ईश्वरीय वाणी-६९
सूरे ज़ारियात पवित्र क़ुरआन का 51वां सूरा है।
यह मक्के में नाज़िल हुआ है और इसमें 60 आयतें हैं। इस सूरे में जिन विषयों के बारे में चर्चा की गयी है वे इस प्रकार हैं। प्रलय, काफिरों की भर्त्सना, सदाचारियों का भविष्य, सृष्टि में एकेश्वरवाद की निशानियां, उन फरिश्तों की कहानी जो हज़रत इब्राहीम के मेहमान बने थे, हज़रत लूत की जाति का अंत, हज़रत मूसा और हज़रत नूह की जातियों की कहानी की ओर संक्षिप्त संकेत, इसी प्रकार आद और समूद जातियों की कहानी और उनका अंत, हठधर्मी जातियों की ओर से अतीत के पैग़म्बरों का विरोध, पैग़म्बरों की नसीहतें और सृष्टि की रचना के उद्देश्य।
सूरे ज़ारियात की 1 से 6 तक की आयतों का अनुवाद इस प्रकार है उन हवाओं की शपथ जो बादलों को चलाती हैं, उन बादलों की शपथ जो अपने साथ भारी बोझ वहन करते हैं, उन नौकाओं की शपथ जो पानी में सरलता से चलती हैं, और उन फरिश्तों की सौगन्द जो कार्यों का बंटवारा करते हैं और जो तुम्से वादा किया गया है। निश्चित रूप से सच्चा है और निःसंदेह प्रलय का दिन आकर रहेगा।“
पवित्र क़ुरआन के इस सूरे का आरंभ कई चीज़ों की शपथ खाने के साथ होता है। ऐसी शपथें जो अर्थपूर्ण, विचार योग्य और ऐसी जानकारी प्रदान करने वाली हैं जो ब्रह्मांड में महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की सार्वजनिक युक्तियों की सूचक हैं। इन शपथों में जिन चीज़ों को बयान किया गया है वे बहुत ही सूक्ष्मता व सुन्दरता के साथ प्रलय के विषय की ओर संकेत करती हैं। वास्तव में पवित्र क़ुरआन की जो शपथें हैं वे इस आसमानी किताब के एक चमत्कारिक और सुन्दरतम आयाम हैं। महान ईश्वर इन शपथों के माध्यम से बंदों का ध्यान अपनी शक्ति और महानता के चिन्हों की ओर खींचता है।
महान ईश्वर ने इस सूरे के आरंभ में जो शपथें खाई हैं उनका इसके अंत व परिणाम से संबंध स्पष्ट है। क्योंकि बादलों का चलना और वर्षा का होना और परिणाम स्वरूप मुर्दा ज़मीन का ज़िन्दा हो जाना स्वयं इस दुनिया में प्रलय का एक उदाहरण व दृश्य है। सिद्धांतिक रूप से प्रलय उसी तरह संभव है जिस तरह मुर्दा ज़मीन वर्षा के पानी से जीवित हो जाती है और यह वह चीज़ है जिसकी ओर पवित्र क़ुरआन में बारम्बार संकेत किया गया है।
दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि पवित्र क़ुरआन में महान ईश्वर ने जिन चीज़ों की सौगन्द खाई है वे उस तथ्य के महत्व की सूचक हैं जो इन शपथों के बाद बयान किये गये हैं। इन शपथों के बाद महान ईश्वर फरमाता है जिस चीज़ का तुम्से वादा किया गया है निश्चित रूप से वह सच्चा है। महान ईश्वर आगे कहता है निःसंदेह प्रलय का दिन आने वाला है। यहां पर जो यह कहा गया है कि जो वादा किया गया है वह होकर रहेगा उससे तात्पर्य प्रलय, हिसाब- किताब, प्रतिदान, दंड और स्वर्ग एवं नरक है।
सूरे ज़ारियात की 20वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” विश्वास करने वालों के लिए ज़मीन में निशानियां हैं। पवित्र क़ुरआन सूरे ज़ारियात की 20वीं आयत के बाद की आयतों में ज़मीन और स्वयं इंसान के भीतर महान ईश्वर की कुछ निशानियों की ओर संकेत करता है और वास्तव में ज़मीन में महान ईश्वर के ज्ञान एवं शक्ति के अनगिनत चिन्ह मौजूद हैं।
ज़मीन का व्यास व आकार, सूरज से उसकी दूरी, उसका अपना और सूरज का चक्कर लगाना, गुरूत्वाकर्षण शक्ति जो उनके चलने से अस्तित्व में आती है, पूर्णरूप से एक दूसरे से समन्वित एवं संतुलित है। यह कार्य इतना सूक्ष्म व सटीक है जिसके कारण ज़मीन रहने योग्य हुई है जबकि ज़मीन और सूरज के मध्य जो दूरी है अगर उसे थोड़ा परिवर्तित कर दिया जाये तो ज़मीन पर रहने की जो संभावना है वह समाप्त हो जायेगी। निः संदेह यह महान ईश्वर की असीम शक्ति का एक बड़ा चिन्ह है।
ज़मीन जिस चीज़ से बनी है और उसमें जीवन के लिए जो चीज़ें व स्रोत मौजूद हैं वे सबके सब महान ईश्वर की तत्वदर्शिता के चिन्ह हैं। पहाड़, जंगल, मैदान, समुद्र, नदियां, पानी और सोते आदि इनमें से हर एक ज़मीन पर जीवन के लिए प्रभावी व महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। इसी प्रकार हज़ारों प्रकार की वनस्पतियां, कीड़े- मकोड़े और जीव-जन्तु महान ईश्वर की असीम शक्ति के अन्य चिन्ह हैं। यहां यह बात विचार योग्य है कि बहुत से जानवर एक ही चीज़ खाते हैं परंतु उनकी विशेषताएं भिन्न होती हैं। उसी तरह वनस्तियों का मुख्य भोजन पानी है किन्तु उनकी विशेषताएं एक दूसरे से भिन्न होती हैं।
सूरे ज़ारियात की 21वीं आयत में महान ईश्वर कहता है कि स्वयं तुम्हारे अंदर भी निशानियां मौजूद हैं क्या तुम उन्हें नहीं देखते? यह बात आश्चर्य की है कि इंसान समस्त होश, बोध, योग्यता और रचनात्मकता के साथ आरंभ में मूल्यहीन नुत्फ़े व वीर्य के रूप में होता है परंतु जैसे ही वह मां के गर्भ में जाता है बड़ी तेज़ी से बढ़ता है और कुछ ही महीनों में वह पूर्ण इंसान बन जाता है।
कोशिकाएं इंसान के शरीर का सबसे न्यूनतम अंग है और उनकी बनावट हतप्रभ कर देने वाली है और वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों का कहना है कि उनके भीतर एक औदयोगिक नगर के बराबर संरचनाएं मौजूद हैं। एक पर्यावरण विशेषज्ञ कहता है यह महानगर यानी कोशिकाओं का महानगर हज़ारों कारखानों, पाइप सिस्टम, नियंत्रण कक्ष और अत्यधिक व विभिन्न प्रतिष्ठानों के साथ आश्चर्यजनक है। अगर हम किसी ऐसे प्रतिष्ठान का निर्माण करना चाहें जो वही कार्य करे तो इसके लिए हमें विभिन्न इमारतों और जटिल मशीनों का निर्माण करना पड़ेगा तब कहीं जाकर हमारा दृष्टिगत लक्ष्य प्राप्त होगा। रोचक बात यह है कि सृष्टि की मशीन में इतनी सारी चीज़ों को इतनी छोटी सी जगह में रखा गया है।
दिल, फेफड़ा और गुर्दा जैसे इंसान के शरीर के ऐसे अंग हैं जिनके अंदर हज़ारों किलोमीटर लंबी रगें व धमनियां हैं और कुछ तो इतनी सूक्ष्म हैं कि आंखों से दिखाई भी नहीं देती हैं और उनके अंदर से रक्त का संचार होता है और वे अरबों कोशिकाओं के भोजन की अपूर्ति करती हैं। इसी प्रकार आंख और कान जैसे शरीर के विभिन्न अंग महान ईश्वर की असीम शक्ति के चिन्ह हैं।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ज़िन्दगी का जो रहस्य है अब तक वह स्पष्ट नहीं हो सका है। यहां पर है कि इंसान अनियंत्रित होकर महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का गुणगान करने लगता है और उसकी महानता के समक्ष नतमस्तक हो जाता है।
सूरे ज़ारियात की 24वीं और 25वीं आयतें पैग़म्बरों और उनकी जातियों के अतीत को बयान करती हैं। सबसे पहले उन मेहमान फरिश्तों की चर्चा करती हैं जो हज़रत लूत की जाति के नाश के लिए इंसान के भेष में हज़रत इब्राहीम के पास आये थे। आयत कहती है” क्या तुम्हारे पास इब्राहीम के प्रतिष्ठित मेहमानों की भी ख़बर पहुंची है कि जब वे लोग उनके पास आये। जब वे लोग उनके पास गये तो सलाम किया इब्राहीम ने भी सलाम किया देखा तो अपरिचित लोग हैं।“
एक बार हज़रत इब्राहीम के पास अपरिचित मेहमान पहुंचे। हज़रत इब्राहीम उनके आतिथ्य सत्कार के लिए अपनी पत्नी के पास पहुंचे और मोटे बछ़ड़े का मांस भूनकर और भोजन दोनों उनके पास ले गये परंतु हज़रत इब्राहीम ने आश्चर्य से देखा कि वे खाने की ओर हाथ ही नहीं बढ़ा रहे हैं। इस पर हज़रत इब्राहीम ने कहा क्या आप लोग खाना नहीं खाते हैं? हज़रत इब्राहीम इस स्थिति से दिल ही दिल में डरे। तो मेहमान फरिश्तों ने उनसे कहा डरें नहीं और उन लोगों ने उन्हें बेटे के जन्म की शुभ सूचना दी। उस समय हज़रत इब्राहीम की पत्नी सामने आई और खुशी से वह चिल्ला रही थीं और उन्होंने अपने चेहरे पर तमाचा मारा और कहा मैं एक बूढ़ी और बांझ महिला हूं क्या इसके बावजूद मुझे बेटा होगा? उस समय फरिश्तों ने कहा ईश्वर ने इसी प्रकार कहा है वह तत्वदर्शी और जानकार है। जब ईश्वर किसी चीज़ का इरादा कर लेता है तो निःसंदेह वह होकर रहता है।
हज़रत इब्राहीम ने मेहमानों की स्थिति से समझ लिया कि वे केवल बेटे की शुभ सूचना देने के लिए उनके पास आये हैं। इसी तरह हज़रत इब्राहीम फरिश्तों के व्यवहार से समझ गये थे कि शायद वे किसी महत्वपूर्ण काम से आये हैं। उन्होंने कहा हे ईश्वरीय दूतो आपका क्या कार्य है? उन लोगों ने कहा हमें अपराधी व पापी जाति की ओर भेजा गया है। उन फरिश्तों का संकेत हज़रत लूत की जाति की ओर था जो अनेकेश्वादी और अनेक प्रकार की बुराइयों में लिप्त थी परंतु उनका सबसे बुरा व स्पष्ट पाप अप्राकृतिक यौन संबंध था जो बहुत ही बुरा व घृणित कार्य था। फरिश्तों ने हज़रत इब्राहीम से आगे कहा हमें पत्थरों से बारिश करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है और इस माध्यम से हम उनका नाश कर देंगे और सीमा से बढ़ जाने वालों के लिए तुम्हारे पालनहार की ओर से निशानी लगा दीये गयी हैं। उसके बाद आयत कहती है तो हमने वहां पर जो मोमिन थे उन्हें वहां से निकाल लिया और वहां तो हमें एक घर के अलावा किसी मुसलमान का घर ही नहीं मिला।“
इस प्रकार हज़रत लूत की पत्नी के सिवा उनके परिजनों को बचा लिया गया। हज़रत लूत की जाति के समस्त लोगों को ज़मीन में उलट- पलट दिया गया और उसके बाद उन पर पत्थरों की वर्षा कर दी गयी और उनका लेशमात्र चिन्ह भी बाक़ी नहीं रहा। महान ईश्वर ने उन्हें आने वाले लोगों के लिए सीख बना दी। सूरे ज़ारियात की ३७वीं आयत में महान ईश्वर कहता है वहां पर हमने उन लोगों के लिए निशानी छोड़ दी जो दर्दनाक दंड से डरते हैं।“
हर इंसान के दिमाग़ में जो प्रश्न आता है वह यह है कि हमें किस लिए पैदा किया गया है? इस दुनिया में आने का हमारा लक्ष्य क्या है? सूरे ज़ारियात की 56वीं आयत इस प्रश्न का उत्तर देती है” हमने इंसान और जिन्नात को पैदा ही नहीं किया किन्तु यह कि वे मेरी उपासना करें।“
पवित्र क़ुरआन की इस आयत के अनुसार हम सबको महान ईश्वर की उपासना के लिए पैदा किया गया है।
उपासना से तात्पर्य क्या है? उपासना से तात्पर्य पूरी निष्ठा से महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होना है। उपासना इंसान की सृष्टि की रचना का अंतिम उद्देश्य है और इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए महान ईश्वर ने उसकी परीक्षा ली है और ज्ञान व जानकारी प्रदान की है। सृष्टि वास्तव में महान परिपूर्णता का एक क़दम है यानी जो चीज़ नहीं है उसे अस्तित्व प्रदान करना और उसके बाद परिपूर्णता का चरण आरंभ होता है और धार्मिक शिक्षाओं व कार्यक्रमों का लक्ष्य यही है। महान ईश्वर समस्त नेअमतों का स्रोत है और वह अपनी कृपा दृष्टि व समर्थन से इंसानों को कमी से परिपूर्णता तक पहुंचाता है। तो हमारी बंदगी और हमारी उपासना प्रशिक्षण एवं परिपूर्णता की कक्षा है। दूसरे शब्दों में बंदों को चाहिये कि वे समस्त परिपूर्णता के स्रोत यानी महान ईश्वर को पहचानें और स्वयं को उसकी परिपूर्णता के अनुसार बनायें ताकि ईश्वरीय विशेषताओं की किरण उसके अस्तित्व में प्रतिबिंबित हो। क्योंकि महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करना सदगुणों से सुसज्जित हुए बिना संभव नहीं है। तो ईश्वर की उपासना यानी उसकी विशेषताओं व सदगुणों से सुसज्जित होना इंसान की परिपूर्णता का शिखर है।