ईश्वरीय वाणी-७१
सूरे नज्म पवित्र क़ुरआन का 53वां सूरा है।
यह मक्के में नाज़िल हुआ है और इसमें 62 आयतें हैं। यह पवित्र क़ुरआन के उन सूरों में से है जिसमें वे आयते हैं जिन के पढ़ने या सुनने पर सज्दा अनिवार्य हो जाता है।
इस सूरे में जिन विषयों के बारे में चर्चा हुई है व्यापक रूप से वे इस प्रकार हैं। तारों की सौंगन्ध, वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश, पैग़म्बरे इस्लाम पर उसके उतरने की पद्धति, पैग़म्बरे इस्लाम की मेराज अर्थात उनका आसमान पर जाना, अनेकेश्वरवादियों द्वारा मूर्तियों की पूजा और उनके बारे में उनकी आस्था की भर्त्सना, पापियों और गुमराह लोगों के लिए प्रायश्चित के द्वार का खुला रहना, किसी का किसी के पाप का बोझ नहीं उठाना, प्रलय की ओर संक्षिप्त इशारा, अतीत की जातियों व क़ौमों का बुरा अंजाम जो सत्य से दुश्मनी पर अड़ी रहीं। सज्दा और महान ईश्वर की उपासना का आदेश। सूरे नज्म की विशेषताओं में से एक विशेषता यह है कि उसकी आयतें छोटी हैं अतः पढ़ने में सुन्दर और संतुलित हैं। इस सूरे के अर्थ इतने प्रभावी हैं कि वे इन्सान के सोये हुए अंतर्मन को देते हैं।
इस सूरे की पहली से चौथी तक की आयतों में इस प्रकार आया है तारे की सौगन्ध जब वह डूबता है कि तुम्हारा सहायक व साथी न गुमराह हुआ है और न भटका है और वह अपनी ओर से कोई बात नहीं करता है उसकी बात वहि के अतिरिक्त कुछ और नहीं होती है जो उस पर नाज़िल की जाती है।“
सूरे के आरंभ में सौगंध खाने के बाद इस ओर संकेत किया गया है कि तुम्हारे सहायक यानी हज़रत मोहम्मद कदापि गुमराह नहीं हुए हैं और वह अपने उद्देश्य से न तो भटके हैं और न ही उसे भूले हैं। वह सदैव सत्य के मार्ग में क़दम रखते हैं और उनकी कथनी और करनी में लेशमात्र भी अंतर नहीं है।
पवित्र क़ुरआन की इन आयतों में महान ईश्वर ने अपने दूत से हर प्रकार की गुमराही, ग़लती और अज्ञानता का इंकार किया है और वह उनके शत्रुओं के आरोप का कड़ाई से खंडन करता है और उसके बाद इस बात पर बल देने के लिए कि पैग़म्बरे इस्लाम जो कुछ कहते है वह ईश्वर की ओर से है, ईश्वर कहता है वह कदापि अपनी ओर से कोई बात ही नहीं करता और वह जो कुछ बोलता है वह वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश है जो उस पर उतरता है। वह अपनी तरफ से कोई बात नहीं करता है और क़ुरआन उसके दिमाग़ का बनाया हुआ नहीं है सब चीज़ ईश्वर की ओर से है और इस दावे का तर्क स्वयं उसके अंदर निहित है।
पवित्र क़ुरआन की आयतों की समीक्षा व उनके अध्ययन से यह बात भलिभांति स्पष्ट हो जाती है कि इंसान जितना भी बुद्धिमान और विचारक हो वह कभी भी इस प्रकार के अर्थपूर्ण बातों को नहीं ला सकता। शताब्दियों का समय गुज़र जाने के बाद पवित्र क़ुरआन की बातें बुद्धिमानों एवं विचारकों की प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं और वे अच्छे, सभ्य और विकसित समाज के गठन का आधार बन सकती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि ये बातें पैग़म्बरे इस्लाम जैसे उस महान इंसान की ज़बान से जारी हुई हैं जिसने पढ़ा- लिखा ही नहीं और वह अज्ञानता व अंधविश्वास से भरे वातावरण में बड़ा हुआ।
सूरे नज्म की 5 से 18 तक की आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम के मेराज अर्थात आसमान पर जाने की यात्रा के बारे में चर्चा की गयी है। मेराज आसमान में वह स्थान है जहां पैग़म्बरे इस्लाम के अलावा किसी दूसरे इंसान व सृष्टि के क़दम ही नहीं पड़े हैं। यह स्वयं समस्त इंसानों व सृष्टि पर पैग़म्बरे इस्लाम के स्थान के श्रेष्ठ होने का सूचक है। मेराज पर पैग़म्बरे इस्लाम की यात्रा एक रात को आरंभ हुई। उस रात को पैग़म्बरे इस्लाम सबसे पहले मस्जिदुल अक्सा गये और वहां से आसमान पर गये और उसी रात को लौट आये इस प्रकार से कि सुबह अपने घर में थे। मेराज पर जाने की यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं थी। इस यात्रा के दौरान पैग़म्बरे इस्लाम ने बहुत सी चीज़ें देखीं और महान ईश्वर से बातें की और उनमें से कोई भी कार्य सामान्य नहीं था। इस यात्रा के बारे में जो बातें बयान की गयी हैं वे उन चीज़ों की महानता की सूचक हैं जिन्हें पैग़म्बरे इस्लाम ने देखा है। समस्त चीज़ें समय और स्थान के मापदंड से हटकर असाधारण रूप से हुई हैं। इस आधार पर यह आश्चर्य का स्थान नहीं है कि यह यात्रा ज़मीन में हमारे सारे मापदंडों से हटकर थोड़े से समय में कैसे हुई?।
रवायत में आया है कि मेराज की रात हज़रत जीब्राईल पैग़म्बरे इस्लाम के लिए एक सवारी लेकर आये और पैग़म्बरे इस्लाम उस पर सवार होकर बैतुल मुकद्दस की ओर रवाना हो गये। रास्ते में कई स्थान पर रुके और वहां पर नमाज़ पढ़ी। उसके बाद वह मस्जिदुल अक्सा पहुंचे। वहां पर हज़रत ईसा, हज़रत मूसा और हज़रत इब्राहीम जैसे बड़े पैग़म्बरों की आत्मा ने पैग़म्बरे इस्लाम की इमामत में नमाज़ पढ़ी। उसके बाद वहां से पैग़म्बरे इस्लाम की आसमानी यात्रा आरंभ हुई और पैग़म्बरे इस्लाम ने एक के बाद दूसरे यहां तक कि सातों आसमान की यात्रा तय की और हर आसमान में आश्चर्यजनक चीज़ें व दृश्य देखे। पैग़म्बरे इस्लाम ने फरिश्तों, नरक, नरकवासी, स्वर्ग और स्वर्ग में रहने वालों को देखा। पैग़म्बरे इस्लाम ने आसमान पर जो कुछ देखा उनमें से हर एक में कुछ रहस्य नीहित हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने मेराज से वापस आने के बाद जो कुछ वहां देखा था उसे लोगों की जानकारी में वृद्धि के लिए उचित समय पर बयान किया और लोगों की शिक्षा- प्रशिक्षा में उससे लाभ उठाया। यह स्वयं इस बात का सूचक है कि इस आसमानी यात्रा का एक उद्देश्य उसकी महान उपलब्धियों से लोगों की शिक्षा –प्रशिक्षा के लिए लाभ उठाना था।
पैग़म्बरे इस्लाम ने मेराज की यात्रा के दौरान जिन चीज़ों को देखा उनमें से एक सिद्रतुल मुन्तहा नामक विशेष स्थान है और वह महान ईश्वर की अनुकंपाओं से परिपूर्ण स्थान है। वहां पैग़म्बरे इस्लाम महान ईश्वर के सामिप्त या ईश्वर से निकटता के शिखर बिन्दु पर पहुंचे। वहां पर महान ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित किया और उनसे आवश्यक सिफारिशें कीं और महत्वपूर्ण बातें बतायीं जो हदीसे क़ुद्सी के रूप में आज भी मौजूद हैं।
सूरे नज्म की 33वीं और उसके बाद की आयतों में इंसानों के कर्मों के परिणामों से संबंधित बिन्दुओं की ओर संकेत किया गया है।
एक दिन वलीद बिन मुग़ैरह पैग़म्बरे इस्लाम के पास आया और उसने इस्लाम क़ुकूल कर लिया। कुछ अनेकेश्वरवादियों ने उसकी भर्त्सना की और कहा तुमने हमारे पूर्वजों के धर्म को छोड़ दिया, तुमने उन्हें गुमराह समझा और तुम यह सोच रहो कि वे नरक में हैं! उसने कहा सच में मैं ईश्वर के प्रकोप से डरता हूं! भर्त्सना करने वाले अनेकेश्वादी ने कहा कि अगर तुम अपना कुछ धन मुझे दे दो और अनेकेश्वरवाद की ओर पलट आओ तो मैं तुम्हारे दंड की ज़िम्मेदारी लेता हूं! वलीद ने यह कार्य किया परंतु वलीद ने उसे धन को बह मात्रा न दी जिसका उसने वादा किया था। पवित्र क़ुरआन की आयत नाज़िल हुई और ईमान से अनेकेश्वरवाद की ओर वलीद के लौट जाने की भर्त्सना की।
कुछ लोग यह सोचते हैं कि किसी का दंड किसी को दिया जा सकता है परंतु पवित्र क़ुरआन की आयत इस ग़लत विचारधारा का खंडन करती और कहती है कि हर व्यक्ति के किये का दंड केवल उसी को दिया जायेगा।
सूरे नज्म की 33वीं और उसके बाद की कुछ आयतों में इस बात को बयान किया गया है कि क्या उस आदमी को देखा है जो इस्लाम से फिर गया है? और उसने थोड़ा सा धन दिया और फिर बाक़ी धन से उसने हाथ रोक लिया और यह समझ बैठा कि दूसरा उसके पाधें का बोझ उठाएगा। क्या उसके पास ग़ैब का ज्ञान है कि वह देख रहा है क्या उसके पास उन बातों की ख़बर नहीं पहुंची जो मूसा और इब्राहीम के सहीफ़ों में है कि कोई किसी के पाप का बोझ नहीं उठायेगा।
पवित्र कुरआन इसके बाद एक व्यापक नियम व सिद्धांत को बयान करता है कि जो दूसरे आसमानी धर्मो में भी आया है और वह यह है कि हर इंसान अपने कर्मों का जिम्मेदार स्वयं है। महान ईश्वर कहता है क्या जो चीज़ मूसा की किताब में नाज़िल की गयी उससे अवगत नहीं हुए? क्या जो चीज़ इब्राहीम की किताब में थी उससे अवगत नहीं हुए? वह बड़ा पैग़म्बर था जिसने पूर्णरूप से ईश्वरीय दायित्व अदा किया और ईश्वरीय धर्म के प्रचार-प्रसार के मार्ग में किसी समस्या व कठिनाई से नहीं डरा।
इन आसमानी किताबों में यह आदेश आया है कि कोई भी किसी के पापों के बोझ को नहीं उठाएगा और किसी भी इंसान को कुछ नहीं मिलेगा किन्तु जितना उसने कोशिश की होगी।
रोचक यह है कि सूरे नज्म की 39 वीं आयत कहती है कि इंसान को उसके प्रयास का फल मिलेगा। यह वास्तव में इस बात की ओर संकेत है कि प्रयास महत्वपूर्ण है। अगर इंसान की नियत अच्छी होगी तो महान ईश्वर उसका बदला देगा और क्योंकि वह इरादों को महत्व देता है न केवल अंजाम दिये गये कार्यों को। बहुत जल्द पता चल जायेगा कि इंसान ने क्या अंजाम दिया है। उसके कार्य प्रलय के दिन उसके सामने स्पष्ट हो जायेंगे। उसके बाद महान ईश्वर उसके कार्यों का पूरा- पूरा प्रतिदान देगा।
पवित्र क़ुरआन की इन आयतों में इस बिन्दु की ओर संकेत किया गया है कि पहले की आसमानी किताबों में भी इस बात पर बल दिया गया है कि हर इंसान के पापों का संबंध उसी से है और परलोक में हर इंसान को उसके प्रयासों का बदला मिलेगा और महान ईश्वर हर इंसान को उसके अमल का पूरा बदला देगा। यह विश्वास इस बात का कारण बनता है कि इंसान आधारहीन बातों पर ध्यान देने या अपने पापों की ज़िम्मेदारी दूसरों की गर्दन पर डालने के बजाये अच्छे कार्यों को अंजाम देने का प्रयास करे और बुरे कार्यों से परहेज़ करे और अगर उससे कोई पाप हो जाये तो प्रायश्चित करे। इन आयतों से यह क़ानून भी समझ में आता है कि दंड का संबंध केवल अपराधी से है और वास्तविक अपराधी को ही सज़ा मिलेगी और कोई भी दूसरे के दंड की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर नहीं ले सकता।
सूरे नज्म की 42वीं और उसके बाद की आयतों में कहा गया है कि इस संसार में हर प्रकार की घटना का संबंध महान ईश्वर से है चाहे वह घटना इंसान के मरने-जीने की हो या कोई दूसरी। सूरे नज्म की अंतिम आयत एकेश्वरवाद को सिद्ध करने और अनेकेश्वरवाद को नकारने के बारे में है। यह आयत कहती है तो ईश्वर के लिए सज्दा करो और उसकी उपासना करो। यानी अगर इंसान सत्य के मार्ग में क़दम उठाना और यह चाहता है कि उसका अंजाम उन लोगों जैसा न हो जो इससे पहले वाले लोगों का हो चुका है तो उसे केवल महान व सर्वसमर्थ ईश्वर का ही सज्दा करना चाहिये।