Apr २३, २०१६ ०९:५३ Asia/Kolkata
  • सनाई ग़ज़्नवी-3

कहा जाता है कि पांचवी शताब्दी और छठी शताब्दी के शुरु में फ़ारसी साहित्य में अबुल मज्द मजजूद बिन आदम सनाई ग़ज़नवी का बहुत ऊंचा स्थान है।

 सनाई शायरी की एक शैली मसनवी के जनक हैं और इसी शैली में उन्होंने अत्तार नेशापूरी और मौलाना रोम के अंदाज़ में आत्मज्ञान से भरे शेर कहना शुरु किया।

अबुल मज्द आदम सनाई ग़ज़नवी, 464 हिजरी क़मरी में ग़ज़्ना शहर में पैदा हुए जो उस वक़्त ज्ञान-विज्ञान और साहित्य का केन्द्र समझा जाता था। सनाई 11 शाबान 525 हिजरी क़मरी बराबर 8 मई 1131 ईसवी में इस दुनिया से चल बसे। उस वक़्त ग़ज़्ना विशाल ईरान का भाग था जो इस वक़्त पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा है। उन्हें ग़ज़्ना में दफ़्न किया गया। शेरों के दीवान, हदीक़तुल हदीक़ा व तरीक़ुश शरीआ, सैरुल एबाद इलल मआद, कारनामे बल्ख़ और मकातीबे सनाई, सनाई की मशहूर किताबें हैं।

 

 

सनाई के काल में ग़ज़्नी शहर में बहुत रौनक़ थी। आत्मज्ञानी और सदाचारी व्यक्ति अलग-थलग ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे तो दूसरी ओर शायर, दरबारी शायरों की परंपरा के अनुसरण में शासकों की तारीफ़ में शेर कहते थे। किन्तु उस दौरान सनाई के रूप में एक जागरुक शायर भी था जो जल्दी ख़त्म हो जाने वाली इन चीज़ों से प्रभावित नहीं हुआ और अपना जीवन ग़फ़लत में गुज़ारने पर तय्यार न हुआ। सनाई के शेरों ख़ास तौर पर उन शेरों से उनके विचारों का पता चलता है जो उन्होंने अपने भीतर वैचारिक क्रान्ति आने के बाद कहे हैं। उन्होंने अपनी शायरी से लोगों के अंतर्मन को झिंझोड़ने की बहुत कोशिश की है। उनके शेर उनके काल के समाज के लोगों की ग़फ़लत के कारण, दर्द, ख़ौफ़, निराशा, आलोचना और फटकार से भरे पड़े हैं। उन्हें अपने दौर के लोगों के सांसारिक मोहमाया में डूबे होने पर हैरत होती थी और ग़ुस्से भरे शेर में कहते थे कि यहां कहीं भी उम्मीद की किरण नहीं है। वह नासिर ख़ुसरो की तरह लोगों को सांसारिक मोहमाया में पड़ने से डराते हैं, अपने दौर के भ्रष्टाचार की आलोचना करते हैं और मौत को याद रखने की नसीहत करते हैं।

 

 

उनकी एक चौपायी का अनुवाद है, इससे पहले की ज़बान बंद हो और अंतर्मन की आवाज़ न सुन पाओ, पाठ लो। कब तक इस धोख़ेबाज़ दुनिया से दिल लगाओगे।

सनाई के शेर देख कर ही उनके उन शेरों को, उन शेरों से बहुत आसानी से अलग किया जा सकता है जो उन्होंने वैचारिक क्रान्ति से पहले और बाद में कहे हैं। क्योंकि बहुत से समीक्षकों का मानना है कि वैचारिक क्रान्ति के बाद के शेर अपने प्रभाव की दृष्टि से उससे पहले की ज़िन्दगी के शेर से बहुत बेहतर हैं।

सनाई अपनी शायरी के शुरु के दौर में फ़र्रुख़ी और नासिर ख़ुसरों सहित अपने पहले के शायरों के अंदाज़ में शेर कहते थे लेकिन अपनी शायरी के दूसरे काल में उनकी ज़बान, विचार और अंदाज़ बदल गया। उन्होंने अपनी शायरी के दूसरे काल में एक अलग अंदाज़ अपनाया जिसे उनके बाद के शायरों जैसे ख़ाक़ानी, जामी और अमीर ख़ुसरो देहलवी ने अपनाया।

 

 

विषयवस्तु, शेर के ज़रिए किसी चीज़ की तस्वीर को मन में उभारना, और नए नए मिश्रित शब्दों का इस्तेमाल, सनाई के शेरों की मुख्य विशेषताएं हैं जिसे बाद में बहुत से शायरों और ईरान के प्रसिद्ध आत्मज्ञानियों ने अपनाया। सनाई को शायरी में एक नई शैली का जनक कहा जा सकता है। एक ऐसी शैली जिसे छठी हिजरी क़मरी के महान शायर ख़ाक़ानी तपस्या की शैली कहते हैं या दूसरे शब्दों में भारत में भक्ति काल की शायरी की संज्ञा दी जा सकती है। इस शैली में सनाई ने अपने शेरों में सदाचारिता, एकेश्वरवाद और आत्मज्ञान पर चर्चा की है।

ईश्वर का एक होना, पवित्र क़ुरआन की महानता के गुणगान, पैग़म्बरे इस्लाम की प्रशंसा और नैतिक गुणों की सिफ़ारिश सनाई की शायरी का मुख्य भाग है।

सनाई के शेरों से पता चलता है कि वह आम लोगों की पथभ्रष्टता से बहुत दुखी हैं और दरबारी शायरों के भोग-विलास का शिकवा करते हैं। लेकिन वह इस दुख और शिकवे को इतने सुंदर अंदाज़ में बयान करते हैं कि जिसे इन्सान एक बार सुन ले तो पूरी उम्र याद रखे। वह अपने शेरों में अपने समाज की आलोचनात्मक समीक्षा पेश करते हैं। लोगों को नसीहत करते हैं। अपने समाज की सभी अच्छाइयों और बुराइयों को बयान करते हैं। ईरानी समीक्षक डाक्टर शफ़ीई कद्कनी के शब्दों में सनाई इस क्षेत्र के ऐसे महारथी हैं कि न उनसे पहले और न उनके बाद का कोई शायर उनकी बराबरी कर सकता है।

 

 

दुनिया का क्षणभंगुर होना, सांसारिक मोहमाया पर ध्यान न देना और उच्च मानवीय मूल्य, सनाई की शायरी की विषयवस्तु हें। इस तरह के शेर का नमूना उनकी किताब हदीक़तुल हक़ीक़ह है। इसी प्रकार उनके दीवान के एक भाग में भी इसी तरह के शेर मौजूद हैं।

ईरान के समकालीन विद्वान व शोधकर्ता डाक्टर अब्दुल हुसैन ज़र्रीनकूब, सनाई के इस प्रकार के शेरों के बारे में कहते हैं, हदीक़तुल हदीक़ह में 10 हज़ार शेर हैं जिसकी विषयवस्तु एकेश्वरवाद, आत्मज्ञान और नैतिकता है। हदीक़तुल हक़ीक़ह, इलाही नामे के नाम से भी मशहूर है। इस किताब में सनाई का उद्देश्य स्पष्ट है। उनका उद्देश्य आत्मज्ञान के लक्ष्यों को बयान करना है जिसे वह शेर के रूप में बहुत अच्छे अंदाज़ में पेश करते हैं। हदीक़तुल हक़ीक़ह को आत्मज्ञान का एक प्रकार का इन्साइक्लोपीडिया अर्थात विश्वकोष कहा जा सकता है जो शेर के रूप में संकलित है।

 

 

सनाई भक्ति के भाव से भरे शेर कहने में सबसे बड़े उस्ताद हैं। उन पर शोध करने वाले बहुत से शोधकर्ताओं का मनना है कि सनाई का अस्ली व महान व्यक्तित्व उनके इस प्रकार के शेरों से ज़ाहिर होता है। सनाई महान धार्मिक हस्ती और समाज सुधारक नज़र आते हैं। ऐसा सुधार जो इंसान की आत्मा से शुरु होता है।

सनाई के भक्तिभाव के शेर उन्हें ऐसे उपदेशक दर्शाते हैं जो सभी बुराइयों से पाक है। उनकी आत्मा ईश्वर के प्रेम में जल रही है और इसी प्रेम की ज्वाला वह दूसरों के मन मे भी जलाने की कोशिश करते हैं। सनाई इंसान में मौजूद बुराइयों, ख़ास तौर से लालच की निंदा करते हैं और उसे उस मार्ग की ओर बुलाते हैं जो उनकी नज़र में सही है।

सनाई ने कठिन विषयों पर बहुत ही दक्षता के साथ शेर कहे हैं। उन्होंने आत्मज्ञान के बहुत सूक्ष्य विषयों और धार्मिक भावनाओं को बहुत ही कम शब्दों में भावुक अंदाज़ में बयान किया है। इस दौरान कहीं कहीं अनुचित शब्द को भी इस्तेमाल किया है। सनाई ने आत्मज्ञान के उन विषयों को पूरी दक्षता के साथ बयान किया है जिन्हें उस वक़्त सिर्फ़ ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी और कुछ हद तक अबू सईद अबुल ख़ैर तथा अहमद जाम ने पेश किए हैं।

 

 

सनाई ने जिस आकर्षक अंदाज़ में शेर कहे हैं उसकी उनके दौर और बाद के दौर के शायरों से तुलना नहीं की जा सकती। ईरानी साहित्य में सनाई हदीक़तुल हक़ीक़ह के ज़रिए आध्यात्म के विषयों को शायरी की विशेष शैली मसनवी के रूप में बयान करने वाले पहले सफल शायर हैं।

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