Apr २३, २०१६ ०८:३५ Asia/Kolkata
  • आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी-२

वह गहरी आस्था व व्यापक अध्ययन के कारण बहुत से विषयों की बहुत गहराई से समीक्षा करते हैं।

 आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी की किताबें, लेख और भाषण ये दर्शाते हैं कि वे परिज्ञान, विश्व के दार्शनिक व राजनैतिक मतों को पहचानने, विभिन्न धर्मों और उनमें हुए परिवर्तन की पहचान, नैतिकता, नहजुल बलाग़ा और क़ुरआन को समझने में कितना दक्ष व अनुभवी हैं। आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी वैज्ञानिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा को अनिवार्य समझते हैं और उनका मानना है कि अनैतिकता बहुत सी सामाजिक व व्यक्तिगत बुरायी का कारण बनती है। अब तक बहुत से शिष्यों ने आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी के शैक्षिक एवं नैतिकता के क्लासों से प्रशिक्षण हासिल किया है।

 

     

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी की एक प्रसिद्ध किताब का नाम ‘अंदीशहाए बुनयादीने इस्लामी’ है। यह किताब छह जिल्दों पर आधारित है और इसमें सृष्टि, परिज्ञान, मानवशास्त्र, नैतिकता और राजनीति के रहस्य की समीक्षा की है। इस किताब में आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी ने पाठक के ध्यान को मनुष्य का निर्माण करने वाले मुख्य विषय की ओर मोड़ने का प्रयास किया है। इस किताब को संक्षेप में एक जिल्द में भी पेश किया गया है जिसका शीर्षक है ‘चकीदई अज़ अंदीशहाए बुनयादीने इस्लामी’। इस किताब में आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी चिंतन मनन पर बहुत बल देते हैं। पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम ता उनके पवित्र परिजनों ने भी लोगों को चिंतन-मनन करने पर बल दिया है क्योंकि चिंतन-मनन ऐसी विशेषता है जो मनुष्य को जीव-जन्तु से वरीयता प्रदान करती है और उसे पथभ्रष्टता से बचाती है। अलबत्ता हर प्रकार के विचार प्रशंसनीय नहीं हैं। पवित्र क़ुरआन के सूरए आले इमरान में ईश्वरीय निशानियों में चिंतन-मनन को बेहतरीन विषय कहा गया है, “ निःसंदेह आकाशों और धरती की रचना में और रात-दिन के एक दूसरे के बाद बारी-बारी से आने में बुद्धिमानों के लिए बहुत सी निशानियां हैं। उनके लिए जो खड़े, बैठे और अपने पहलुओं पर अल्लाह को याद करते हैं और आकाशों और धरती की रचना में सोच-विचार करते हैं (और कहते हैं) हमारे रब! तूने ये सब व्यर्थ नहीं बनाया है।”

 

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी इस आयत के आधार पर यह परिणाम पेश करते हैं कि वास्तविक विचारक लोक-परलोक से संबंधित मामलों के बारे में चिंतन-मनन करते हैं और इस प्रकार अपने और जीवन के उद्देश्य को पा लेते हैं।

 

‘चकीदई अज़ अंदीशहाए बुनयादीने इस्लामी’ में आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी आत्मज्ञान के अभाव को मनुष्य के लिए बड़ी समस्या बताते हैं। उनका मानना है कि मनुष्य सही विचार से आत्मज्ञान प्राप्त करता है और ईश्वर तथा सृष्टि के उद्देश्य को समझ सकता है। यदि मनुष्य में आत्मज्ञान न हो तो ईश्वर के संबंध में उसकी आस्था कमज़ोर होगी। इसलिए अपने जीवन के एक चरण में भले कर्म करता है तो जीवन के दूसरे चरण में हर चीज़ के बारे में संदेह करता है और ऐसा व्यक्ति संभव है ईश्वर के अस्तित्व के बारे में भी संदेह करे और वह इस स्तर तर गिर जाए।

 

 

उस्ताद मिस्बाह यज़्दी की एक और महत्वपूर्ण किताब का नाम है ‘सिलसिले मबाहिसे इस्लाम, सियासत व हुकूमत’। यह किताब वास्तव में आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी के भाषणों का संकलन है। इसे आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी के शिष्यों ने संकलित कर किताब का रूप दिया है। किताब ‘सिलसिले मबाहिसे इस्लाम, सियासत व हुकूमत’में आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी पहले स्वतंत्रता व क़ानून के संबंध में उदारवादी दृष्टिकोण की समीक्षा करते हैं और फिर धर्म और राजनीति में अटूट संबंध तथा लोक-परलोक के साथ धर्म के संबंध पर इस्लाम के दृष्टिकोण को पेश करते हैं।

उस्ताद मिस्बाह यज़्दी पश्चिम के क़ानून की व्याख्या में कहते हैं कि पश्चिमी संस्कृति में मानववाद ही आधार है और सारे नियम इसी को आधार मान कर बनाए गए हैं। उस्ताद मिस्बाह की दृष्टि में मानववादी विचारधारा मनुष्य को ईश्वर का उत्तराधिकारी दर्शाती है और सारे नियम मनुष्य की इच्छाओं के आधार पर बनाए जाते हैं। जबकि मनुष्य में कुछ ऐसी विशेषताए हैं जैसे ज्ञान व वैचारिक शक्ति का सीमित होना, वासनाओं में रूचि, द्वेष, ईर्ष्या और अपना स्वार्थ साधने जैसे घटिया विशेषताएं इस बात का कारण बनती हैं उसकी बहुत सी इच्छाएं वास्तव में उसके लिए हानिकारक हों।

 

 

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी अपनी किताब ‘सिलसिले मबाहिसे इस्लाम, सियासत व हुकूमत’ में मानववाद की समीक्षा में लिखते हैः “मानववादी दृष्टिकोण के आधार पर जो नियम बनाए गए हैं उनके दो मूल रूप हैं। मनुष्य को ध्रुव मानने के कारण जो रुझान पैदा होता है वह धर्म को राजनीति से अलग मानता है और धर्म को केवल व्यक्तिगत जीवन में स्थान देता है। मानववाद का दूसरा रूप उदारवाद का आधार बनता है जिसमें मनुष्य को निरंकुश स्वतंत्रता की बात की जाती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार हर व्यक्ति उस सीमा तक स्वतंत्र है जब तक वह दूसरों की आज़ादी में रुकावट खड़ी न करे। दूसरे शब्दों में किसी व्यक्ति को दूसरे के मामले में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है कि यह दृष्टिकोण समाज में अराजकता का कारण बनेगा।”

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी पश्चिम की मानववादी विचारधारा और मनुष्य को केन्द्र मान कर बनाए गए नियमों की समीक्षा करते हुए मनुष्य का निर्माण करने वाले इस्लामी क़ानून की व्याख्या में कहते हैः“ इस्लाम ने मनुष्य के आध्यात्मिक हितों के आधार पर नियम बनाए हैं और क़ानून को केवल सामाजिक व्यवस्था व सुरक्षा की स्थापना तक सीमित नहीं मानता। इस्लामी की दृष्टि में क़ानून इसलिए बनाए जाते हैं ताकि मनुष्य के सही जीवन को रेखांकित करे और समाज का भौतिक व आध्यात्मिक हितों की ओर मार्गदर्शन करे।”

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी, इस्लामी नियमों की व्याख्या में इस्लामी शासन में वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिका के बारे में भी इशारा करते हैं कि जिसे वलीये फ़क़ीह कहा जाता है। आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी समाज में वलीये फ़क़ीह के कर्तव्यों की उदारवादी शासन के कर्तव्यों से तुलना करते हैं और बताते हैं कि इस्लामी शासन और उदारवादी शासन के कर्तव्यों में बहुत अंतर पाया जाता है।

 

 

वह अपनी किताब ‘सिलसिले मबाहिसे इस्लाम, सियासत व हुकूमत’में लिखते हैं कि इस्लामी समाज में शासक आध्यात्मिक हितों को दृष्टिगत रखता है। इस्लामी शासक वह है जो समाज के आध्यात्मिक हितों को व्यवहारिक बनाता है और जो चीज़ें इन हितों को ख़तरें में डाल सकती हैं, उन्हें रोकता है। जबकि उदारवादी व प्रजातांत्रिक व्यवस्था के शासक के लिए ज़रूरी होता है कि वह लोगों की इच्छाओं व वासनाओं के व्यवहारिक होने की पृष्ठिभूमि मुहैया कराए और साथ ही अराजकता व अव्यवस्था को भी रोके।

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी ने अपनी किताबों व भाषणों में सृष्टि में मनुष्य के स्थान व भूमिका पर चर्चा की है। इस संदर्भ में उस्ताद मिस्बाह यज़्दी के भाषण ज़्यादातर आत्मज्ञान के बारे में हैं। आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी का मानना है कि मनुष्य के शारीरिक विकास के साथ साथ आध्यात्मिक विकास भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि यदि मनुष्य का केवल शारीरिक विकास हो और व्यक्तित्व का विकास न हो तो उसमें और अन्य जीव-जन्तुओं में क्या अंतर रह जाएगा? आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के बारे में कहते हैः सभी जीव-जन्तु के जीवन के लिए विशेष स्थिति का होना ज़रूरी है। इन्हीं प्राणियों में मनुष्य नाम के एक प्राणी को भी पैदा किया गया है जो अपने जीवन के लिए परिस्थिति स्वयं मुहैया कर सकता है। इस प्राणी को अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है जिसे हासिल करना उसके लिए ज़रूरी होता है और इसके साथ ही उन चीज़ों के इस्तेमाल का तरीक़ा जानना भी ज़रूरी होता है।

 

 

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी का मानना है कि जिस प्रकार मनुष्य के जीवन का भौतिक आयाम को खाना एवं अन्य पदार्थों की ज़रूरत होता है, उसी प्रकार उसके आत्मिक आयाम को भी आत्मिक चीज़ों की ज़रूरत होती है जिसे उसे प्राप्त करना चाहिए और उन आत्मिक चीज़ों से आत्मिक विकास कर सकता है।

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी कहते हैः मनुष्य के निर्माण का मूल स्तंभ उसके विचारों व आस्थाओं का सही होना है। हर व्यक्ति को चाहिए कि अपने ज्ञान को संकल्प द्वारा व्यवहार में उतारे। इस्लामी शब्दावली में इसे शिक्षा व आत्मनिर्माण कहते हैं। इस प्रकार व्यक्ति अपने भीतर आध्यात्मिक परिवर्तन लाता है और ईश्वर के निकट हो जाता है।

 

 

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी ईश्वर के बंदों की विशेषता बयान करते हैं। वह कहते हैं कि ईश्वर के बंदे और शैतान के बंदों में अंतर उनकी विचारधारा के कारण है। अर्थात एक ईश्वरीय बंदे की विचारधारा धार्मिक शिक्षाओं के आधार पर बनती है और वह हर चीज़ को तत्वदर्शी ईश्वर की रचना समझता है। किन्तु इसके विपरीत शैतान के अनुसरणकर्ता की विचारधारा अलग होती है। वह सृष्टि को एक संयोगवश घटना व उद्देश्यहीन प्रक्रिया समझता है और ऐसा व्यक्ति सृष्टि में ईश्वर के अस्तित्व एवं उसके प्रभाव से अनभिज्ञ होता है।

दूसरी ओर ईश्वरीय बंदे का मानना है कि वह अपने संकल्प में स्वतंत्र है इसलिए वह अपने संकल्प एवं कौशल द्वारा अपने जीवन को ईश्वरीय आदेशानुसार ढालने की कोशिश करता है। ईश्वर का बंदा अपने हर व्यवहार के लिए स्वयं को ज़िम्मेदार समझता है इसलिए वह अपने कर्म व व्यवहार पर बहुत पैनी दृष्टि रखता है किन्तु शैतान का अनुसरणकर्ता स्वयं को सृष्टि की घटनाओं में मजबूर समझता है और बुरे मार्ग का चयन करता है।

 

 

आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी अपने दृष्टिकोण को बयान करते हुए कहते हैः हम सृष्टि के संबंध में इस विचारधारा के आधार पर संसार को अव्यवस्थित नहीं मानते बल्कि स्वयं को एक ज़िम्मेदार प्राणी समझते हैं और इस ज़िम्मेदारी को समझने की कोशिश में हैं और इसी प्रकार यह समझना चाहते हैं कि इन ज़िम्मेदारियों को अंजाम देकर हम किस प्रकार अमर कल्याण प्राप्त कर सकते हैं।