Apr २३, २०१६ ०८:१४ Asia/Kolkata
  • अल्लामा हसनज़ादे आमुलि

इस्लाम ने शिक्षा प्राप्त करने व ज्ञान अर्जित करने की बहुत अधिक सिफ़ारिश की है।

 ज्ञान प्राप्त करने के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है कि ज्ञान प्राप्त करो, ज्ञान दुनिया से और उसके सोने एवं चांदी से बेहतर है। धार्मिक महान हस्तियों ने सदैव इस प्रकार की सिफ़ारिश की है। यही कारण है कि अल्लामा हसनज़ादे आमुलि जैसे लोगों ने ज्ञान प्राप्ति के लिए भरसक प्रयास किया है। वे दार्शनिक, रहस्यवादी, साहित्यकार, गणितज्ञ एवं समकालीन दक्ष खगोलशास्त्री तथा ईरान की गौरवशाली महान हस्तियों में से हैं और इस्लामी जगत की अद्वितीय हस्ती हैं। अल्लामा हसनज़ादे आमुलि ने ईरान का आधिकारिक कैलेंडर तैयार किया है और अनेक मूल्यवान पुस्तकों की रचना की है। लेकिन कहा जा सकता है कि इस रहस्यवादी विद्वान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता निष्ठा, आत्म शुद्धि, नैतिकता एवं विनम्रता उदाहरणीय है।

 

 

अल्लामा हसन हसनज़ादे आमुलि का 1929 के आरम्भ में उत्तरी ईरान के आमुल शहर में जन्म हुआ। अल्लामा स्वयं अपने बचपन के बारे में कहते हैं कि ईश्वर में गहरी आस्था रखने वाले, पवित्र और सच्चे माता पिता से मैंने जन्म लिया है, उन्होंने बहुत जल्दी मुझे मदरसे भेज दिया, जहां मैंने लिखना पढ़ना सीखा, मैं फ़ारसी की सामान्य किताबें पढ़ता था। मैंने अरबी पढ़ना भी सीख लिया तथा क़ुराने मजीद और उस समय के पाठ्यक्रम की किताबें पढ़ना मेरे लिए बहुत सरल हो गया। 6 वर्ष की आयु में जब पहली कक्षा में प्रवेश लिया तो कुछ ही दिन बाद गुरु जी ने स्कूल के प्रधानाचार्य से कहा कि इस छात्र को दूसरी कक्षा में भेजना चाहिए, और मुझे दूसरी कक्षा में भेज दिया गया।

 

अल्लामा हसनज़ादे आमुलि को 14 वर्ष की आयु में ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति में रूची हुई। उस समय ईरान में तानाशाही शासन का प्रयास होता था कि धार्मिक शिक्षा व धार्मिक विद्वानों को अलग थलग कर दे। अल्लामा हसनज़ादे आमुलि के कथानुसार, ईश्वरीय विद्वान क़ैदियों की भांति अत्याचार एवं शत्रुता की ज़ंजीरों में जकड़े हुए थे, और इस्लाम व क़ुरान का केवल नाम बाक़ी था। मैंने ख़ुद अपने शहर आमुल की मस्जिदों को देखा है कि उनमें से कुछ घास फूंस से भरी हुई थीं और अन्य कुछ भेड़ों और दूसरे जानवरों की चरागाह में परिवर्तित हो गई थीं।

अल्लामा हसनज़ादे आमुलि ने उस घुटन भरे वातावरण में आमुल शहर के दक्ष गुरुओं से गंभीरता से धार्मिक शिक्षा प्राप्त की। उन्हीं वर्षों में वे सुलेखन का भी अभ्यास करते थे और फ़ारसी साहित्य में अधिक रूची के कारण बाबा ताहिर, ख़य्याम और हाफ़िज़ जैसे कवियों की कविताएं याद कर लीं। 6 साल बीत जाने के बाद धार्मिक शिक्षा, अरबी और फ़ारसी साहित्य में आगे की पढ़ाई के लिए वे तेहरान गए और उन्होंने तेहरान प्रसिद्ध गुरुओं से काफ़ी लाभ उठाया। तेहरान में हसनज़ादे आमुलि ने इस्लामी ज्ञान, अबू अली सीना की इशारात, हिकमते मंज़ूमे, किफ़ाया व असफ़ार जैसी पुस्तकों और क़ुराने मजीद की व्याख्या एवं इस्लामी विषयों की शिक्षा प्राप्त की। इसके लगभग तीन वर्षों के बाद अल्लामा हसनज़ादे आमुलि ने मिर्ज़ा अबुल हसन शाअरानी से गणित और खगोल शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की।

 

 

इस युवा छात्र ने अपनी अद्भुत कुशलता एवं रूची के कारण कम ही समय में खगोल शास्त्र की प्रसिद्ध एवं कठिन पुस्तकों के अध्ययन में सफलता प्राप्त की। कम ही समय में इन कठिन विषयों की शिक्षा प्राप्त करना अल्लामा हसनज़ादे आमुलि के साहस एवं बुद्धिमत्ता को दर्शाता है। उन्होंने कई बार इन विषयों की शिक्षा प्राप्ति के लिए आयतुल्लाह मिर्ज़ा अबुल हसन शाअरानी का आभार व्यक्त किया और उन्हें अपने समय का सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी एवं विद्वान बताया।

 

अल्लामा हसनज़ादे आमुलि ने गणित और खगोल शास्त्र जैसे कठिन विषयों की शिक्षा प्राप्ति के बावजूद पांच साल तक हाज मिर्ज़ा अबुल हसन क़ज़वीनी की सेवा में उपस्थित होकर धर्मशास्त्र, उच्च धार्मिक शिक्षा व इस्लामी रहस्यवाद की शिक्षा प्राप्त की।

 

 अल्लामा हसनज़ादे आमुलि तेहरान में 13 वर्षों तक अपने समय के विभिन्न विषयों की शिक्षा ग्रहण करने के बाद 1963 में धार्मिक शिक्षा के केन्द्र क़ुम चले गए। उन्होंने वहां 17 वर्ष तक क़ुरान की व्याख्या अलमीज़ान के लेखक एवं नैतिकता एवं दर्शन शास्त्र के गुरु अल्लामा सैय्यद मोहम्मद हुसैन तबातबाई से दर्शन शास्त्र व रहस्यवाद की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने क़ुम में रहस्यवाद और दर्शन शास्त्र के अन्य गुरुओं की कक्षाओं में भी भाग लिया और इस्लामी एवं रहस्यवाद की उच्च विशेषताओं को प्राप्त किया।

 

उस समय अल्लामा हसनज़ादे आमुलि अपने युग के संभ्रांत व्यक्ति में परिवर्तित हो चुके थे और समस्त गुरु व विद्वान उनका विशेष सम्मान करते थे। कुछ समय बाद उन्होंने धार्मिक शिक्षा केन्द्र क़ुम के दक्ष विद्वानों की सिफ़ारिश पर विभिन्न विषयों को पढ़ाना शुरू किया। अल्लामा ने लगभग पिछले तीस वर्षों में गणित, दर्शन शास्त्र, और खगोल शास्त्र जैसे विषयों की शिक्षा दी तथा धार्मिक शिक्षा केन्द्र में पढ़ाने के अतिरिक्त विश्वविद्यालयों से भी जुड़े रहे। इसी प्रकार उन्होंने मूल्यवान किताबें एवं लेख लिखे, केवल उनकी किताबों की संख्या 60 से भी अधिक है।

 

अल्लामा हसनज़ादे आमुलि खगोल शास्त्र में इस स्तर पर पहुंच गए हैं कि उन्होंने अपने सटीक आंकड़ों के आधार पर कैलेंडर तैयार किया है। वे जिस समय कैलेंडर तैयार करने में व्यस्त थे उस समय की एक घटना को याद करते हुए कहते हैं कि एक वर्ष समस्त खगोल शास्त्रियों एवं गणितज्ञों ने पवित्र रमज़ान के महीने को 30 दिन का बताया लेकिन मेरे हिसाब किताब और आंकड़ों के अनुसार, रमज़ान का महीना 29 दिन का था। मुझ से कहा गया कि कोई भी खगोल शास्त्री व गणितज्ञ आपके दृष्टिकोण से सहमत नहीं है और आप अकेले हैं, मैं भी उत्तर देता था कि मेरे आंकड़े यही बता रहे हैं और ईश्वर ने चाहा तो पता चल जाएगा कि किसका हिसाब किताब सटीक नहीं है। अंततः समय आ गया और 29 रमज़ान को सूर्यास्त के समय चांद निकल आया।

 

अल्लामा हसनज़ादे आमुलि वर्तमान समय के एक दक्ष गणितज्ञ भी हैं। गणित के बारे में उनका दृष्टिकोण बहुत दिलचस्प है, उनका मानना है कि गणित का धर्म से संबंध है। इस संदर्भ में अल्लामा कहते हैं कि क्या हम धर्म को गणित से अलग कर सकते हैं? उसूले काफ़ी में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) का एक पवित्र कथन है जिसमें इमाम अपने एक साथी से कहते हैं कि समस्त वस्तुओं की सृष्टि ज्यामितीय हुई है। उन श्रीमान जी ने ज्यामिति शब्द नहीं सुना था और उन्हें नहीं पता था कि ज्यामिति क्या है इसलिए इमाम (अ) से पूछा कि ज्यामिति क्या है? हज़रत इमाम सादिक़ (अ) ने उत्तर दिया कि ज्यामिति का अर्थ है मात्रा एवं आकार। अल्लामा हसनज़ादे इमाम सादिक़ (अ) के कथन के कथन की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि समस्त संसार को आकार के आधार पर बनाया गया है। समस्त शब्द, समस्त कण और जो कुछ भी है उसकी सृष्टि आकार में की गई है। इस प्रकार, गणित की शिक्षा प्राप्त करना धार्मिक छात्रों के लिए आवश्यक है।

 

 

यह जानना दिलचस्प होगा कि अल्लामा हसनज़ादे आमुलि प्राचीन गणित के अलावा नए गणित में भी दक्ष हैं और ईरान के विभिन्न विश्वविद्यालयों के गणित के प्रोफ़ैसर उनके संपर्क में रहते हैं और इस विषय के संबंध में उनसे विचार विमर्श करते हैं। अल्लामा हसनज़ादे आमुलि देश में विभिन्न सम्मेलनों में भाग ले चुके हैं और पत्रिकाओं में भी उनके अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने वर्ष 1362 हिजरी शम्सी में सनअती शरीफ़ विश्वविद्यालय के गणित एवं कम्पयूटर विभाग के अनुरोध पर गणित से संबंधित 6 पुस्तकें लिख कर दीं।

 

अल्लामा हसनज़ादे आमुलि फ़ारसी और अरबी के अतिरिक्त फ़्रैंच भाषा में दक्षता रखते हैं। वे फ़ारसी साहित्य और कविताओं के भी अद्वितीय गुरु हैं। अल्लामा स्वयं भी कवि हैं और सुन्दर ग़ज़लें कहते हैं। इस दक्ष बुद्धिजीवी का एक और महत्वपूर्ण कार्य बहुत प्राचीन पुस्तक कलीले व दिमने का संपादन एवं उसके दो अध्यायों की फ़ारसी में व्याख्या है।

 

उन्होंने रहस्यवाद के उच्च चरणों को तय किया है और वरिष्ठ शिष्यों को तैयार किया है। इस्लामी रहस्यवाद ऐसा शुद्ध झरना है कि जिसका स्रोत क़ुरान, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों के दार्शनिक कथन हैं। वर्तमान समय में अल्लामा हसनज़ादे आमुलि सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादियों में से हैं।