ईश्वरीय वाणी-७०
सूरए तूर पवित्र क़ुरआन का 52वां सूरा है।
यह सूरा मक्के में उतरा। इसमें 49 आयतें हैं। इस सूरे में हम जिन विषयों पर चर्चा करेंगे वे इस प्रकार हैं। सूरे की पहली सौगंध, ईश्वरीय प्रकोप, प्रलय की निशानियां काफ़िरों को दंड, स्वर्ग की अनुकंपाएं, ईश्वरीय विभूतियां, पैग़म्बर का ईश्वरीय दूत होना और शत्रुओं के आरोप, एकेश्वरवाद की चर्चा, प्रलय और प्रलय की कुछ विशेषताएं, पैग़म्बरे इस्लाम को धैर्य और डटे रहने तथा ईश्वरीय गुणगान करने का निमंत्रण इत्यादि।
यह सूरा एक महत्वपूर्ण घटना को बयान करने अर्थात प्रलय और लोगों के कर्मों का हिसाब किताब बयान करने के लिए एक सौगंध के साथ आरंभ होता है । इस सूरे का तूर नाम इस लिए रखा गया क्योंकि तूर शब्द का प्रयोग पहली आयत में हो चुका है। तूर का अर्थ होता है पर्वत। इससे तात्पर्य तूरे सीना है अर्थात वही पर्वत जिसपर हज़रत मूसा पर ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि उतरी थी।
सूरए तूर की पहली से छठी आयतों में ईश्वर कहता है कि तूर की क़सम और लिखी हुई किताब की क़सम जो फैले हुए पन्नों में है और आबाद घर अर्थात ईश्वरीय घर की सौगंध, और ऊंची छत अर्थात आसमान की क़सम और भड़कते हुए समुद्र की क़सम।
ईश्वर सौगंध द्वारा किसी विषय पर बल देता है ताकि मनुष्य उसे स्वीकार करे। यह क़सम ईश्वर की सृष्टि और संपूर्ण ब्रहमांड पर उसकी ताक़त पर केन्द्रित है जैसे सृष्टि में ईश्वर की शक्ति का प्रदर्शन जिसमें आसमान बिछाने या किताब या काबे की क़सम खाई गयी है। यह सब चीज़ें इस बात को बयान करती है कि वह कोई विशेष बात पेश करने वाला है और यह कि ईश्वर प्रलय लाने में सक्षम है और लोगों को एक फिर से जीवित कर सकता है। यह सब वही चीज़े हैं जिसके लिए क़सम खाई गयी है।
इस सूरे की सातवीं और आठवीं आयत में आया है कि निश्चित रूप से हमारे ईश्वर का प्रकोप आने वाला है और उसको कोई टालने वाला नहीं है।
सूरए तूर की आयत संख्या नौ और दस में प्रलय की कुछ विशेषताओं का वर्णन किया गया है। जिस दिन आसमान बाक़ायदा चक्कर खाने लगेंगे और पहाड़ बाक़ायदा हिलने डुलने लगेंगे।
इस प्रकार से प्रलय के समय सृष्टि की व्यवस्था उथल पुथल हो जाएगी और वह अपने ध्रुव से हट जाएंगी और इसके बदले ईश्वरीय आदेश पर एक नया संसार अस्तित्व में आएगा और उस दिन पहाड़ अपनी जगह से उखाड़ दिए जाएंगे और हिलने लगेंगे, कुरआन की दूसरी आयतों के अनुसार, पहाड़ टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे। उस समय पूरी धरती समतल और बिना पानी व वनस्पति के हो जाएगी। यह इस बात की ओर संकेत है कि यह दुनिया और इसमें शरण लेने वाले समाप्त हो जाएंगे और नई व्यवस्था उसका स्थान ले लेगी। उस समय मनुष्य के कर्मों का हिसाब किताब होगा।
सूरए तूर की ग्यारहवीं आयत में झुठलाने वालों के भविष्य के बारे में बताया गया है। फिर झुठलाने वालों के लिए प्रकोप और बर्बादी ही है। जबकि दुनिया के उथलपुथल होने से पैदा होने वाला भय और परेशानी सब पर छा जाएगी और झुठलाने वालों पर एक अजीब प्रकार का भय तारी हो जाएगा जो वही ईश्वरीय प्रकोप है। इस सूरे की बारहवीं आयत में इस गुट के बारे में बयान किया गया है जो मोहल्लों में खेल तमाशा कर रहे हैं।
वे लोग पवित्र क़ुरआन की आयतों को झूठ और पैग़म्बरे इस्लाम के चमत्कारों को जादू कहते थे और उसके लाने वाले को पागल कहते थे। उन्होंने वास्तविकता से खिलवाड़ किया और उसका उपहास किया। असत्य और अतार्किक बातों से सत्य युद्ध करते और अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किसी भी प्रकार के लांछन और झूठ से संकोच नहीं करते थे। अंत में उनके अंतिम परिणाम की ओर संकेत करती है। जिस दिन उन्हें भरपूर ढंग से नरक में ढकेल दिया जाएगा, यही वह नरक की आग है जिसका तुम खंडन किया करते थे।
इसी प्रकार उनसे कहा गया कि क्या यह जादू है या तुम्हें कुछ सुझाई नहीं दे रहा है? अब उसमें चले जाओ फिर चाहे धैर्य रखो या न रखो सब बराबर है यह तुम्हारे उन कर्मों का दंड है जो तुम अंजाम दिया करते थे।
जी हां यह स्वयं तुम्हारे ही कर्म हैं जिन्हें जिसे तुम्हारी ओर लौटा दिया गया और तुम्हारे पल्ले पड़ गया। यह इस बात पर पुनः बल है कि तुम्हारे कर्म साक्षात होंगे जो प्रलय के लिए तुम्हारी ओर पलटा दिए जाएंगे। इसी प्रकार यह ईश्वर के न्यायप्रिय होने पर भी बल है क्योंकि नरक की आग, मनुष्य के स्वयं के कर्म के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।
इस सूरए की आयत संख्या 17 में आया है कि निसंदेह ईश्वरीय भय रखने वाले बाग़ों और विभूतियों के मध्य रहेंगे।
स्वर्गवासी उस चीज़ से बहुत प्रसन्न है जिसे ईश्वर ने उन्हें प्रदान किया है और इस बारे में बहुत ही सुन्दर और मीठे शब्द कहते हैं। उनके दिल हर प्रकार के दुख और दर्द से ख़ाली हैं और वे अपार शांति का आभास करते हैं विशेषकर उस चीज़ से जिससे ईश्वर ने उन्हें दंडों के मुक़ाबले में विश्वास दिलाया है और उन्हें नरक से सुरक्षित रखा है और वहां पर उनसे कहा जाएगा कि अब यहीं आराम से खाओ पियो उन कर्मों के आधार पर जो तुमने अंजाम दिए थे।
स्पष्ट रूप से स्वर्ग में खाना और पीना, इस संसार के खाने पीने जैसा नहीं है और इसके साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होंगे। इसके अतिरिक्त उनके बीच इसके सामप्त होने या ख़त्म होने की चिंता भी नहीं है। यही कारण है कि यह अनुकंपाएं पूर्ण रूप से सुखद है। दूसरी अनुकंपा यह है कि स्वर्गवासी बराबर से बिछे हुए सिंहासनों पर तकिया लगाये बैठे होंगे और हम उनका जोड़ा सुन्दर और बड़ी बड़ी आंखों वाली हूरों को क़रार देंगे।
स्वर्गवासियों की भौतिक व अध्यात्मिक अनुकंपाओं का एक अन्य भाग इस सूरे की 21वीं आयत में उल्लेख हुआ है। और जो लोग ईमान लाए और उनकी संतानों ने भी ईमान में उनका अनुसरण किया तो हम उनके वंशज को भी उन ही से मिला देंगे और किसी के कर्म में से तनिक भी कम नहीं करेंगे कि हर व्यक्ति अपने कर्म का गिरवी है।
यह महा अनुकंपा है जो मनुष्य अपनी संतान और मोमिन अपने सगे संबंधियों के बारे में स्वर्ग में अपने साथ देखेगा और वे उनके निकट होने से आनंदित होंगे। उनके कर्मों में तनिक भी कमी नहीं की जाएगी, क्योंकि उनकी संतानों ने भी ईमान में अपने पिता का अनुसरण किया, यदि कर्म की दृष्टि से उनके कर्म कुछ कम रहे या उन्होंने लापरवाही की तो ईश्वर उनके नेक पिताओं के सम्मान में उनको क्षमा कर देगा और उनके स्थानों को ऊंचा कर देगा। यह पिताओं और उनकी संतानों के लिए ईश्वर की महा अनुकंपाएं हैं।
स्वर्गवासियों के बारे में बहुत सी आयतों से हमको पता चलता है कि जो चीज़ उनकी शांति, सुख और ख़ुशी के लिए आवश्यक है उन्हें प्राप्त हो गयी। उसके बाद की आयतों में हमेशा रहने वाले स्वर्ग के आहार और फलों की ओर संकेत किया गया है।
सूरए तूर की आयत संख्या 22 से 27 तक में आया है कि और हम जिस प्रकार के फल या मांस वे चाहेंगे उससे बढ़कर उनकी सहायता करेंगे। वह आपस में जामे शराब पर झगड़ा करेंगे किन्तु वहां कोई बुरी बात और पाप नहीं होगा। और उनके आसपास वह युवा लड़के चक्कर लगाते होंगे जो छिपे हुए और सावधान मोतियों जैसे सुन्दर होंगे और फिर एक दूसरे की ओर रुख़ करके सवाल जवाब करेंगे। कहेंगे कि हम तो अपने घर में ईश्वर से बहुत डरते थे तो ईश्वर ने हम पर यह उपकार किया और हमें नरक की विषैली हवा से बचा लिया। हम इससे पहले भी उसी से दुआ करते थे कि वह निश्चित रूप से बड़ा उपकार करने वाला और दयालु है।
कुछ झुठलाने वाले पवित्र क़ुरआन को पैग़म्बर की ओर से गढ़ा हुआ बताते थे और कहते थे कि उन्होंने इस क़ुरआन को झूठ मूठ ईश्वर का बता दिया है। वास्तव में उनमें ईमान नहीं है। यह अनेकेश्वरवादियों और हठधर्मी काफ़िरों का क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम के निमंत्रण के सामने न झुकने का एक बहाना है जिसकी ओर पवित्र क़ुरआन ने बारंबार संकेत किया है किन्तु सूरे तूर की आयत संख्या 34 इसका मुंहतोड़ उत्तर देते हुए कहती है कि यदि यह अपनी बात में सच्चे हैं तो यह भी क़ुरआन की भांति ऐसी ही कोई चीज़ लेकर आएं।
यदि यह किसी मनुष्य की बातचीत है और गढ़ हुआ है या किसी मनुष्य की सोच का परिणाम है तो वह भी क़ुरआन की भांति कोई चीज़ ले आएं। यदि यह क़ुरआन मनुष्य की बातचीत है या अन्य बातचीतों की भांति है तो इसके परिणाम स्वरूप लोग भी इसकी भांति ही दूसरी चीज़ ला सकते हैं।
प्रत्येक दशा में यह उन आयतों में से एक है जो पवित्र क़ुरआन के चमत्कार होने की पुष्टि करती है और यह पैग़म्बरे इस्लाम के काल से ही विशेष नहीं है बल्कि इसके संबोधक हर काल के मनुष्य हैं कि यदि वे अपने दावे में सच्चे हैं तो इसकी भांति एक अन्य चीज़ लेकर आएं। क़ुरआन की आवाज़ सदैव ऊंची रही है और पैग़म्बरे इस्लाम को पैग़म्बर बने चौदह सौ साल हो रहे हैं आज तक कोई भी इसका जवाब न ला सका। यह ऐसी स्थिति में है कि इस्लाम के शत्रुओं ने इस ईश्वरीय धर्म के विरुद्ध प्रोपेगैंडा करने में बहुत अधिक धन संपत्ति ख़र्च की। सभी लोगों की यह विवशता और लाचारी, इस ईश्वरीय संदेश के सच्चा होने और शुद्ध होने का खुला प्रमाण है।
इस सूरे के अंतिम आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है कि और रात के एक भाग में तारों के डूबने के बाद भी ईश्वर का गुणगान करते रहें।