Apr २३, २०१६ ०८:५९ Asia/Kolkata
  • डा. अली अकबर विलायती

डा. अली अकबर विलायती कई वर्षों तक इस्लामी गणतंत्र ईरान के विदेश मंत्री के पद पर आसीन रहे हैं, इस प्रकार अनेक घटनाक्रमों को उन्होंने निकट से देखा है।

उन्होंने इस ज़िम्मेदारी की समाप्ति के बाद, इस्लामी क्रांति से पूर्व फ़िलिस्तीन और ईरान एवं ज़ायोनी शासन के संबंधों के बारे में दो महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। डा. विलायती की पहली किताब का नाम “ईरान और फ़िलिस्तीनी घटनाक्रम” है, यह किताब 1938 से 1978 तक पहलवी शासन की नीतियों से संबंधित दस्तावेज़ों पर आधारित है और यह वर्ष 2001 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब कि जो ईरान और ज़ायोनी शासन के संबंधों से संबंधित गुप्त दस्तावेज़ों पर आधारित है, ईरान में शाही शासन के दौरान, ईरान और इस्राईल के बीच विनिमय हुए आधिकारिक दस्तावेज़ों पर ध्यान केन्द्रित करती है। ऐसे दस्तावेज़ कि जिनमें दूसरे दस्तावेज़ों की तुलना में अधिक कूटनीतिक ध्यान दिया गया है।

 

 

डा. विलायती ने कि जो इन दस्तावेज़ों तक पहुंच रखते थे, “ईरान और फ़िलिस्तीनी घटनाक्रम” किताब को पांच अध्यायों में लिखा है। इस किताब में इस्राईल और पहलवी शासन के कूटनीतिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सुरक्षा संबंधों तथा फ़िलिस्तीनी मुद्दे का ईरान और अरबों के संबंधों पर प्रभाव का दस्तावेज़ों के आधार पर उल्लेख किया गया है।

 “ईरान और फ़िलिस्तीनी घटनाक्रम” किताब में विभिन्न प्रकार की जानकारियां हैं तथा इस किताब में शाही शासन एवं इस्राईल के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सुरक्षा संबंधों का विविरण पेश किया गया है। इस किताब के अध्ययन एवं उसमें प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ों से स्पष्ट हो जाता है कि शाही शासन के काल में ईरान और ज़ायोनी शासन के बीच संबंधों में सबसे अधिक असामानता व्यापार के क्षेत्र में थी। इस प्रकार से कि अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन को बहुत अधिक तेल निर्यात किया जाता था और दूसरी ओर से उसका मूल्य नहीं चुकाया जाता था। इस प्रकार के आर्थिक असमान संबंधों के अलावा, ईरान की अनेक बहुमूल्य एवं प्राचीन वस्तुओं को ज़ायोनियों ने इस्राईल स्थानांतरित कर दिया। इस किताब में उल्लेख है कि 1965 में तेव-अवीव में ईरान के प्रतिनिधि द्वारा भेजी गई रिपोर्ट में था कि इस्राईली संग्राहलय में ईरानी कला का कॉलैक्शन विश्व के अति महत्वपूर्ण कॉलैक्शनों में से है कि जिसका मूल्य 30 लाख डॉलर तक पहुंच रहा है और इस कॉलैक्शन में ऐसी वस्तुएं हैं कि जिनका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता, इसलिए कि विश्व में अद्वितीय हैं। दो साल की अवधि में यरूशलम में जो कॉलैक्शन इकट्ठा हुआ था उसमें इतिहासपूर्व 3000 वर्ष से 16वीं शताब्दी तक के धरोहर शामिल हैं।

 

 

प्राचीन वस्तुओं की चोरी के बारे में तत्कालीन विदेश मंत्री अर्दशीर ज़ाहेदी ने 1347 हिजरी शम्सी में सांस्कृतिक मंत्रालय को लिखा कि यह वस्तुएं किसा प्रकार ईरान से बाहर ले जायी गईं इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन निरंतर जो यहूदी इस्राईल जा रहे हैं उनके सूटकेसों में ईरान की प्राचीन वस्तुएं विशेषकर हस्तलेख वाली किताबें गुप्त रूप से और पुलिस की रोक टोक के बिना इस्राईल ले जायी जा रही हैं। ईरान में ज़ायोनी शासन की अन्य गतिविधियों में से एक ईरानी आंदोलनकारियों को यातनाएं देने के लिए शाही शासन के सुरक्षा बलों को प्रशीक्षण देना था।

इस प्रकार, ज़ायोनी शासन का उद्देश्य कि जिसका घृणित चेहरा अब विश्व वासियों के सामने आ गया है ईरान में केवल आर्थिक लाभ उठाना एवं बड़े पैमाने पर आर्थिक स्रोतों का दुरुपयोग करना था, वास्तव में शासन परिवर्तन एवं इमाम ख़ुमैनी की महत्वकांक्षाओं की ओर लोगों के रुझान का कारण ज़ायोनी शासन से ईरान की शाही सरकार का संबंध था।

 

डा. विलायती को इस्लामी संस्कृति के इतिहास में बहुत रूची है और उन्होंने इस संदर्भ में विस्तृत अध्ययन किया है। डा. विलायती की एक बहुत ही महत्वपूर्ण रचना कि जिसे इतिहास की पुस्तकों में बहुत महत्व प्राप्त है “पूयाइये फ़रहंग व तमद्दुने इस्लाम व ईरान” अर्थात इस्लामी एवं ईरानी संस्कृति का विकास है। यह किताब कि जो चार खंडों पर आधारित है इस्लामी संस्कृति एवं सभ्यता के विकास एवं प्रगति के मार्ग की समीक्षा करती है। “पूयाइये फ़रहंग व तमद्दुने इस्लाम व ईरान” किताब लम्बी अवधि तक किए गए प्रयास और नए विचारों का परिणाम है। डा. विलायती का मानना है कि इस्लामी इतिहास इस बात को दर्शाता है कि इस्लामी संस्कृति एवं सभ्यता का मार्ग बहुत गंभीर है और वह समझने एवं बयान करने योग्य तर्क पर आधारित है कि जो संभवतः इस्लामी इतिहास के दर्शन का ही दूसरा रूप है और यह इतिहास दोहराया जाता है और यदि अगर उसे रेखा के रूप में खींचे तो संभवतः कुछ शताब्दियों में एक दूसरे से बहुत मिलते जुलते एवं समान बिंदुओं तक पहुंचा जा सकता है।

इस किताब के कुछ अध्यायों के शीर्षक इस प्रकार हैं: इस्लामी सभ्यता का विकास, इस्लामी सभ्यता में ज्ञान का विकास, इस्लामी सभ्यता में सामाजिक एवं प्रशासनिक संस्थाएं, इस्लामी सभ्यता में कला, इस्लामी सभ्यता का पश्चिमी सभ्यता पर प्रभाव, इस्लामी सभ्यता की गतिहीनता के कारण, पश्चमी साम्राज्यवाद का इस्लाम पर प्रहार, इस्लामी जागृति का दो सौ साला इतिहास एवं पश्चिमी सभ्यता की आलोचना।

 

 

इस्लामी सभ्यता के इतिहास के क्षेत्र में डा. विलायती की एक दूसरी किताब, इस्लाम और ईरान की सभ्यता एवं संस्कृति में शियों की भूमिका है, इस किताब के दो खंड हैं। इसमें इस्लाम और ईरान की सभ्यता एवं संस्कृति में शियों की भूमिका को दो प्रकार से प्रस्तुत किया गया है। पहले डा. विलायती ने इस्लामी सभ्यता एवं संस्कृति के विस्तार में शिया मदरसों एवं धार्मिक शिक्षा केन्द्रों की निर्णायक भूमिका का उल्लेख किया है और दक्ष शिया बुद्धिजीवियों की रचनाओं एवं सेवाओं को पहचनवाया है।

वास्तव में डा. विलायती ने ईरान के इतिहास में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों से असीम प्रेम की गहरी जड़ों को दर्शाने के लिए अधिक प्रयास किया है और संकेत किया है कि अपने इस्लामी इतिहास में अधिकांश ईरानी नागरिक यहां तक कि अगर शिया भी नहीं थे तो कम से कम उनके हृदय पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों के प्रेम से भरे हुए थे।

 

 

इस्लाम और ईरान की सभ्यता एवं संस्कृति में शियों की भूमिका नामक किताब के दूसरे खंड प्राकृतिक एवं यथार्थ विज्ञान के बुद्धिजीवी में लेखक ने प्राकृतिक एवं यथार्थ विज्ञान की समीक्षा करते हुए उस पर एक संक्षिप्त प्रस्तावना लिखने के बाद, जाबिर बिन हय्यान, मोहम्मद बिन मूसा ख़्वारिज़मि, मोहम्मद बिन ज़करिया राज़ी, अबू नस्र फ़ाराबी, अबू सुहैल कोही, इब्ने सीना, अबू रेहान बेरूनी आदि जैसे बुद्धिजीवियों का विवरण पेश किया है।

 

प्राकृतिक एवं यथार्थ विज्ञान के बुद्धिजीवी नामक किताब में डा. विलायती ज्ञान एवं विद्या के विस्तार में क़ुराने मजीद की अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं कि इस्लामी भूगोल एवं इतिहास में ज्ञान के विकास के तीन मूल कारण हैं। यह इस प्रकार हैं: क़ुराने मजीद, इस्लाम के प्रारम्भ में मदरसे रूपी मस्जिदों एवं शिक्षा केन्द्रों तथा पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथन कारण मुसलमानों ने शिक्षा प्राप्ति में रूची ली। डा. विलायती लिखते हैं कि ज्ञान एवं दूरदर्शिता से परिपूर्ण हज़रत अली (अ) का जीवन, हज़रत अली के शासनकाल और उसके बाद की शताब्दियों में ज्ञान के प्रसार में मस्जिदे कूफ़ा की भूमिका, इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) का काल और उनके चार हज़ार शिष्य तथा इमाम अली रज़ा (अ) के अन्य धर्म के विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ... बौद्धिक ज्ञान में शिया विद्वानों के प्रयास तथा प्राकृतिक एवं यथार्थ विज्ञान में शिया बुद्धिजीवियों की अधिक संख्या को दर्शाता है।

 

 

प्राकृतिक एवं यथार्थ विज्ञान नामक मूल्यवान किताब में प्रसिद्ध शिया विद्वान जाबिर बिन हय्यान के परिचय में हम पढ़ते हैं कि, जाबिर बिन हय्यान रसायन के क्षेत्र एवं खगोल शास्त्र में ईरान के प्रसिद्ध विद्वान थे। यद्यपि रसायन विज्ञान में वे अधिक प्रसिद्ध हैं। संभवतः जाबिर तूस में जन्मे थे। उनके पिता जड़ी बूटियां बेचते थे, उमवी शासक के हाथों शियों के नरसंहार में उनकी भी हत्या कर दी गई थी। जाबिर स्वयं इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के शिष्य थे और अंततः वे शियों के शहर तूस में उनका निधन हुआ। जो कुछ कहा गया है उससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि जाबिर एक शिया विद्वान थे।