Jul २९, २०१९ १४:०२ Asia/Kolkata

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि अगर तुम ईश्वर का ध्यान रखोगे तो वह तुम्हारा ध्यान रखेगा।

इसका अर्थ यह है कि मनुष्य अपने जीवन में जो भी क़दम उठाना चाहता है, उसे पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह क़दम कहां रख रहा है। हमें अपनी बातों में, फ़ैसलों में, मेल जोल में, किसी को कुछ आदेश देने में, किसी के आदेश का पालन करने में हर समय और हर स्थान पर ईश्वर का ध्यान रखना चाहिए। पैग़म्बर ने इतने संक्षिप्त शब्दों में इतनी महान बात कही है, इसे हमें हमेशा अपने मन में जीवित रखना चाहिए। एक अन्य स्थान पर कहा गया है कि ईश्वर का ध्यान रखो तो तुम उसे अपने सामने पाओगे। जब वह तुम्हारे सामने है तो तुम उससे मांगोगे, चाहोगे, रोओगे, गिड़गिड़ाओगे, अपने दिल की बात उससे कहोगे, उससे मदद मांगोगे, उसकी शरण में जाओगे, उससे प्रेम प्रकट करोगे और अपना दिल उससे जोड़ लोगे।

इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि सशक्त वह है जो अपनी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित रखे। हदीस में सशक्त के लिए “शदीद” शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ होता है कड़ा यानी मनुष्य आत्मिक दृष्टि से कड़ा हो, कर्म करने में कड़ा हो। जैसे रणक्षेत्र में पत्थर और मिट्टी के मोर्चे बनाए जाते हैं जो अपनी और दूसरों की रक्षा कर सकते हैं, कड़ाई का यह अर्थ है। कुछ धातुएं नर्म होती हैं, कुछ लचकदार होती हैं और कुछ कड़ी होती हैं। वे दबाव के मुक़ाबले में प्रतिरोध करती हैं। तो इंसान की एक अच्छी विशेषता यह है कि वह ठोस धातु का हो। अब यह कैसे पता चलेगा कि हम-आप ठोस हैं? इसके लिए बहुत से मैदान हैं लेकिन सबसे अहम मैदान, आंतरिक इच्छाओं से संघर्ष का है। जो इस मैदान में विजयी रहे, वही सही अर्थ में सशक्त और ठोस है। (HN)

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