Apr ११, २०१६ ०७:४१ Asia/Kolkata

होजोरात सूरे में 18 आयतें हैं और यह सूरा मदीने में नाज़िल हुआ था।

 इस सूरे में पैग़म्बरे इस्लाम और समाज के लोगों के एक दूसरे के साथ व्यवहार जैसे कुछ नैतिक विषयों को बयान किया गया है। इस सूरे का नाम नैतिक व्यवहार और शिष्टाचार रखा जा सकता है। इस सूरे में जिन विषयों की चर्चा की गयी है वे इस प्रकार हैं पैग़म्बरे इस्लाम के साथ शिष्टाचारिक व्यवहार, उनकी मौजूदगी में शालीनता का ध्यान रखना, कुछ उन सामाजिक शिष्टाचारों को ध्यान रखना जो समाज में प्रेम, भाईचारा और मेल-मिलाप का कारण बनते हैं जबकि उनकी अनदेखी समाज में भ्रांति और मित्थ्याचार का कारण है, मुसलमानों के मामलों में सुधार और उनके बीच सुलह-सफाई कराने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाना, एक दूसरे का सम्मान करना, एक दूसरे का उपहास करने से बचना, एक दूसरे के बारे में ग़लत सोच से दूर रहना, एक दूसरे की बुराई व दोष की खोज में न रहना, महान ईश्वर के सामिप्य का मापदंड दंड तक़वा, ईमान पर अमल के साथ बल देना, इस्लाम स्वीकार करने के कारण एहसान न जताना और ब्रह्मांड के समस्त रहस्यों और इंसानों के कर्मों के प्रति महान ईश्वर का ज्ञान।

 

महान ईश्वर सूरे होजोरात की पहली आयत में कहता है हे ईमान लाने वालों ईश्वर और उसके पैग़म्बरे से आगे न बढ़ो और ईश्वर से डरो कि ईश्वर सुनने और जानने वाला है।“

 

अपने कार्यों में ईश्वर और उसके पैग़म्बर से आगे न बढ़ने का तात्पर्य यह है कि वे समस्त कार्यों में ईश्वर और उसके पैग़म्बर को आगे रखें। अनुसरणकर्ताओं का मूल सिद्धांत यह होना चाहिये कि वे नेताओं विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम जैसे महान मार्गदर्शक से किसी भी काम में आगे न बढ़ें चाहे बात हो या कर्म या कोई और कार्य। अलबत्ता इसका यह मतलब नहीं है कि अगर कोई विचार या प्रस्ताव हो तो वे ईश्वरीय मार्गदर्शकों के सामने न रखें बल्कि उद्देश्य यह है कि जब तक वे किसी कार्य की पुष्टि न कर दें उससे पहले उसे अंजाम न दें।

पैग़म्बरे इस्लाम की जीवनी में ऐसे अवसर दिखाई देते हैं जब कुछ लोग उनके आदेश से पहले ही कार्य को अंजाम दे देते या उनके आदेश से पीछे रह जाते थे। एक बार पवित्र रमज़ान महीने की बात है कि पैग़म्बरे इस्लाम मक्का पर विजय करने के लिए चल पड़े। रास्ते में एक स्थान पर काफी लोग पैग़म्बरे इस्लाम के साथ थे। कुछ लोग सवारी से थे जबकि कुछ पैदल। एक स्थान पर पैग़म्बरे इस्लाम ने अपना रोज़ा खोला। जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम के साथ थे उन्होंने भी रोज़ा खोला परंतु उनमें से कुछ लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम का अनुसरण करने के बजाये अपना रोज़ा ही नहीं खोला और अपने रोज़े को बाक़ी रखा। पैग़म्बरे इस्लाम ने उन लोगों को पापी कहा।

 

 

इसके बाद की आयत दूसरे आदेश की ओर संकेत करते हुए कहती है हे ईमान लाने वालो! अपनी आवाज़ों को पैग़म्बर की आवाज़ से ऊंची न करो और जिस तरह से तुमसे से कुछ एक दूसरे के साथ ऊंची आवाज़ में बात करते हैं उस तरह से पैग़म्बर से बात करो कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कर्म व्यर्थ हो जायें और तुम्हें इसका पता भी न चले।“

इस आयत के अनुसार यह बात उचित व सही नहीं है कि कोई पैग़म्बरे इस्लाम की आवाज़ से ज़्यादा अपनी आवाज़ को ऊंची करे और किसी को पैग़म्बरे इस्लाम से ऊंची आवाज़ में बात नहीं करनी चाहिये क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में इस प्रकार की बात करना एक प्रकार से ग़ैर शिष्टाचार है।

 

 

सूरे होजोरात की तीसरी आयत उन लोगों के कार्यों के पुण्य को बयान करती है जो इस ईश्वरीय आदेश का पालन करते हैं और पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में शिष्टाचार का ध्यान रखते हैं। आयत कहती है जो लोग पैग़म्बर के पास अपनी आवाज़ों को नीचा कर लेते हैं ये वही लोग हैं जिनके दिलों की परीक्षा ईश्वर ने परहेज़ व सदाचारिता के लिए ले ली है। उनके लिए क्षमा और महा प्रतिदान है।“ स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम को महान ईश्वर ने भेजा है और वे उसके संदेशक हैं। पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में अशिष्टता महान ईश्वर की अशिष्टता है। पवित्र क़ुरआन पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में शिष्टाचार को ध्यान में रखे जाने को दिल की पवित्रता और तक़वा अर्थात सदाचारिता को स्वीकार करने हेतु तत्परता का चिन्ह मानता है। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में शिष्टाचार का ध्यान रखना पापों के क्षमा होने और महा प्रतिदान का कारण है। सूरे होजोरात की चौथी आयत उन लोगों की अज्ञानता की ओर संकेत करती है जो इस ईश्वरीय आदेश की अनदेखी करते हैं। इस आयत में महान ईश्वर कहता है जो लोग आपको ऊंची आवाज़ में बुलाते हैं उनमें से अधिकांश नहीं समझते हैं। हुजरा का अर्थ कमरा होता है और होजोरात इसका बहुवचन है यानी बहुत सारे कमरे। इस आयत में उन क़मरों की ओर संकेत किया गया है जो मदीने में मस्जिदुन्नबी के किनारे- किनारे बने थे और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन उसमें रहते थे।

 

जब अज्ञानी लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम से कोई काम होता था तो वे इन कमरों के पीछे से ऊंची आवाज़ में पैग़म्बरे इस्लाम का नाम लेकर बुलाते थे। इस आयत ने मुसलमानों को इस अप्रिय कार्य से मना किया है। क्योंकि यह कार्य पैग़म्बरे इस्लाम के महान स्थान के दृष्टिगत उचित नहीं है। सूरे होजोरात की पांचवी आयत इस बहस को पूरा करते हुए कहती है अगर वे धैर्य करते यहां तक कि आप स्वयं उनके पास आते तो उनके लिए बेहतर था और ईश्वर माफ़ करने वाला और कृपालु है।“

स्पष्ट है कि पैग़म्बरे की सेवा में शिष्टाचार का ध्यान और उनका सम्मान और इस प्रकार की स्थिति में धैर्य महान ईश्वर की कृपा और महा पुण्य का कारण है। संक्षेप में यह है कि ईश्वरीय धर्म इस्लाम शिष्टाचार और दूसरे के साथ सम्मान से पेश आने को बहुत महत्व देता है और ये बातें इस्लाम धर्म की शिक्षाओं में शामिल हैं। पैग़म्बरे इस्लाम और इस्लाम की महान हस्तियों का जीवन और दूसरों के साथ उनका व्यवहार शिष्टाचार से भरा पड़ा था।

 

 

चूंकि समाज में प्रेम की भावना को प्रचलित करना पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं में से है इसलिए वह मोमिनों को एक दूसरे का भाई कहता है। इस आधार पर लोगों को चाहिये कि वे अपने भाइयों की ग़लतियों को माफ़ कर दें, समस्याओं व कठिनाइयों में एक दूसरे के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें, वादों एवं अपने वचनों का ध्यान रखें, दूसरों के लिए भी वही पसंद करें जो अपने लिए पसंद करते हैं। कुल मिलाकर कहना चाहिये कि मोमिनों के मध्य शांति, सुरक्षा और बंधुत्व का वातावरण होना चाहिये।

सूरे होजोरात की 11वीं और 12वीं आयतें सामाजिक व्यवहार के संबंध में कुछ बिन्दुओं को पेश करती हैं। इन आयतों में महान ईश्वर कहता है एक गुट का दूसरे गुट का उपहास नहीं उड़ाना चाहिये हे ईमान लाने वालों शायद वे लोग तुमसे बेहतर हों और महिलाओं को भी दूसरी महिलाओं का मज़ाक़ नहीं उड़ाना चाहिये शायद वे इनसे बेहतर हों और एक दूसरे की टोह में मत रहो और एक दूसरे को बुरे नामों से याद न करो।“

यहां पर पवित्र क़ुरआन मोमिनों को चेतावनी देता है कि इस अप्रिय कार्य से दूरी करें क्योंकि दूसरों के उपहास उड़ाने का स्रोत वही स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने और अहं की भावना है जो पूरे इतिहास में बहुत से मतभेदों और रक्त रंजित हिंसाओं का कारण रही है।

 

 

खेद के साथ कहना पड़ता है कि समाज में कुछ लोग होते हैं जो दूसरों को बुरे नामों व उपाधियों से बुलाते व याद करते हैं और उन्हें हीन भावना से देखते हैं और कभी -कभी इस प्रकार के नामों व उपाधियों से दूसरों से प्रतिशोध लेते हैं। उसका एक उदाहरण यह है कि अतीत में किसी ने कोई बुरा कार्य किया हो और उसके बाद उसने प्रायश्चित कर लिया हो तो वह पवित्र हो जाता है पर समाज के कुछ लोग इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसी उपाधि देते हैं जिससे उसका अतीत याद आ जाता है। ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने इस प्रकार के कार्य को बुरा कार्य कहा है और बड़ी कड़ाई से उससे मना किया है और जिस नाम या उपाधि का अर्थ अच्छा न हो वह मुसलमान को हीन और तुच्छ दृष्टि से देखने का कारण बनता है और इस्लाम इस कार्य को बिल्कुल पसंद नहीं करता है। इसी कारण वह आयत के अंत में कहता है ईमान के बाद मोमिन का बुरा नाम रखना बुरा है और जो लोग अपने कार्यों से तौबा न करें तो वे स्वयं अत्याचारी हैं। इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि दूसरों की प्रतिष्ठा और माल भी दूसरों की जान की भांति प्रतिष्ठित है और उसे हर प्रकार के अतिक्रमण से सुरक्षित रहना चाहिये। यह स्वयं समाज के लिए सुरक्षा को उपहार स्वरूप लाता है।

सूरे होजोरात की 12वीं आयत दूसरों के बारे में अच्छा विचार रखने, दूसरों के मामलों की टोह में न रहने और ग़ीबत अर्थात दूसरों की बुराई करने जैसे कुछ दूसरे शिष्टाचारिक मतभेदों की ओर संकेत करती है। आयत कहती है हे ईमान लाने वालो बहुत सी सोचों से बचो क्योंकि कुछ विचार पाप हैं और दूसरों की टोह में न रहो।“

 

 

दूसरों के बारे में बुरे विचारों से परहेज़ करना तार्किक आदेश है जो सामाजिक संबंधों की पवित्रता का कारण है।

वास्तव में बुरा विचार दूसरों के गोपनीय मामलों की टोह लेने का कारण बनता है और इस्लाम इस प्रकार के बुरे कार्य की अनुमति नहीं देता है। कुल मिलाकर इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि लोगों को अपने व्यक्तिगत जीवन में पूर्ण सुरक्षा होनी चाहिये। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यदि हर आदमी स्वयं को दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में प्रवेश की अनुमति दे और उनकी टोह में रहे तो दूसरों की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जायेगी और अशांत एवं तनाव से भरा वातावरण वजूद में आयेगा। सूरे होजोरात की 12वीं आगे कहती है एक दूसरे की बुराई न करो क्या तुममें से कोई अपने मरे हुए भाई का मांस खाना पसंद करेगा? इस कार्य से तुम्हें घिन्न आयेगी। ईश्वर से डरो कि वह तौबा अर्थात प्रायश्चित स्वीकार करने वाला और कृपालु है।“

 

 

एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान की बुराई करना और उसके रहस्यों का पर्दाफाश कर देना उसके मृत शरीर का मांस खाने जैसा है।

महान ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में दूसरों की बुराई से रोकने के लिए जो उपमा दी है वह इस बात की सूचक है कि दूसरों की बुराई अत्यंत बुरा कार्य है और यह इतना बुरा कार्य है जिसे करना कोई भी प्रतिष्ठित इंसान पसंद नहीं करेगा। इसी प्रकार इस्लाम समाज की एकता व एकजुटता को बहुत महत्व देता है और वह हर उस कार्य को पसंद करता है जो सामाजिक एकता का कारण बने और वह हर उस कार्य की भर्त्सना करता है जो समाज की एकता व एकजुटता में कमज़ोरी का कारण बनता है। ग़ीबत अर्थात दूसरों की बुराई समाज की एकता व एकजुटता को क्षति पहुंचाती है। क्योंकि वह लोगों के एक दूसरे के बारे में भ्रांति का कारण बनती है, एक दूसरे से विश्वास उठ जाता है और एक दूसरे के दिलों में द्वेष का बीज उग जाता है। इस प्रकार सामाजिक संबंध कमज़ोर हो जाते हैं।

 

 

सूरे होजोरात की 13वीं आयत इंसानों के मूल्य के मापदंड को बयान करती है। इस आयत में महान ईश्वर कहता है” हे लोगो! हमने तुम्हें एक पुरुष और स्त्री से पैदा किया है और तुम्हारी जातियां और कबीले बनाये ताकि तुम एक दूसरे को पहचान सको। तुमसे सबसे अधिक ईश्वर के निकट प्रतिष्ठित वह है जिसका तक़वा अर्थात ईश्वर से भय सबसे अधिक हो। ईश्वर जानने और ख़बर रखने वाला है।“

पवित्र कुरआन की इस आयत के अनुसार जाति या क़बीला श्रेष्ठता का मापदंड नहीं है और केवल ईश्वर का भय व तक़वा ही श्रेष्ठता का मापदंड है।