सनाई ग़ज़्नवी-2
अबुल मज्द आदम सनाई ग़ज़नवी फ़ारसी शायरी के सबसे महान शायरों में गिने जाते हैं।
विश्व प्रसिद्ध शायर मौलाना रूम और अत्तार नीशापूरी जैसे शायर, अबुल मज्द आदम सनाई ग़ज़नवी के विचारों से बहुत प्रभावित हुए हैं। साहित्यकारों का मानना है कि शायरी में ऐसे शायर अमर हुए हैं जिन्होंने शायरी में किसी नई शैली या विचार को पेश किया है।
सनाई के शेर को पढ़ने से पता चलता है कि वे अपने युग में अकेले ऐसे शायर थे जिन्होंने पारंपरिक फ़ारसी शायरी के सांचे ख़ास तौर पर ग़ज़ल और क़सीदे में नए अंदाज़ को पेश किया। उन्होंने आत्मज्ञान पर आधारित अपने विचारों का बड़ा भाग शायरी के रूप में पेश किया। अबुल मज्द आदम सनाई ग़ज़नवी से पहले दूसरी से पांचवीं हिजरी क़मरी तक आत्मज्ञानियों के विचार और अनुभव गद्य के रूप में मौजूद थे। ये विचार ‘रिसालए क़िशरिया’ और ‘अहयाए उलूमे दीन’ नामक किताबों में मौजूद थे। सनाई ने इन अनुभवों को फ़ारसी शायरी के रूप में पेश किया और इस प्रकार फ़ारसी साहित्य के इस क्षेत्र में मूल भूत बदलाव लाए। बहुत से समीक्षकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि सनाई की रचनाए इस क्षेत्र में आरंभिक बिन्दु भी हैं और चरम बिन्दु भी।
समकालीन शोधकर्ता व शायर डाक्टर शफ़ीई कदकनी, सनाई के प्रभाव आत्मज्ञान पर आधारित उनके शेर के बारे में कहते हैं, सनाई के शेर से फ़ारसी शायरी में आत्मज्ञान पर आधारित विषयवस्तु का उल्लेख शुरु हुआ जो थोड़े से बदलाव के बाद हाफ़िज़ की ग़ज़लों में भी प्रकट हुआ। इस प्रकार के शेरों में इंसान के वजूद के दो रूपों एक मिट्टी से बने उसके भौतिक रूप और दूसरे आत्मिक रूप का उल्लेख मिलता है।
एकेश्वरवाद और ईश्वर की बंदगी फ़ारसी शायरी के इतिहास में इस शायर की शायरी के सबसे मूल्यवान क्षण हैं। सनाई अपने शेर के ज़रिए जिस चीज़ का चित्रण करते हैं वह उनके आत्मिक अनुभव और दार्शनिक मानसिकता की देन है। सनाई की नज़र में पूरी सृष्टि में जान है और हर जगह जीवन के चिन्ह मौजूद हैं। सनाई को समझने के लिए ज़रूरी है कि उनकी ग़ज़लों और क़सीदों के शेरों की तुलना उनके पहले यहां तक कि उनके काल के शायरों के शेरों से की जाए। डाक्टर शफ़ीई कदकनी ने ‘ताज़यानए सुलूक’ नामक किताब में सनाई के शेर और उनके विचारों की समीक्षा की है। वह कहते हैं, सनाई से पहले ग़ज़ल यहां तक कि उनके काल में ग़ज़ल का माहौल बहुत सूना है। उसमें किसी प्रकार की गति, जीवन और प्रेरणा दिखाई नहीं देती। सनाई ने ग़ज़ल में जोश पैदा किया। उन्होंने आत्मज्ञान और अच्छी भाषा के ज़रिए नई ग़ज़ल को वजूद दिया। ऐसी ग़ज़ल जिसकी छाप मोलवी के दीवान पर पूरी तरह महसूस की जा सकती है।
फ़ारसी शायरी में आत्मज्ञान पर आधारित शेर का चलन सनाई के दौर से शुरु हुआ। सनाई के मौजूद शेर और ग़ज़ल तथा क़सीदे के वे शेर जिन्हें सनाई का शेर कहा गया है, और ख़ुद सनाई की किताब हदीक़तुल हदीक़ा, आत्मज्ञान के विषय पर हैं। सनाई ने अपने शेरों में जहां ज़रूरी समझा वहां आत्मज्ञान के अर्थों को स्पष्ट रूप में बयान किया और कहीं कहीं केवल इशारा करते हुए गुज़र गए हैं। सनाई की किताबों और शायरी पर शोध करने वालों और बहुत से समीक्षकों का यह मानना है कि आत्मज्ञान पर आधारित कोई भी विचार ऐसे नहीं मिलेगा जिसकी जड़ कहीं न कहीं सनाई के शेर में मौजूद न हो। आत्मज्ञान, दर्शनशास्त्र और तत्वदर्शिता के विषयों को सबसे अच्छे ढंग से सनाई के शेर में पेश किया गया है इसलिए सनाई के शेर इस संदर्भ में सबसे अच्छे स्रोत समझे जाते हैं।
सनाई को पहला शायर कहा जा सकता है जिसने आदर्श इंसान के विचार को फ़ारसी शेर में पेश किया है। उन्होंने ईश्वर की पहचान, दुनिया और इंसान जैसे तीन सिद्धांत को मद्देनज़र रखते हुए, आत्मज्ञान के सबसे आकर्षक विचारों को पेश किया है। आत्मज्ञान पर आधारित एक संपूर्ण व्यवस्था उनके क़सीदों, ग़ज़लों और हदीक़दुल हक़ीक़ा नामक किताब में दिखाई देती है। यह वही विचारधारा है जो अत्तार नीशापूरी और मौलाना रोम के शेरों में अपने चरम पर दिखाई देती है जिसमें मौलाना रोम के बाद कोई नया विचार शामिल नहीं हुआ है।
सनाई के शेर पढ़ने से यह बात भी पता चलती है कि वह सिर्फ़ आत्मज्ञान तक सीमित नहीं रहे बल्कि उनके बहुत से शेर सामाजिक और नैतिक विषयों के बारे में भी हैं।
सनाई अपने आस-पास के माहौल से चिंतित दिखाई देते हैं। वह समाज में फैली बुराइयों से निपटने के लिए शायरी का सहारा लेते हैं। उनके शेरों में सामाजिक आलोचना इतनी सटीक है कि उसे उन्हीं के दौर तक सीमित नहीं माना जा सकता। उनके एक शेर का अनुवाद जो आज के दौर के लिए भी प्रासंगिक नज़र आता है, इस प्रकार है यह कैसा दौर है कि सभी जागने वाले सो रहे हैं।
यह कैसा दौर है कि सभी समझदार मस्ती में पड़े हुए हैं।
इस तरह के अर्थ वाले शेर इतने सुंदर व प्रभावी हैं कि इन शेरों को फ़ारसी भाषा के सामाजिक-राजनैतिक शेरों में सबसे अच्छे शेरों के संकलन में शामिल किया जा सकता है और सनाई को क्लासिकल फ़ारसी साहित्य के इतिहास में सबसे अच्छा सामाजिक शेर कहने वाला कहा जा सकता है। सनाई के क़सीदों के ज़्यादातर शेर सांसारिक मोहमाया की निंदा में हैं। वह पाखंडी संतों और अत्याचारी शासकों की किसी झिझक के आलोचना करते हैं कि इनमें से दोनों एक दूसरे के कृत्यों का औचित्य पेश करते हैं। सनाई सच्चाई को बयान करने में तनिक भी नहीं डरते। सनाई अपने दौर की सामाजिक स्थिति की समीक्षा करते हुए यह दर्शाते हैं कि वह ऐसे शायर हैं जिसके दिल में समाज और धर्म का दर्द है।
सनाई अपने क़सीदों में जगह जगह पर पैग़म्बरे इस्लाम, उनके पवित्र परिजनों और साथियों के पवित्र जीवन का उल्लेख करके यह बताना चाहते हैं कि उनके दौर के आदर्श समाज को कैसा होना चाहिए। साधुत्व, आत्मज्ञान, दुनिया की बुराइयों की आलोचना, मौत के बारे में सोचना, लंबी व अनियंत्रित इच्छाओं से दूर रहने की सिफ़ारिश और इंसान को अपनी वास्तविकता के बारे में सोचना, सनाई के क़सीदों की विषयवस्तु हैं।
अगर फ़िरदोसी और नासिर ख़ुसरो को अलग कर दें तो सनाई फ़ारसी पद्य के इतिहास में चिंतन मनन करने वाले उन शायरों में हैं जिन्होंने अपने शेर में आत्मज्ञान के विचार पेश करके अपने बाद के शायरों के सोचने के तरीक़े में बहुत बड़ा बदलाव पैदा किया और उनके विचारों का प्रभाव फ़ारसी पद्य पर कई शताब्दियों तक जारी रहा। सनाई ने जो शैली अपनायी वह केवल एक सांचे में सीमित नहीं रही। शब्दों के इस्तेमाल, ज़बान पर पूरा नियंत्रण, और अनोखे विचारों ने उनके लिए यह संभावना पैदा की कि वे ग़ज़ल, क़सीदे और मसनवी में भी एक नए अंदाज़ को पेश करें हालांकि उनसे पहले क़सीदे का विषय राजा महाराजाओं और उनके दरबारियों की प्रशंसा और कभी कभी बहार, पतझड़ जैसी प्राकृतिक चीज़ों की प्रशंसा तक सीमित था और इस प्रकार के क़सीदों में सबसे आगे उन्सुरी, फ़र्रुख़ी और मनूचेहरी नज़र आते हैं।
सनाई उन शायरों में हैं जिन्होंने आत्मज्ञान, साधुत्व और तत्वदर्शिता के विषय को क़सीदे में स्थान दिया। उनके आज भी बहुत से क़सीदे सामाजिक और आत्मज्ञान से संबंधित विषयों के बेहतरीन नमूने हैं।
ग़ज़ल में भी सनाई ने पंजरहाए इशराक़ अर्थात दर्शन शास्त्र के एक मत और आध्यात्मिक भावनाओं का द्वार खोला और ग़ज़ल को आत्मज्ञान की ज़बान सिखाया। सनाई ने मसनवी में उपमाओं के ज़रिए तत्वदर्शिता और पैग़म्बरे इस्लाम की प्रशंसा की है कि उनके बाद के बहुत से शायरों जैसे ख़ाक़ानी, नेज़ामी, अत्तार और मौलाना रोम ने आत्मज्ञान पर आधारित मसनवी कहने में उनसे प्रेरणा ली है। ख़ाक़ानी ने अपने शेरों की महानता को साबित करने के लिए ख़ुद की तुलना सनाई से की है और ख़ुद को सनाई का उत्तराधिकारी बताया है।
क़सीदे और मसनवी में सनाई की ज़बान बहुत कठिन है। जबकि ग़ज़ल में उन्होंने प्रेम पर आधारित विषयों को पेश किया है इसलिए ग़ज़ल की ज़बान ज़्यादा आकर्षक है। सनाई के शेरों की समीक्षा के लिए उनके दो वैचारिक दौर को मद्देनज़र रखना चाहिए क्योंकि उनके अंतर्मन में बदलाव आने से पहले वह अपने दौर के हालात से समन्वित नज़र आते हैं और इस दौर में वह दूसरों का अनुसरण करने वाले और दूसरों की प्रशंसा करने वाले शायर दिखाई देते हैं लेकिन जब उनके अंतर्मन में क्रान्ति आती है तो उनकी शायरी का अंदाज़ भी बदल जाता है। इसलिए उनके शेरों की समीक्षा के लिए इन दोनों दौर को मद्देनज़र रखना बहुत ज़रूरी है।
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