद उनकी देखभाल में चौकसी व होशियारी से काम लेना चाहिये ताकि कहीं ऐसा न हो कि वे लापरवाही का दुरुपयोग करके मुसलमानों पर दोबारा हमला कर दें किन्तु शत्रु के सैनिकों को बंदी बनाने के बाद उनके मानवीय अधिकारों पर ध्यान दिया जाना चाहिये। इस आयत में युद्ध समाप्त हो जाने के बाद बंदियों के साथ किये जाने वाले व्यवहार की शैली भी बयान की गयी है। महान ईश्वर कहता है या बंदियों के साथ एहसान करो और कुछ लिए बिना उन्हें स्वतंत्र कर दो और या कुछ लेकर उसके बदले में उन्हें छोड़ दो। इसी प्रकार इस आयत में आगे आया है कि शत्रु के साथ लड़ाई और उनके बंदी बनाये जाने को जारी रहना चाहिये ताकि युद्ध अपने भारी बोझ को ज़मीन पर रख दे। युद्ध से केवल उस स्थिति में रुको जब दुश्मन के अंदर मुक़ाबले की क्षमता समाप्त हो जाये और युद्ध की ज्वाला बुझ जाये। सूरे मोहम्मद की चौथी आयत के अंत और पांचवीं आयत यह शुभ सूचना देती है कि जो लोग सत्य के मार्ग में युद्ध करते हुए मारे जाते हैं ईश्वर कदापि उनके कार्यों को अकारथ नहीं करेगा। ईश्वर उनका मार्गदर्शन करेगा और उनके कार्यों को ठीक करेगा और उन्हें स्वर्ग में जिसकी विशेषता उनके लिए बयान कर दी है, दाखिल करेगा।“

 

 

सूरे मोहम्मद की सातवीं आयत में महान ईश्वर अच्छे व रोचक अंदाज़ में मोमिनों को शत्रुओं से जेहाद के लिए प्रोत्साहित करता और फरमाता है, ’’ हे ईमान लाने वालो अगर ईश्वर की सहायता करोगे तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हारे क़दमों को जमा देगा।“

सत्य के दुश्मनों और अत्याचारियों से युद्ध करना ईमान की सच्ची निशानियों में से है। ईश्वर की सहायता यानी उसके धर्म, उसके पैग़म्बरे और उसकी शिक्षाओं की सहायता करना है। आयत कहती है ईश्वर तुम्हारी सहायता करेगा। यह सहायता विभिन्न रूपों में होती है। इंसान का दिल ईमान के प्रकाश से जगमगा और उसका इरादा मज़बूत हो जाता है। हालात उसके हित में हो जाते हैं उसके प्रयास लाभदायक हो जाते हैं परंतु आयत ईश्वरीय सहायताओं के मध्य क़दम के जमे रहने पर विशेष रूप से बल देती है क्योंकि दुश्मन के मुक़ाबले में डटे रहना सफलता का महत्वपूर्ण कारण है और सिद्धांतिक रूप से युद्ध में सफलता प्राप्त करने वाले वही लोग हैं जो अधिक प्रतिरोध करते और जमे रहते हैं। हां मोमिनों को महान ईश्वर की सहायता प्राप्त होती है। महान ईश्वर के फरिश्ते उनकी सहायता के लिए आते हैं और दिग्भ्रमित होने से उनकी रक्षा करते हैं परंतु काफिरों के साथ ऐसा नहीं है। जब बेईमान लोग गुमराह और विचलित होते हैं तो कोई उनका हाथ नहीं पकड़ता है और वे पतन की खाई में गिर जाते हैं। मोमिनों के कार्यों में बरकरत है परंतु काफिरों के कार्यों का कोई आधार नहीं है और वह शीघ्र ही मिट जाता है।

 

 

 

सूरे मोहम्मद की नवीं आयत में महान ईश्वर काफिरों के पतन को इस प्रकार बयान करता है” यह इस कारण है कि उन्होंने उस चीज़ को नापसंद किया जो ईश्वर ने नाज़िल किया था इसलिए ईश्वर ने उनके कर्मों को अकारथ कर दिया।“

इस संबंध में इस सूरे की 11वीं आयत में इस बिन्दु की ओर संकेत किया गया है कि जो लोग ईमान लाये कठिनाइयों में उनकी सहायता की जाती है और अंततः वे अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं किन्तु काफिरों और उनके कर्मों के अंजाम बुरे हैं। महान ईश्वर कहता है “यह इस कारण है कि ईश्वर उन लोगों का अभिभावक और सहायक है जो ईमान लाये परंतु काफिरों का कोई अभिभावक और सहायक नहीं है।“

जिनका ईमान कमज़ोर होता है और वे रणक्षेत्र छोड़कर भागने के लिए शांति की बात करते हैं सूरे मोहम्मद की 35वीं आयत ऐसे लोगों को याद दिलाती है सुलह अच्छी चीज़ है परंतु अपने उचित स्थान पर। वह सुलह अच्छी है जिसके उद्देश्य उच्च हों और वह मुसलमानों की प्रतिष्ठा की रक्षा करती हो किन्तु अब जबकि तुम्हारी विजय के चिन्ह स्पष्ट हो गये हैं तो तुम क्यों शांति के प्रस्ताव से अपनी विजय को अधूरी छोड़ रहे हो? इस प्रकार की शांति वास्तव में षडयंत्र है जिसका स्रोत आलस्य है।

 

 

आयत कहती है “तो इस समय कदापि आलस्य न करो और दुश्मनों से अपमानजनक शांति के लिए न कहो जबकि तुम श्रेष्ठ हो और ईश्वर तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे कार्यों का पुण्य कम नहीं करेगा।“

महान ईश्वर आयत के अंत में मुसलमानों के मनोबल को मज़बूत करने लिए कहता है कि ईश्वर तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे कर्मों का पुण्य कम नहीं करेगा। जिसके साथ महान ईश्वर हो विजय व सफलता की हर चीज़ उसके पास है और वह कदापि कमज़ोरी से काम नहीं लेगा। सूरे मोहम्मद की यह आयत पवित्र क़ुरआन के सूरे अनफ़ाल की उस आयत से विरोधाभास नहीं रखती है जिसमें महान ईश्वर कहता है अगर वे सुलह व शांति चाहते हैं तो आप भी सुलह चाहें और ईश्वर पर भरोसा करें कि वह सुनने और जानने वाला है।“

इन दोनों आयतों में हर एक विशेष परिस्थिति के लिए है एक समुचित सुलह की ओर संकेत करती है जबकि दूसरी अनुचित सुलह की ओर। एक वह सुलह है जो मुसलमानों के हितों की पूर्ति करती है और दूसरी वह सुलह है जिसकी बात विजय के निकट होने के अवसर आलसी लोग करते हैं।

 

 

 

सूरे मोहम्मद की अंतिम आयत महान ईश्वर के मार्ग में खर्च करने पर बल देती और कहती है” जान लो! कि तुम वही लोग हो जिसे ईश्वर के मार्ग में खर्च करने के लिए आमंत्रित किया जाता है तो तुममें से कुछ कंजूसी करते हैं और जो कंजूसी करेगा वह केवल अपने घाटे में कंजूसी करेगा और ईश्वर आवश्यकतामुक्त है और तुम सब ज़रूरतमंद हो और अगर मुंह मोड़ोगे तो ईश्वर तुम्हारे स्थान पर दूसरे लोगों को लायेगा कि वे तुम्हारे जैसे नहीं होंगे।“ ईश्वर के मार्ग में खर्च करने के बहुत लाभ हैं। वर्गभेद में कमी होगी और समाज में शांति व सुरक्षा स्थापति होगी और द्वेष एवं शत्रुता का स्थान प्रेम ले लेगा। परलोक में महान ईश्वर खर्च करने वालों को बहुत अधिक अनुकंपायें देगा। इस आधार पर अगर कोई इंसान कंजूसी करता है तो वास्तव में वह अपने नुकसान में कंजूसी करता है। आयत में महान ईश्वर कहता है कि वह आवश्यकतामुक्त है और उसे तुम्हारे ख़र्च की कोई ज़रूरत नहीं है यह तुम हो जिसे लोक­- परलोक में उसकी कृपा व दया की आवश्यकता है। सिद्धांतिक रूप से समस्त प्राणियों को उसकी आवश्यकता है और केवल वह महान है जो हर प्रकार की ज़रूरत से आवश्यकतामुक्त है। आयत का अंतिम वाक्य मुसलमानों के लिए चेतावनी है कि वे इस महान नेअमत व विभूति की क़ीमत समझें कि ईश्वर ने उन्हें अपने धर्म का रक्षक बनाया है ताकि वे धर्म के समर्थक और उसके पैग़म्बर के सहायक हों और अगर इससे मुंह फेरेंगे तो यह कार्य वह दूसरे गुट के हवाले कर देगा और वह गुट उनके जैसा नहीं होगा।