Apr २३, २०१६ ०९:०४ Asia/Kolkata
  • हसन रहीमपूर अज़ग़दी

उस्ताद हसन रहीमपूर अज़ग़दी पश्चिमी मतों के विश्लेषण में बहुत दक्ष हैं और वे तर्कपूर्ण मार्गों से अपने संबोधकों को अनुसंधानिक शैली में पश्चिम के वैचारिक मतों से उसके कमज़ोर बिन्दुओं से परिचित कराने में सक्षम हैं।

 उस्ताद हसन रहीमपूर अज़ग़दी का मानना है कि इस समय पश्चिमी मतों के पास मानवता को कोई नई चीज़ देने के लिए नहीं है और ये मत बंद गली में पहुंच चुके हैं। उनकी नज़र में मानववाद, धर्मनिरपेक्षवाद, मार्क्सवाद, उदारवाद, इत्यादि जैसे सभी मत त्रुटीपूर्ण हैं क्योंकि इन मतों ने केवल मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं पर ध्यान दिया और उसकी मूल आवश्यकताओं की अनदेखी की। यही बात पश्चिम में व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में गहरे शून्य का कारण बनी और इसकी जड़ को धर्म से दूरी और ईश्वर को छोड़ने में ढूंढना चाहिए। उस्ताद हसन रहीमपूर अज़ग़दी का मानना है कि इस समय नास्तिकता और अनैतिकता सहित पश्चिमी समाज की दूसरी समस्याओं का कारण ईश्वर, धर्म और नैतिकता से है। इस संदर्भ में वे कहते है, “आधुनिकतावाद में मनुष्य और ईश्वर का स्थान बदल गया है। मन, रूचियां, और मनुष्य के हितों को मुख्य स्थान मिल गया है और जो कुछ इन्हें सीमित करे उसका स्थान दूसरे नंबर पर आता है। मानववाद, उदारवाद, धर्मनिरपेक्षवाद, सबके सबका आधार यही है।”

 

 

उस्ताद हसन रहीमपूर अज़ग़दी का मानना है कि भौतिक तरक़्क़ी के नाम पर अनन्य ईश्वर को छोड़ा नहीं जा सकता और इसे व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन से दूर नहीं किया जा सकता बल्कि सभी भौतिक प्रगति को ईश्वर की वंदना में मनुष्य का सहायक होना चाहिए। वह मनुष्य को पश्चिमी मतों की मनुष्य के बारे में दी गयी परिभाषाओं से इतर मानते हैं। इस संदर्भ में उस्ताद हसन रहीमपूर अज़ग़दी कहते है, “मनुष्य को ईश्वर को पहचानने में अपनी क्षमता को दबाना नहीं चाहिए क्योंकि मनुष्य धरती पर ईश्वर का उत्तराधिकारी बन सकता है। जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैः तुममे से हर एक का मूल्य पूरी दुनिया से ज़्यादा है तो स्वयं को सस्ते में मत बेचो।”

उस्ताद रहीमपूर मनुष्य के संबंध में इस्लाम के दृष्टिकोण के बारे में कहते हैं,“ इस्लाम में मनुष्य न तो ईश्वर का शत्रु है और न ही उसका प्रतिद्वंद्वी बल्कि इस्लाम चाहता है कि मनुष्य ईश्वर का उत्तराधिकार बने। इस्लाम मानवता के एक एक सदस्य को बौद्धिक व नैतिक विकास की उस सीमा तक पहुंचाना चाहता है कि ज़मीन पर एक भी निर्दोष का ख़ून न गिरे, किसी के अधिकार का हनन न हो, कोई व्यक्ति भूखा, बेघर, व दीनता का शिकार न रहे, इस्लाम ऐसा मनुष्य चाहता है जिसे अपनी इच्छाओं पर क़ाबू हो, चयन की शक्ति रखता हो, बुद्धिमान, ज़िम्मेदार, और संस्कारी हो। इस्लाम मनुष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है और पूरी मानवता को पवित्र प्रवृत्ति तथा भलाई की इच्छा रखने वाला मानता है। ईश्वर की ओर से उतरने वाली ज़िम्मेदारियां मनुष्य की प्रवृत्ति, बुद्धि व उदारता की रक्षा के लिए है।”

 

 

उस्ताद रहीमपूर अज़ग़दी का मानना है कि धर्मनिरपेक्षवाद की ख़तरनाक विचारधारा, इस्लाम के मूल्यवान विचारों के सामने है। धर्मनिरपेक्षवाद के विचार में धर्म को जीवन और सत्ता से अलग होना चाहिए। धर्मनिरपेक्षवाद को सरल शब्दों यदि समझाना चाहें तो बस इतना कहना काफ़ी होगा कि यह धर्मपरायणता को व्यक्तिगत जीवन तक सीमित करता है। धर्मनिरपेक्षवाद पर आधारित सत्ता बहुत ख़तरनाक होगी क्योंकि यह अनेकेश्वरवाद और शासन में पाखंड का कारण बनता है। शासन में पाखंड और अनेकेश्वरवाद इतिहास में बहुत से अत्याचारी शासन के अस्तित्व में आने का कारण बना है और इसने ईश्वर पर वास्तविक आस्था रखने वालों का सर्वनाश किया है। उस्ताद रहीमपूर अज़ग़दी सत्ता के संबंध में धर्मनिरपेक्षवादी विचारधारा की व्याख्या में कहते है, “धर्मनिरपेक्षवाद का मानना है कि नैतिकता के साथ सरकार का गठन नहीं किया जा सकता और विशेष रूप से लोगों की रक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए नैतिकता का राजनीति से और धर्मपरायणता हुकूमत से संबंध नहीं है और इसलिए प्रजातांत्रिक व्यवस्था में किसी भी स्थिति में मत पाने के लिए एक सीमा तक धोखाधड़ी और दिखावा अवश्य ज़रूरी है। मत के संबंध में मुख्य बिन्दु उसकी मात्रा है न कि गुणवत्ता इसलिए शासक की ओर से सुदंर झूठ नागरिकों की रक्षा के लिए ज़रूरी है। धर्मनिरपेक्षवाद की नज़र में बुद्धिमान शासक वही है जो बहुत सफ़ाई से झूठ बोलता है। यह बात महत्वपूर्ण नहीं है कि आप सच बोल रहे हैं या झूठ, महत्वपूर्ण यह है कि आप सत्ता हासिल कर लें। धर्मनिरपेक्षवाद के समर्थकों का यह मानना है कि सत्ता की धार्मिक व नैतिक मूल्यों के आधार पर समीक्षा नहीं की जानी चाहिए, सरकार का काम भलाई का सरंक्षण नहीं है। मूल्यों और न्याय की रक्षा की चिंता नहीं करनी चाहिए। सरकार की ज़िम्मेदारी सुरक्षा मुहैया करना है। सरकार को चाहिए कि अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति के क्षेत्रों में स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा मुहैया कराए।”

 

 

उस्ताद रहीमपूर अज़ग़दी धर्मनिरपेक्षवादी विचारधारा के मुक़ाबले में इस्लाम की दृष्टि से शासन व्यवस्था का उल्लेख करते हैं। वह कहते हैं कि इस्लाम में सरकार की स्थापना की मुख्य चिंता न्याय की स्थापना है। उन्होंने इस्लामी न्याय के विषय पर शोध किए हैं और इस संदर्भ में बहुत से भाषण दिए हैं और विशेष रूप से हज़रत अली की दृष्टि में न्याय के विषय की व्याख्या की है।

 

इस संदर्भ में वह कहते हैं,“जिस समय अलवी व्यवहार या शासन शैली के बारे में बात होती है तो हमें इस बिन्दु को समझना चाहिए कि यह किसी एक व्यक्ति या कई बड़े लोगों की बात नहीं है बल्कि यह एक मत के बारे में बात हो रही है कि जिसका स्पष्ट उदाहरण हज़रत अली अलैहिस्सलाम हैं कि जिन्होंने इसी मत से प्रशिक्षण हासिल किया है। वह मत जिसके संस्थापक महान ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम थे और हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस मत के उल्लेखनीय शिष्य हैं। उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम से यह सीखा कि धार्मिक समाज वह समाज है जिसमें बिना ज़बान हिलाए वंचितों के अधिकार को जो अपने अधिकार हासिल करने की शक्ति नहीं रखते, सत्ताधारियों व पैसे वालों से अधिकार दिलाए जाएं किन्तु अत्याचारी व्यवस्था में जनता के दायित्व तो निर्धारित किए जाते हैं किन्तु उनके लिए अधिकार निर्धारित नहीं किए जाते। पूंजिवादी एवं भौतिकवादी व्यवस्था में कि जिसका आधार मनुष्य की इच्छाएं हैं, परिकल्पना की दृष्टि से लोगों केवल अधिकार के स्वामी हैं और उनकी ज़िम्मेदारियों की बात नहीं की जानी चाहिए किन्तु हज़रत अली अलैहिस्सलाम के विचार में हर व्यक्ति के चाहे वह किसी भी धर्म या मत का हो, कुछ अधिकार हैं किन्तु ये अधिकार अकेले नहीं बल्कि इनके साथ कुछ ज़िम्मेदारियां भी हैं। ऐसे अधिकार जो ज़िम्मेदारियों का स्रोत हैं।”

 

 

उस्ताद रहीमपूर अज़ग़दी का मानना है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने लगभग अपने पांच वर्षीय शासन काल में जनता के अधिकारों की रक्षा में अधिक प्रयास किए और दूसरों से ज़्यादा लोगों को लोक-परलोक की परिपूर्णतः तक पहुंचाने में सहायता की। रहीमपूर अज़ग़दी का मानना है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम धर्मनिरपेक्षवाद के दृष्टिकोण के विपरीत, पैग़म्बरे इस्लाम के ऐसे उत्तराधिकारी थे जो रिश्वत लेने वालों, अनपढ़ों, और अत्याचारियों को प्रशासनिक पद नहीं देते थे और उनका उद्देश्य धर्मनिरपेक्षवाद के लक्ष्यों से बिल्कुल भिन्न था। इस संदर्भ में उस्ताद रहीमपूर अज़ग़दी कहते है, “ हज़रत अली ने कहा कि हम भ्रष्ट व बुरे लोगों के गुटों को इस बात की अनुमति नहीं देंगे कि वे जनता की जान-माल व अधिकारों से खिलवाड़ करें। मैं जब तक जीवित हूं उस समय तक कंजूस, लोभी, सांसारिक मोहमाया में डूबे हुए लोगों को जनता पर शासन नहीं करने दूंगा और न ही सत्ता में स्थान दूंगा। मूर्ख व अनपढ़ लोगों को प्रशासन में आने नहीं दूंगा कि वे समाज को विचलित कर दें। अत्याचारियों व बाहुबलियों को लोगों पर शासन नहीं करने दूंगा कि अन्याय करें, लोगों की धन संपत्ति को लूटें, निर्धनता फैलाएं और हर चीज़ का औचित्य पेश करें, सज्जन लोगों को समाज में वंचित रखें। रिश्वत लेने वालों को प्रशासन में आने नहीं दूंगा कि पीड़ितों के अधिकार नज़रअंदाज़ कर दिए जाएं।”

 

 

उस्ताद रहीमपूर अज़ग़दी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शासन काल की विशेषताओं का यूं उल्लेख करते हैं, “यह हज़रत अली इब्ने अबी तालिब हैं कि जब मालिके अश्तर को मिस्र का शासक बनाकर भेजते हैं तो उनसे कहते हैं कि लोगों से बात करना, उनसे मिलना-जुलना, लोगों से ज़्यादा दूरी न बढ़ाना। यदि लोग तुम पर शक करें और पीठ पीछे बात करें तो चुप न रहना बल्कि लोगों को स्पष्टीकरण देना और हाथ की हथेली के समान जनता के सामने स्पष्ट रहो। अपनी समस्याओं से जनता को अवगत रखो और यदि किसी काम को न कर सके तो जनता से क्षमायाचना करो। हज़रत अली ने जनता से कहाः मैं तुम्हारी सेवा करता हूं किन्तु तुम्हारा दास नहीं हूं। तुम लोग भी हमारे दास नहीं हो। केवल ईश्वर हमारा स्वामी है। अलबत्ता तुम्हारे संबंध में मुझ पर कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जो ईश्वर मुझसे चाहता है और मैं इस ज़िम्मेदारी को निभाउंगा चाहे तुम लोग मुझे पीठ दिखाओ। तुम्हारी सेवा की जो ज़िम्मेदारी मुझ पर उसे मैं अंजाम दूंगा। यदि तुम मुझसे रूठे रहोगे तब भी मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूंगा। मैं अपनी ज़िम्मेदारी पर अमल करूंगा।”