अनवरी अबीवर्दी-1
अनवरी अबीवर्दी का पूरा नाम औहदुद्दीन मुहम्मद बिन अली अनवरी था।
उनका संबन्ध छठी हिजरी क़मरी था। अनवरी अबीवर्दी की सटीक जन्म तिथि के बारे में ज्ञात नहीं है किंतु इतना पता है कि सलजूक़िया काल में सुल्तान सेंजर के शासनकाल में वे जीवन व्यतीत करते थे। अनवरी अबीवर्दी, ख़ुरासान के एक छोटे से नगर अबीवर्द में रहा करते थे। उनका जन्म एक साहित्यकार परिवार में हुआ। उन्होंने साहित्य के अतिरिक्त दर्शनशास्त्र, गणति, खगोलशास्त्र और संगीत का भी अध्ययन किया। अनवरी अबीवर्दी ने लगभग सभी विषयों में दक्षता प्राप्त करने की कोशिश की और इसके लिए बहुत प्रयास किये। बाद में उनको महान दार्शनिक के रूप में जाना जाने लगा। क्योकि उनके पिता भी एक जानेमाने साहित्यकार और शिक्षित व्यक्ति थे इसलिए अबीवर्दी के पास ज्ञान अर्जित करने की संभावनाएं मौजूद थीं। अनवरी अबीवर्दी ने जिस मदरसे में पढ़ा था उसका नाम मंसूरिया मदरसा था। यह मदरसा उस समय तूस का विख्यात मदरसा था जहां पर प्रभावशाली और गण्मान्य लोगों के बच्चे पढ़ा करते थे।
अनवरी को अपने काल का महान विद्वान माना जाता था। उनके शेरों में भी उनके ज्ञान ही छाप दिखाई देती है। विभिन्न स्रोतो से भी अनवरी अबीवर्दी की महानता और उनके ज्ञान की पुष्टि होती है। ऊफ़ी ने अपनी पुस्तक, लोबाबुल अलबाब में अबीवर्दी की योग्यता और उनके ज्ञान की प्रशंसा की है। अनवरी अबीवर्दी, विश्व विख्यात विद्वान इब्ने सीना के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने अपने कई लेखों में इब्ने सीना की प्रशंसा की है।
शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही अनवरी अबीवर्दी ने कविता के क्षेत्र में भी दक्षता प्राप्त कर ली थी। अपने युवाकाल में उन्होंने सुल्तान सेंजर के दरबार में अपना स्थान बना लिया था। बहुत से शोधकर्ताओं का मानना है कि अनवरी अबीवर्दी ने अपने जीवन का अधिकांश समय सुल्तान सेंजर के दरबार में ही गुज़ारा था। स्वयं अबीवर्दी का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन के 30 वर्ष, सुल्तान सेंजर के दरबार में गुज़ारे थे। बाद में वे राज-दरबार से अलग हो गए और एकांत में जीवन व्यतीत करने लगे थे। कुछ लोगों का कहना है कि दरबार से अलग होने के बाद वे बल्ख़ में रहने लगे थे। छठी हिजरी क़मरी के अन्तिम दिनों में उनका देहांत हो गया। अनवरी अबीवर्दी को सुल्तान अहमद ख़ज़रवी के मक़बरे में दफ़न कर दिया गया।
इस बारे में मतभेद पाया जाता है कि अबीवर्दी का धर्म क्या था। कुछ लोग उनको शिया मुसलमान बताते हैं जबकि कुछ का कहना है कि वे सुन्नी मुसलमान थे। अनवरी अबीवर्दी ने अपने शेरों में पैग़म्बरे इस्लाम (स) और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की प्रशंसा की है जबकि मुसलमानों के चारों ख़लीफ़ाओं की प्रशंसा में भी उनके शेर मिलते हैं। उनकी जीवनी लिखने वालों का कहना है कि एक बार अनवरी अबीवर्दी ने एक कवि को देखा जो उनके मदरसे के पास से गुज़र रहा था। उन्होंने देखा कि लोग उस कवि को बहुत सम्मान दे रहे हैं। इस घटना के बाद उनके भीतर शेर कहने की भावना जागृत हुई। फिर उन्होंने शेर कहने आरंभ किये। अबीवर्दी ने सुल्तान सेंजर की प्रशंसा में एक क़सीदा कहा था जिसके बाद उन्हें दरबार में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके क़सीदे से सुल्तान बहुत प्रसन्न हुआ और उसके बाद से वे तीन दशकों तक लगातार सुल्तान सेंजर के दरबार में रहे।
अनवरी अबीवर्दी के जीवन में एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना घटी जिसके बाद वे दरबार से अलग हो गए और अलग-थलग रहने लगे। अनवरी अबीवर्दी जहां एक अच्छे कवि थे वहीं उनको खगोल शास्त्र का भी गहरा ज्ञान था इसलिए वे दरबार में राजा के ज्योतिषि के रूप में भी सक्रिय रहा करते थे। उन्होंने 29 जमादिस्सानी सन 582 हिजरी क़मरी के बारे में एक भविष्यवाणी की थी। अनवरी अबीवर्दी का कहना था कि 29 जमादिस्सानी 582 हिजरी क़मरी को विश्व में एक महा क्रांति आएगी। बाद में उस दिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इससे दरबार में अबीवर्दी की साख कम हो गई। उस काल के कवियों ने अपनी कविताओं में उनका मज़ाक़ उड़ाया। बाद के विद्वानों ने बताया कि अनवरी अबीवर्दी ने जो भविष्यवाठी की थी वह ग़लत नहीं थी क्योंकि इस तारीख़ को चेगेज़ ख़ान का जन्म हुआ था जिसने बाद में संसार में बहुत तबाही मचाई। बाद में चगेज़ ख़ान ने ख़ुरासान में भी तबाही मचाई थी जिससे पता चलता है कि अबीवर्दी की भविष्यवाणी को ग़लत नहीं कहा जा सकता।
अनवरी अबीवर्दी वास्तव में एक दक्ष कवि थे और उनके बाद के बहुत से कवियों ने उनको महान कवि कहा है। कुछ प्राचीन कवियों का तो यहां तक कहना है कि अनवरी अबीवर्दी, फ़ार्सी साहित्य के तीन महान कवियों में से एक हैं। अबीवर्दी का काल वह काल है जिसमें क़सीदा कहने की कला अपने चरम पर थी। वास्तव में जिन कवियों ने अनवरी अबीवर्दी को महान कवि या गुरू के रूप में बताया है, उन्होंने उनके क़सीदों को मापदंड बनाकर यह बात कही है। अबीवर्दी के काल में क़सीदा कहना प्रचलित हो चुका था। अबीवर्दी के काल में सामान्यतः क़सीदे कहने वाले कवि ही दरबार में पहुंच बना पाते थे।
क़सीदों के बारे में ईरान के समकालीन शोधकर्ता डाक्टर अब्दुल हसन ज़र्रीनकूब कहते हैं कि उस काल के क़सीदों में सीमा से अधिक प्रशंसा मिलती है। वे कहते हैं कि इनमें कवि जिसके बारे में क़सीदा कहता था उसकी बहुत अधिक प्रशंसा किया करता था। उनका कहना था कि यह प्रशंसा इतनी अधिक होती थी कि वह अतिश्योक्ति से भी आगे बढ़कर झूठ की श्रेणी में आ जाती थी। उस काल के कवि अधिकतर राजाओं या बड़े लोगों की अधिक से अधिक प्रशंसा करके उन्हें ख़ुश रखने के प्रयास करते थे या फिर उसके बदले में उनसे कुछ मांगा करते थे।
अनवरी अबीवर्दी का काल वही काल है जिसमें क़सीदा कहने की कला अपने चरम पर थी। उन्होंने भी अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को इस मार्ग में प्रयोग किया और बहुत ही कम समय में वे क़सीदे कहने वालों में अग्रिम श्रेणी में पहुंच गए।
हालांकि यहां पर यह कहना आवश्यक है कि इन चीज़ों से लगाव केवल उन लोगों को ही होता है जो इस प्रकार के विषयों में रुचि रखते हैं जबकि आम लोगों की इन बातों में कोई विशेष रूचि नहीं होती है। अनवरी अबीवर्दी ने क़सीदों के अतिरिक्त शेर और ग़ज़लें भी कही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अनवरी अबीवर्दी का काव्य संकलन महत्वपूर्ण संकलन है जिसके अध्ययन से बड़ी सरलता से छठी हिजरी क़मरी के अन्तिम वर्षों की सामाजिक स्थिति और उस काल के कवियों की मानसिकता का अनुमान लगाया जा सकता है।
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