Feb ०३, २०१९ १६:१० Asia/Kolkata

अमरीका मध्य पूर्व के विषय पर वार्सा में 13-14 फरवरी को एक सम्मेलन के आयोजन का इरादा रखता है।

वाशिंग्टन का दावा है कि इस सम्मेलन में विश्व के सत्तर देशों को बुलाया गया है लेकिन अमरीका के इस दावे के बावजूद बहुत से देशों ने अभी से इस सम्मेलन के बहिष्कार की घोषणा कर दी है। अमरीकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो ने आरंभ में कहा था कि इस सम्मेलन के आयोजन का उद्देश्य, मध्य पूर्व में स्वतंत्रता व स्थायित्व में वृद्धि है तथा ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा था कि सम्मेलन का मुख्य विषय ईरान होगा। अमरीका को यह उम्मीद थी कि वह इस प्रकार के सम्मेलन द्वारा ईरान के खिलाफ विश्व को एक मंच पर लाने में सफल हो जाएगा। पोम्पियो ने 22 जनवरी को दाओस में वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान अपने भाषण में ईरान को एक बार खतरा और क्षेत्र में अस्थिरता का कारण बताया था और उम्मीद प्रकट की थी कि वाशिंग्टन ईरान के खिलाफ क्षेत्रीय गठबंधन बनाने में सफल होगा।

 

 

अमरीका के इस रुख के बाद पूरी दुनिया में सम्मेलन का विरोध होने लगा जिसकी वजह से अमरीका को सम्मेलन का विषय बदलना पड़ा। अमरीकी विदेशमंत्रालय की ओर से जारी हालिया बयान में कहा गया है कि सम्मेलन का विषय , क्षेत्रीय संकट, आम नागरिकों पर उनके प्रभाव, मिसाइल विकास और अप्रसार, साइबर सुरक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में पैदा होने वाले नये खतरे तथा चरमपंथ पर अंकुश लगाना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीका के प्रभारी राजदूत जोनाथन कोहन ने 22 जनवरी को अपने एक भाषण में दावा किया कि वार्सा सम्मेलन, ईरान की छवि खराब करने या उस पर हमले की भूमिका के लिए नहीं है बल्कि इस सम्मेलन का मक़सद, मध्य पूर्व में सुरक्षा का मज़बूत ढांचा बनाना है। इसी के साथ पोलैंड के राष्ट्रपति ने दाओस सम्मेलन के अवसर पर कहा कि अभी तक उनकी सरकार ने, वार्सा सम्मेलन में ईरान के उपस्थित रहने या न रहने के बारे में कोई फैसला नहीं किया है। यह ऐसी में है कि जब इससे पहले पोलैंड के अधिकारियों ने कहा था कि वह वार्सा सम्मेलन में भाग लेने के लिए ईरान को आमंत्रित नहीं करेंगे।

 

 

कुछ टीकाकारों का कहना है कि अमरीकी अधिकारियों ने वार्सा सम्मेलन का स्वागत न होने की वजह से इसके विषय में बदलाव का फैसला किया है। इस से पहले युरोपीय मीडिया में यह खबरें थीं कि बहुत से युरोपीय देशों के विदेशमंत्री इस सम्मेललन में भाग नहीं लेंगे। इसके साथ ही यह भी खबरें थीं कि बहुत से युरोपीय देश, निचले स्तर पर इस सम्मेलन में भाग लेने का इरादा रखते हैं। इस सम्मेलन में भाग लेने पर तत्परता की घोषणा करने वाले विदेशमंत्रियों के बारे में यह जानना रोचक होगा कि उन सब में बहुत मतभेद पाए जाते हैं इस लिए यह बहुत मुश्किल लगता है कि ईरान के खिलाफ वह लोग  एक मंच पर एकजुटता दिखाएं। ईरान के विदेशमंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने पोलैंड और वार्सा सम्मेलन में भाग लेने वालों को याद दिलाया है कि जिन लोगों ने ईरान के खिलाफ हालिया अमरीकी ड्रामे में भाग लिया था वह या तो मर चुके हैं या अपमानित होकर एकांतवास में चले गये हैं लेकिन ईरान हमेशा से अधिक शक्तिशाली बना हुआ है।

 

 

ऐसा लगता है कि अमरीका वार्सा सम्मेलन द्वारा कई उद्देश्यों की पूर्ति के प्रयास में है। एक मक़सद तो युरोपीय संघ में फूट पैदा करना है। ट्रम्प सरकार युरोपीय संघ के पुराने और नये सदस्यों में दूरी पैदा करने का प्रयास कर रहा है। यही वजह है कि वाशिंग्टन ने इस सम्मेलन के लिए पोलैंड का चयन किया है। पोलैंड युरोपीय संघ की नीतियों का आलोचक देश समझा जाता है इसके साथ ही वह अमरीकी नीतियों को प्राथमिकता देता है। इसी लिए युरोपीय संघ इस मामले पर संवेदनशील भी है। इसके अलावा यह बैठक, जेसीपीओए की सुरक्षा के युरोपीय संघ के प्रयासों के भी विपरीत है यही वजह कि युरोपीय संघ में विदेश नीतियों की प्रभारी फेड्रीका मोगरेनी ने बल दिया है कि वह वार्सा सम्मेलन में भाग नहीं लेंगी।

 

 

युरोपीय संघ ही नहीं बल्कि रूस ने भी वार्सा सम्मेलन में भाग लेने के लिए पोलैंड के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया है। पोलैंड के विदेश मंत्री का कहना है कि रूस मध्य पूर्व के परिवर्तनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और मास्को की उपस्थिति के बिना वार्सा सम्मेलन में किसी सहमति की उम्मीद नहीं रखी जा सकती। रूस की नज़र में वर्तमान समय में वाशिंग्टन और तेलअबीव का उद्देश्य, यह है कि सम्मेलन, ईरान विरोधी रहे ताकि वह अमरीका के खिलाफ प्रतिबंधों के साथ ही साथ प्रचारिक व राजनीतिक युद्ध में भी ईरान पर दबाव बनाए। रूसी विदेशमंत्री सरगई लावरोव का कहना है कि मास्को ने , अमरीका की मेज़बानी में वार्सा सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण प्राप्त किया है किंतु उसे संदेह है कि इस प्रकार का सम्मेलन क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान में कोई सहायता देने की क्षमता रखता है।

 

 

 

वार्सा सम्मेलन से अमरीका का एक अन्य उद्देश्य, जेसीपीओए को नुकसान पहुंचाना है हालांकि इस समझौते की संयुक्त राष्ट्र संघ ने पुष्टि की है और ईरान, रूस , चीन और युरोपीय संघ इस समझौते को सुरक्षित रखना चाहते हैं। रूस ने भी इस वास्तविकता की ओर संकेत किया है। मास्को की नज़र में वार्सा सम्मेलन, जेसीपीओए का विरोधी है। साक्ष्यों से पता चलता है कि विश्व की बड़ी शक्तियां विशेषकर चार धन एक गुट के सदस्य और इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र इस संदर्भ में नकारत्मक रुख अपना रहे हैं और जेसीपीओए के खिलाफ वाशिंग्टन की  इस राह पर चलने पर तैयार नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रवक्ता के सहायक, फरहान हक़ ने इस ओर संकेत के साथ कि एंटोनियो मोटेरस ईरान को क्षेत्र में महत्वपूर्ण व साथर्क देश समझते हैं , कहा कि ईरान के बारे में विशेष रूप से जेसीपीओए पर हमारा रुख यह है कि उसे एक महत्वपूर्ण कूटनैतिक उपलब्धि के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

 

 

वार्सा सम्मेलन का एक अन्य उद्देश्य वाशिंग्टन की क्षेत्रीय योजनाओं को लागू करने की कोशिश भी है। अमरीका , इस सम्मेलन में मध्य पूर्व के सब से महत्वूपूर्ण मुद्दे अर्थात फिलिस्तीन के विषय को पेश करने के बजाए इसे वाशिंग्टन की विदेश नीतियों के वर्णन और उसके दायरे में विषयों को पेश करने का  मंच बनाने का इरादा रखता है। वास्तव में अमरीका इस वार्ता सम्मेलन को अरब इस्राईल सम्मेलन में बदलने  और फिलिस्तीन के मुद्दे को किनारे लगाने और ईरान को संकट का मुख्य कारण बना कर पेश करने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही वह डील आफ सेन्चुरी को आगे बढ़ा कर फिलिस्तीन के मुद्दे को सिरे से ही खत्म करना चाहता है और उसे यह लगता है कि सम्मेलन, अरबों को इस डील पर तैयार करने का अच्छा अवसर प्रदान करेगा।

 

 

वर्तमान समय में वाशिंग्टन और तेलअबीव का अब यह प्रयास है कि कम से कम वार्सा सम्मेलन के घोषणापत्र में ही ईरान का विरोध हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में रूसी  प्रतिनिधि वासीली नेन्ज़िया का कहना है कि वार्ता सम्मेलन क्षेत्र के लिए विनाशक है। वास्तव में अमरीका का यह प्रयास है कि ईरान पर हर ओर से दबाव डाला जाए और ईरान के खिलाफ विश्व स्तर पर एकजुटता पैदा की जाए ताकि ईरान को सीरिया से निकालने और अपनी नीतियों में परिवर्तन पर तैयार किया जाए । इस उद्देश्य पर जॅान बोल्टन जैसे कई अमरीकी अधिकारी पहले भी बल दे चुके हैं। वास्तव में क्षेत्रीय स्तर पर विशेषकर , इराक़, यमन , सीरिया और लेबनान में ईरान की महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका की वजह से अमरीका , उसके अरब घटक और इस्राईल , चिंतित हैं विशेष कर इस लिए भी कि ईरान की नीतियों को बदलने के लिए अब तक उनके हर प्रकार के दबाव के परिणाम में उन्हें नाकामी ही मिली है। गुट चार धन एक सहित विश्व के महत्वपूर्ण देशों की ओर से वार्ता सम्मेलन का  विरोध उनके लिए एक अन्य अघात है। इस प्रकार से ईरान की भूमिका को नकारात्मक दर्शाने के लिए अमरीका के बड़े बड़े दावों और आरोपों के बावजूद रूस, चीन के साथ ही साथ वाशिंग्टन के युरोपीय घटक भी और युरोप संघ तक ईरान के बारे में अमरीका की द्वेषपूर्ण नीतियों और षडयंत्रों को अच्छी तरह से समझते हैं। यह निश्चित रूप से ईरान की एक और बड़ी कामयाबी है। (Q.A.)