अल्लामा सैयद मुर्तज़ा अस्करी-२
अल्लामा अस्करी ने अपने पूरे जीवन में बहुत सी सांस्कृतिक, राजनैतिक व सामाजिक गतिविधियां अंजाम दी किन्तु इस्लामी जगत में उन्हें अपने शोध और उल्लेखनीय गतिविधियों के कारण ख्याति प्राप्त हुई। उनके वर्षों के दिन रात के परिश्रम और प्रयास का परिणाम कई शोध और विभिन्न वैज्ञानिक पुस्तकों के रूप में निकला।
उन्होंने अपनी पुस्तकों और शोध से इस्लामी जगत विशेषकर शीया मत की विशेष सेवा की।
अल्लामा अस्करी की महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में क़ुरआनुल करीम व रिवायातुल मदरस्तैन है जो तीन खंडों पर अरब में लिखी हुई है। इस पुस्तक का विषय क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के कथन हैं। अल्लामा मुर्तज़ा अस्करी इस पुस्तक को लिखने के लक्ष्य के बारे में कहते हैं कि इस पुस्तक में मैंने शीया मुसलमानों की पवित्र क़ुरआन के बारे में पारदर्शी, पुष्ट और व्यवस्थित आस्थाओं को एकत्रित करने का प्रयास किया । मैंने पवित्र क़ुरआन से संबंधित शब्दावलियों और उसके इतिहास को एकत्रित किया और उसके बाद सुन्नी समुदाय के महापुरुषों और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के निकट पवित्र क़ुरआन के महत्त्व व स्थान के बारे में आरंभिक चर्चा की। मैंने अपनी चर्चा में इस बात को उठाया कि पवित्र क़ुरआन हर प्रकार के फेर बदल से सुरक्षित है और उसके बाद मैंने एक हज़ार से अधिक रेवायत की एक एक हदीस की समीक्षा की।
यह पुस्तक अल्लामा अस्करी के पंद्रह वर्षों के शोध का परिणाम है जिसमें उन्होंने इस्लामी इतिहास की कुछ बड़ी समस्याओं का सदैव के लिए हल कर दिया और इस्लामी जगत पर व्यापक प्रभाव डाला। इस प्रकार की निशानियां वे पत्र हैं जो विश्व के विभिन्न क्षेत्रों से अल्लामा अस्करी के पास भेजे गये और उनके महान कार्य के प्रभाव को दर्शाते हैं। इन पत्रों में व्यक्त की गयी प्रशंसा और उत्सुकता ध्यान योग्य हैं। अल्लामा अस्करी का यह मानना है कि न केवल यह कि पवित्र क़ुरआन में फेर बदल नहीं हुआ है बल्कि इसकी आयतों में पायी जाने वाली व्यवस्था कदापि इस बात की अनुमति नहीं देगी कि इस ईश्वरीय पुस्तक में किसी भी प्रकार का फेर बदल हो। अल्लामा अस्करी इस संबंध में कहते हैं कि क़ुरआन की प्रत्येक आयतों और शब्दों को विशेष व्यवस्था के साथ वहीं रखा गया है जहां उसे रखे जाने का अधिकार था और इसी कारण पवित्र क़ुरआन के किसी भी शब्द या वाक्य के स्थान को परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
अल्लामा अस्करी इस्लामी हदीसों के बारे में अपने शोध में अब्दुल्लाह बिन सबा नामक व्यक्ति के संबंध में रोचक बिन्दु बयान करते हैं। वे लिखते हैं कि लगभग एक हज़ार से अधिक वर्ष पूर्व इतिहासकारों ने अब्दुल्लाह बिन सबा के बारे में लिखा और इतिहासकारों ने लिखा कि उसने और उसके अनुयाइयों की ओर से महत्त्वपूर्ण कार्य किए गये। अब्दुल्लाह इब्ने सबा के बारे में इतिहासकार लिखते हैं कि वह यमन के सनआ का रहने वाला यहूदी था जिसने उस्मानी शासन काल में दिखावे के लिए इस्लाम स्वीकार कर लिया था किन्तु गुप्त रूप से वह मुसलमानों मध्य मतभेद फैलाता था और सीरिया, कूफ़ा, बसरा और मिस्र जैसे बड़े इस्लामी नगरों में घूमता फिरता था।
इतिहासकारों ने अभी तक अब्दुल्लाह इब्ने सबा की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अधिक बातें नहीं लिखी हैं। उनका यह मानना है कि अबू ज़र, अम्मार, मालिके अश्तर जैसे पैग़म्बरे इस्लाम के बहुत से साथी और उनको देखने वाले उससे जुड़ गये। इन्हीं इतिहासकारों में से बहुत सों का यह मानना है कि जमल नामक युद्ध की मुख्य जड़ वही था किन्तु इस युद्ध के बाद वह कहां गया इस बारे में कुछ भी नहीं लिखा।
अल्लामा अस्करी इस्लामी इतिहास के बारे में अपने शोध के दौरान इस रोचक परिणाम पर पहुंचे कि मुख्य रूप से इस प्रकार के व्यक्ति का इतिहास में कोई अस्तित्व नहीं और यह गढ़ा हुआ अस्तित्व है। शीया मुसलमान धर्म गुरूओं के अनुसार अब्दुल्लाह इब्ने सबा एक अवास्तविक व पौराणिक हस्ती है और उसका शीया समुदाय के गठन में कोई संबंध नहीं है। अल्लामा अस्करी के अनुसार इस पौराणिक कथा को गढ़ने वालों के विभिन्न लक्ष्य थे।
अल्लामा अस्करी ने इस वास्तविकता को पहचानने में बहुत कठिनाइयां सहन की। उन्होंने आरंभ उन हदीसों व कथनों की जो अधिक विश्वसनीय नहीं थे, समीक्षाएं की। जैसे अबू होरैरा, सैफ़ बिन उमर तमीमी और इन जैसे लोगों के हवाले से कथन लोगों तक पहुंचे हैं। इन हदीसों की समीक्षा करते हुए उस्ताद अस्करी ठोस और तार्किक प्रमाणों से इस परिणाम तक पहुंचे कि सैफ़ बिन उमर तमीमी के हवाले से आई हदीसें झूठी और ग़लत हैं। अल्लामा अस्करी सैफ़ बिन उमर तमीमी के बारे में लिखते हैं कि एक रात हदीसों और कथनों की समीक्षा कर रहा था कि मैंने देखा कि इस हदीस को बयान करने वाला एक व्यक्ति ही व्यक्ति है अर्थात इस संबंध में बयान की गयी हदीसें सैफ़ बिन उमर तमीमी के हवाले से बयान हुई हैं। हदीसों के बयान करने वालों से संबंधित पुस्तकों अर्थात इल्में रेजाल का अध्ययन करने से यह पता चला कि यह व्यक्ति अधर्मी और झूठा है, इसीलिए उसकी बातों पर कोई विश्वास नहीं किया जा सकता। उसके बाद उन्होंने अब्दुल्लाह इब्ने सबा के बारे में उसकी ओर से बयान की गयी हदीसों और कथनों की समीक्षा की। यहां पर मुझे पूरा विश्वास हो गया कि इस व्यक्ति का इतिहास में कोई नामोनिशान नहीं है और पूरा के पूरा गढ़ा हुआ व्यक्ति है। अधिक शोध के बाद पता चला कि सैफ़ बिन उमर ने अब्दुल्लाह इब्ने सबा के अतिरिक्त पैग़म्बरे इस्लाम (स) के एक सौ चालीस साथियों को गढ़ा। ईश्वर की कृपा व दया से अल्लामा अस्करी ने शीया मुसलमानों के बारे पायी जाने वाली भ्रांतियों का ठोस व तार्किक उत्तर दिया जाए और लोगों के ध्यान को पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों की विचारधाराओं की ओर किया जाए। अब्दुल्लाह बिन सबा और सदो पंचाह सहाबी साख़तगी जैसी उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें कई बार बैरूत और क़ाहिरा से प्रकाशित हुईं और सुन्नी समुदाय के विभिन्न धर्मगुरूओं ने उसकी भूमिका लिखी और आलोचना की।
अल्लामा अस्करी की एक अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तक जो मुसलमानों के मध्य एकता के उद्देश्य से लिखी गयी है, पवित्र क़ुरआन से निकाली गयी विशुद्ध आस्थाओं का स्रोत है। चूंकि मनुष्य के विभिन्न मतों की शिक्षाएं पवित्र क़ुरआन की वास्तविकताएं से बहुत दूर हैं, इनकी शिक्षाएं व क़ानून मनुष्य के कल्याण का मार्ग प्रशस्त न सकीं। अल्लामा अस्करी ने अक़ाएद इस्लामी बा इस्तेनाद बे क़ुरआन नामक पुस्तक लिखकर ईश्वरीय नियमों व आदेशों को क़ुरआन की आयतों से निकालने और उसे लोगों के सामने पेश करने का प्रयास किया। उन्होंने इस पुस्तक में पवित्र क़ुरआन में ईश्वरीय सृष्टि के प्रकार, लोगों के शिक्षक और धार्मिक प्रचारकों व ईश्वरीय दूतों की विशेषताएं जैसे विषय पेश किये हैं। यह पुस्तक तीन खंडों पर आधारित है और अरबी भाषा में लिखी गयी है।
पचासवीं हिजरी शम्सी के आरंभिक दशक में अल्लामा अस्करी ने इमामत के विषय पर कई भाषण दिए। यह चर्चा इमामत के संबंध में नयी और ताज़ा थी और इसमें अनछुए आयामों को उठाया गया था। भाषण के इस संग्रह का नाम धर्म के पुनर्जीवन में इमामों की भूमिका रखा गया और उसके बाद इसको पुस्तक का रूप दे दिया गया जो दो बड़े बड़े खंडों में प्रकाशित हुई। अब तक इस संग्रह के पंद्रह खंड से अधिक प्रकाशित हो चुके हैं।
अल्लामा भाषणों के इस संग्रह के आरंभ में ईश्वरीय दूतों के अपने समय के अत्याचारियों जैसे हज़रत मूसा व फ़िरऔन, हज़रत इब्राहीम व नमरूद और असहाबे कहफ व दक़ियानूस के मध्य युद्ध के कारणों को बयान करते हैं और पाठक इन कथाओं को पढ़कर इस्लाम धर्म से पहले अरब समाज की स्थिति, पैग़म्बरे इस्लाम की जीवनी और उनके आचरण और मुसलमानों की सांस्कृति के आसमानी धर्म के अनुयाइयों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में विभिन्न जानकारियों से अवगत हो सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि यह संग्रह अल्लामा अस्करी की सफलतम पुस्तकों में है जो फ़ारसी भाषा में लिखी गयी है।
अल्लामा अस्करी ने शीया मुसलमानों की पुस्तकों के साथ सुन्नी समुदाय की हदीसों व कथनों की भी समीक्षा की और उनके विश्वसनीय स्रोतों को पुस्तक लिखने में प्रयोग किया। इस आधार पर अल्लामा अस्करी की पुस्तकें, शीया मुसलमानों और सुन्नी समुदाय के मध्य विश्वसनीय स्रोतों में है। आज भी अल्लामा अस्करी की पुस्तकों का अरब देशों विशेषकर मिस्र में भव्य स्वागत किया जा रहा है और इन पुस्तकों का कई बार प्रकाशन हो चुका है। उनकी पुस्तकों की विशेषताओं में सरलता और स्पष्टता विशेष रूप से देखी जा सकती है जो पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।
अल्लामा अस्करी ने अपने पूरे जीवन में बहुत से आलेख लिखे जो इस्लाम धर्म के बारे में शोकर्ताओं के लिए दीपक की भांति हैं।