Apr २३, २०१६ ०८:३६ Asia/Kolkata
  • डा. सैय्यद जाफ़र शहीदी

ईरान के धार्मिक बुद्धिजीवियों और महान साहित्यकारों में से एक डा. सैय्यद जाफ़र शहीदी हैं।

 वे देहख़ुदा शब्दकोष संस्था के प्रमुख, फ़ारसी भाषा के अंतरराष्ट्रीय केन्द्र के प्रमुख, तेहरान विश्वविद्यालय में प्रोफ़ैसर तथा फ़ारसी भाषा, धर्मशास्त्र और इस्लामी इतिहास के विशिष्ट शोधकर्ता थे। उनकी रचनाओं में लगभग 15 किताबें, 120 लेख और विभिन्न व्याख्याएं हैं और डा. शहीदी की कुछ किताबों का विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

 

फ़ारसी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में डा. शहीदी की अधिक सेवाओं और प्रयासों के कारण सन् 1995 में राष्ट्रपति की ओर से उन्हें देश के प्रथम शैक्षिक पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।

सैय्यद जाफ़र शहीदी का जन्म वर्ष 1918 में पश्चिमी ईरान के ब्रुजर्द शहर के एक धार्मिक परिवार में हुआ। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा अपने पैत्रिक शहर में प्राप्त की और हाईस्कूल की शिक्षा ग्रहण करने हेतु तेहरान चले आए। इन वर्षों में उन्होंने काफ़ी प्रगति की, वे एक बुद्धिमानी छात्र थे। लेकिन धार्मिक शिक्षा में रूची के कारण इण्टरमीडिएट के बाद उन्होंने तेहरान के धार्मिक शिक्षा केन्द्र में प्रवेश लिया और उसके बाद क़ुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र में शिक्षा ग्रहण की।

 

डा. शहीदी ने उस समय के क़ुम के महान गुरुओं जैसे कि आयतुल्लाहिल उज़मा ब्रुजर्दी और अन्य विशिष्ट गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की। 1941 में डा. शहीदी ने ज्ञान के केन्द्र एवं पवित्र धार्मिक शहर नजफ़ में क़दम रखा और आठ वर्षों तक उच्च शिक्षा ग्रहण की, लेकिन गंभीर रोग के कारण वापस ईरान लौट आए और अपना उपचार कराया।

 

1951 में तत्कालीन शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री के प्रस्ताव पर डा. शहीदी ने कॉलिज में पढ़ाना शुरू किया और अरबी भाषा में दक्ष होने के कारण वे एक अच्छे शिक्षक सिद्ध हुए। वर्ष 1953 में उन्होंने तेहरान विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। डा. शहीदी ने डा. मोहक़्किक़ के सहयोग से वर्ष 1956 में अरबी भाषा के व्याकरण के विषय पर तीन किताबें लिखीं जो कॉलिजों पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। इन किताबों को इस प्रकार से लिखा गया था कि छात्रों को शुरू से ही अरबी भाषा में रूची उत्पन्न हो जाए और वे अरबी लिखने और बोलने में दक्षता प्राप्त कर लें।

 

डा. शहीदी की नैतिक एवं शैक्षिक महत्वपूर्ण विशेषताओं के कारण विशिष्ट बुद्धिजीवी उनकी ओर आकर्षित हुए। उन्हीं में से एक मोईन शब्दकोष के लेखक डा. मोईन हैं। शहीदी ने डा. मोईन के माध्यम से अल्लामा अली अकबर देहख़ुदा से संपर्क स्थापित किया। अल्लामा देहख़ुदा साहित्य के विशिष्ट गुरू एवं देहख़ुदा शब्दकोष के लेखक थे और डा. शहीदी के लिए बड़े गौरव की बात थी कि वे अल्लामा देहख़ुदा के साथ सहयोग करें। देहख़ुदा ने डा. शहीदी से परिचय होने के बाद उनकी योग्यताओं को देखकर उन्हें सहयोग के लिए आमंत्रित किया और तत्कालीन संस्कृति मंत्री को पत्र लिखा कि अगर डा. शहीदी अद्वितीय नहीं तो अनूठे ज़रूर हैं।

उसके बाद से डा. शहीदी ने कॉलिज में पढ़ाना कम कर दिया और अपना अधिकांश समय देहख़ुदा शब्दकोष संस्था में बिताना शुरू कर दिया।

 

1961 में उन्होंने फ़ारसी साहित्य में तेहरान विश्वविद्यालय से डाक्टरेट की डिग्री प्राप्त की और शैक्षिक कुशलता के कारण शीघ्र ही विश्वविद्यालय में प्रोफ़ैसर हो गए। 1968 में तेहरान विश्वविद्यालय के अरबी भाषा और साहित्य के विभाग के प्रमुख के रूप में उनका चयन हुआ। उस समय डा. शहीदी विश्वविद्यालय के अद्वितीय गुरुओं में माने जाते थे। छात्र न केवल डा. शहीदी के ज्ञान से लाभान्वित होते थे बल्कि उनकी नैतिक विशेषताओं से भी अधिक प्रभावित होते थे।

 

डा. शहीदी के प्रयासों के कारण, विभिन्न देशों से फ़ारसी साहित्य के अनेक प्रोफ़ैसर तेहरान विश्वविद्यालय आते थे और विभिन्न समारोहों में भाग लेते थे। वास्तव में विभिन्न देशों में फ़ारसी साहित्य के विशेषज्ञों के साथ सहयोग करके डा. शहीदी उन देशों में फ़ारसी भाषा के विस्तार का प्रयास कर रहे थे। उनके समकालीन शिक्षकों का भी मानना है कि डा. शहीदी ने तेहरान विश्वविद्यालय के फ़ारसी साहित्य के कॉलेज की प्रगति एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

शब्दकोष लिखने और फ़ारसी एवं अरबी साहित्य पर अच्छी पकड़ एवं विशेषता के दृष्टिगत डा. शहीदी को डा. मोईन के निधन के बाद देहख़ुदा शब्दकोष संस्था का प्रमुख बनाया गया, उनके नेतृत्व में इस संस्था ने इस्लामी इतिहास और फ़ारसी साहित्य के क्षेत्र में अनेक किताबें प्रकाशित कीं।

 

डा. शहीदी को इस्लामी इतिहास, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और इमामों के जीवन से लगाव था। वे बहुत ही रूची से इस्लामी इतिहास का अध्ययन करते थे और ऐतिहासिक घटनाक्रमों की समीक्षा करते थे। इस्लामी इतिहास के विषयों में उनकी मूल्यवान रचनाएं हैं जिनमें से क़यामे इमाम हुसैन (अ), ज़िन्दगानी फ़ातेमा ज़हरा (स) ज़िन्दगानी अली इब्ने हुसैन (अ), शीरे ज़ने करबला और अबूज़र ग़फ्फ़ारी का नाम लिया जा सकता है।

डा. शहीदी की महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान रचनाओं में से एक पवित्र किताब नहजुल बलाग़ा का अनुवाद एवं व्याख्या है। उन्होंने इस किताब में हज़रत अली (अ) के सुन्दर एवं बुद्धिमानी कथनों का बहुत ही सुन्दरता से फ़ारसी में अनुवाद किया है। नहजुल बलाग़ा की व्याख्या और अनुवाद पर आधारित डा. शहीदी की किताब को सरल एवं अच्छे अनुवाद के कारण वर्ष 1369 हिजरी शम्सी में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ किताब घोषित किया गया।

 

डा. शहीदी ने फ़ारसी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में बहुत प्रयास किए तथा उन्हें साहित्य एवं शैक्षिक गलियारों में एक दक्ष शोधकर्ता एवं अध्ययनकर्ता के रूप में पहचाना जाता था।

डा. शहीदी अपने विशेष स्थान के बावजूद हमेशा विनम्र एवं शिष्ट रहे और अंहकार, घमंड, ग़ुरूर से दूर रहे तथा उच्च स्थान की प्राप्ति एवं अत्यधिक इच्छाओं के चक्कर में नहीं पड़े। उनके शिष्य एवं विश्वविद्यालय के प्रोफ़ैसर डा. ग़ुलाम अली हद्दाद आदिल कहते हैं कि डा. शहीदी एक प्रतिबद्ध विद्वान थे। वे अग्रिम पंक्ति के विद्वानों में से थे और धर्म में गहरी आस्था रखने वाले एवं वचनबद्ध थे तथा ज्ञान को जनता, धर्म और समाज की सेवा में प्रयोग करते थे... डा. शहीदी उन धार्मिक विद्वानों में से थे कि जो यद्यपि विश्वविद्यालय से जुड़ गए थे लेकिन उन्होंने अपने दृष्टिकोण एवं व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया और धार्मिक आध्यात्म एवं विश्वासों से दूरी नहीं की।

 

डा. शहीदी के बारे में यह बात सुनने योग्य है कि वे सदैव नमाज़ का समय होते ही नमाज़ पढ़ते थे। डा. शहीदी हर तरह की परिस्थितियों में यहां तक कि अगर किसी महत्वपूर्ण सम्मेलन की अध्यक्षता भी कर रहे होते थे तो प्रथम समय में नमाज़ पढ़ना नहीं भूलते थे।

डा. शहीदी ने अधिक किताबों, लेखों और भाषणों के अलावा देश के शैक्षणिक केन्द्रों, विश्वविद्यालयों, इस्लामी देशों एवं अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलनों में भी भाग लिया। इस महान विद्वान ने इस्लाम के प्रारम्भिक इतिहास और ईरान एवं अरब के साहित्य व इतिहास में दक्षता के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपने ज्ञान से लाभान्वित किया। डा. शहीदी की मूल्यवान सेवाओं का सम्मान करते हुए बीजिंग विश्वविद्यालय ने भी उन्हें डाक्टरेट की डिग्री से सम्मानित किया।

 

डा. शहीदी के मूल्यवान कार्यों में से एक यह था कि उन्होंने इस्लामी जगत के समस्त कवियों एवं लेखकों का अध्ययन किया ताकि इस्लामी संस्कृति के क्षेत्र में अपने अध्ययन को पूरा कर सकें। उनके इस कार्य ने इस्लामी देशों में एकजुटता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभाई।

डा. शहीदी ने 1374 हिजरी शम्सी में अपना घर तेहरान नगरपालिका को सौंप दिया और यह घर उसी वर्ष डा. शहीदी सार्वजनिक पुस्तकालय में परिवर्तित हो गया। वर्तमान समय में डा. शहीदी पुस्तकालय में 30 हज़ार किताबें मौजूद हैं।

 

सन 2007 में 89 वर्ष की आयु में डा. शहीदी का निधन हो गया। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई ने विशिष्ट विद्धवान के निधन के अवसर पर अपने संदेश में संवेदना प्रकट करते हुए कहा था कि वे एक दक्ष साहित्यकार, गहरी दृष्टि रखने वाले इतिहासकार, विशिष्ट एवं उदार मनुष्य और इस समय की शैक्षणिक हस्तियों में से थे तथा उन्होंने मूल्यवान एवं अमर रचनाएं छोड़ी हैं।

डा. शहीदी की कुछ किताबें इस प्रकार हैं: जिनायाते तारीख़, तीन खंडों में, तारीख़े तहलीली इस्लाम ता पायाने अमवीयान, शरहे मसनवी, अली अज़ ज़बाने अली।

डा. शहीदी की कुछ किताबों का अरबी, तुर्की, जर्मन और यूनानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है।