Mar ०६, २०१९ १६:५९ Asia/Kolkata

कार्यक्रम की पिछली कड़ियों में हमने ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के केवल 19 महीने बाद ईरान पर सद्दाम की सैन्य चढ़ाई के बारे में चर्चा की थी।

दक्षिणी ईरान में इराक़ से मिलने वाली सीमा के निकट स्थित ख़ुर्रमशहर पर इराक़ी सेना के अतिक्रमण के दौरान, ईरानी युवाओं ने रक्षा के इतिहास में एक सुनहरा अध्याय जोड़ दिया। पिछली कड़ी में विशेष रूप से हमने 13 वर्षीय दो बच्चों बहनाम मोहम्मदी और मोहम्मद हुसैन फ़हमीदे की चर्चा की थी। ख़ुर्रमशहर की रक्षा करने में जहां ईरानी सुरक्षा बलों ने अपनी भूमिका निभाई वहीं समाज के हर वर्ग ने अपनी क्षमता के मुताबिक़ योगदान दिया।

शहर की रक्षा करने वालों में ईरानी महिलाएं और लड़कियां भी पीछे नहीं रहीं और उन्होंने इतिक्रमणकारी इराक़ी सैनिकों का पूरी बहादुरी के साथ सामना किया। इन लड़कियों में से एक 17 वर्षीय सैय्यदा ज़हरा हुसैनी थी। हुसैनी का नाम पवित्र रक्षा के इतिहास में अमर हो गया है। उन्होंने युद्ध के दौरान की अपनी यादों को दा नाम की किताब में सुरक्षित कर दिया है, जिसकी लेखक हैं सैय्यदा आज़म हुसैनी। दा कुर्दी शब्द है जिसका अर्थ है मां। सैय्यदा ज़हरा हुसैनी ने इस किताब को अपनी मां के नाम किया है।

दा एक ऐसी लड़की के जीवन की कहानी है, जो बहुत ही धैर्यवान है। हुसैनी ने अपने जीवन के आरम्भिक पांच साल बसरा के कुर्द बहुल मोहल्ले रबात में गुज़ारे थे। उनका परिवार सद्दाम शासन के अत्याचारों को सहन करते हुए जीवन व्यतीत कर रहा था। उनके पिता को हमेशा ख़ुफ़िया अभियानों पर भेजा जाता था। कुछ समय बाद सद्दाम शासन को उन पर संदेह हो गया और उसने उन्हें जेल में डालकर उनके परिवार को इराक़ छोड़ने और ईरान चले जाने पर मजबूर कर दिया। यह परिवार किसी तरह ख़ुर्रमशहर पहुंचता है। उन्हें इस ईरान के इस शहर में पहुंचे हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि सद्दाम की सेना ने ख़ुर्रमशहर पर हमला कर दिया।

 

युद्ध शुरू होने के केवल पांच ही दिन बाद ज़हरा हुसैनी के पिता और भाई शहीद हो गए। ज़हरा ने अपनी 14 वर्षीय छोटी बहन के साथ युद्ध में शहीद होने वाली महिलाओं को ग़ुस्ल देना शुरू कर दिया। ज़हरा ने ख़ून में लतपत अपने पिता और भाई के शवों को भी दफ़्न किया। शहर में शहीद होने वाले शहीदों के शवों को एकत्रित करने में सहायता की और घायलों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। ख़ुर्रमशहर की जामा मस्जिद में अस्थायी उपचार केन्द्र में घायलों की रात दिन सेवा की। अग्रिम मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों और युवाओं तक भोजन, पानी और हथियार पहुंचाने में सहयोग किया। अपने पिता का शव देखने और उसे दफ़्न करने के बारे में वे कहती हैं, क़ब्रिस्तान में ज़्यादा लोग नहीं थे। ग़ुसलख़ाने के सामने कुछ लोग खड़े हुए थे। निकट ही एक महिला ज़मीन पर बैठी हुई थी, वह चिल्ला रही थी और अपने चेहरे और सिर पर ख़ाक डाल रही थी। कुछ बच्चे उसके चारों ओर खड़े थे। मेरा दिल कांपने लगा। मैं थोड़ा नज़दीक गई। मैंने देखा कि जो महिला रो रही है और विलाप कर रही है वह मेरी दा अर्थात मां है। उसका कोई भी दुख देखने की मुझमें शक्ति नहीं थी। लेकिन आख़िर क्या हुआ था कि वह इस तरह से रो रही थी। हे ईश्वर हम पर क्या आफ़त टूट पड़ी? अचानक लोगों की निगाहें मेरी तरफ़ उठीं। मेरा दिल उछल पड़ा। मां ने भी मेरी ओर देखा। उसकी चीख़ निकल गई। उठी और लड़खड़ाती हुई मेरी तरफ़ दौड़ी। उसने अपने चेहरे और सिर पर इतनी ख़ाक और मिट्टी डाली थी कि उसके चेहरे और कपड़ों का रंग ही बदल गया था। मैं भी मां की ओर बढ़ी। अभी वह कुछ दूरी पर ही थी कि उसने दिल दहलाने वाली आवाज़ में कहा, देखा तेरा बाप शहीद हो गया, देखा।

मैं अपने पिता को देखने के लिए बैचेन हो उठी, लेकिन जब उनके शव के निकट पहुंची तो मेरे हाथ कांपने लगे और सांस उखड़ने लगी। मुझे ऐसा लगा कि हर ओर अंधेरा छा गया है और मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। मेरा दिल बैठा जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि किसी भंवर में फंस गई हूं और हाथ पैर मार रही हूं। मेरा दम घुटने लगा। मैं रोने और चिल्लाने लगी। बेजान हाथों से मैंने अपने बाप का सिर उठाया और सीने से लगा लिया। मैंने कफ़न को चूमना शुरू कर दिया। मैं अपने बाप को ज़ोर ज़ोर से पुकारने लगी कि मेरे प्यारे बाबा मुझसे बात करो, क्यों मेरी बात का जवाब नहीं दे रहे हो, उठो और देखो मां ने अपनी कैसी हालत बना ली है। मैंने सिर को नीचे रखा और अपने लरज़ते और कांपते हाथों से सिर के ऊपर बंधे कफ़न को खोला। आंसू मुझे अपने बाप का चेहरा सही से देखने नहीं दे रहे थे। मैं झुकी और अपने बाप के चेहरे को सही से देखा। गोली ने चेहरे का बायां भाग उड़ा दिया था और हड्डी दिखाई दे रही थी। लेकिन ईश्वर की कृपा से बाक़ी चेहरा सही था और दिमाग़ भी बाहर नहीं निकला था। मैंने फिर से चेहरे को देखा, उनकी दाहनी आंख खुली हुई थी, जो बहुत ही सुन्दर थी।

 

सैय्यदा ज़हरा हुसैनी के पिता की शहादत के पांच दिन बाद उनका भाई अली भी शहीद हो गया। ज़हरा ने उसे भी दफ़्न किया। ज़हरा अपने भाई के शव का सामना होने के बारे में लिखती हैं। मैंने अपने भाई के शव को जब देखा तो उसे दुलार किया। उसके चेहरे और बालों पर लगी मिट्टी को साफ़ किया और उससे बातें कीं। बिल्कुल उस मां की तरह जो अपने बच्चे को दुलार करती है। मैंने अली को अपने सीने से लगा लिया। उसके घावों से ख़ून बहना बंद हो चुका था, मैंने उसके घावों को सहलाया तो ख़ून निकलने लगा। उसकी काली वर्दी फट चुकी थी और ख़ून में सनी हुई थी। यह वही वर्दी थी, जब पहली बार उसने पहनी थी तो हम सभी बहुत ख़ुश हुए थे। मुझे उसी वक़्त से उसके शहीद होने की चिंता थी। मुझे यक़ीन था कि वह शहीद होगा, उसने ख़ुद कहा था कि मेरी तस्वीर के फ़्रेम को मेरे कमरे में रख देना। ज़हरा हुसैनी जब दर्जनों शहीदों को दफ़्न कर चुकीं तो एक दिन तोप के गोले का एक टुकड़ा लगने से घायल हो गईं। उन्हें घायल अवस्था में शीराज़ स्थानांतरित किया गया। ज़हरा हुसैनी के घायल होने के बाद ख़ुर्रमशहर का पतन हो गया।